सपनों, संभावनाओं का सम्वत् २०१२
प्रो. नवीन मिश्रा

दिसंबर २०१० में पश्चिम एशिया के ट्युनीशिया शहर में  एक नई क्रान्ति की शुरुआत हर्इ जिसने पूरे विश्व को झकझोर कर रख दिया। वाकया था एक एक गरीब सब्जी बेचने वाले ने जब एक पुलिस वाले को घूस दिने से इनकार कर दिया तो उसने सारेआम उसके गाल पर थप्पडÞ जडÞ दिया, गालियां दी और मुंह पर अपनी बेइज्जती से निराश उस व्यक्ति ने स्थानीय प्रशासन के मुख्यालय के सामने आत्मदाह कर लिया। पूरे ट्युनिशिय में उसकी मौत से हाहाकार मच गया। पूरे देश के लोग आन्दोलित होकर सडÞक पर उतर आए। स्थिति इतनी बदतर हो गई कि २३ साल से सत्ता पर काबिज बेन अली को देश छोडÞकर भागना पडÞा। मिश्र के तहरीर चौक पर लोगों ने कब्जा कर लिया। पश्चिम एशिया में तहरीर चौक तानाशाही, गैर-लोकतान्त्रिक, दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ बगावत का प्रतीक बन गया। राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को भी कूच करना पडÞा। ३० वर्षका गुगल मार्केटिंग एक्जीम्यूटिव बेल गोनिम पूरे विश्व में नामक बन कर उभरा। देखते हीं देखते मोरक्को, सीरिया, लिबिया, जार्ँडन, यमन, अल्जीरिया, बहरीन आदि देशों में भी क्रान्ति की आग भडÞक उठी। उत्तेजित जनता के सामने टैंक और सेना की गोलियाँ भी निस्तेज होने लगी। लिबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को भी लोगों ने सरेआम मार डÞाला। जनता व्रि्रोह के कारण सिरिया भी अशान्त हो गया।
हम सबों को भी इस क्रान्ति से सीख लेनी चाहिए। आज विश्व के बुद्धिजीवि नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर हैं क्योंकि १९८९-१९९० में जब विश्व में एक के बाद एक साम्यवादी सत्ताएं तास के पत्ते की तरह ढेÞर हो रहे थी, तब भी क्रान्ति की दस्तक पश्चिम एशिया तक नहीं पहुँच पाई थी। लेकिन आज परिवर्तन की यह आँधी सिर्फपश्चिम एशिया तक ही सीमित नहीं है। आज इसकी चपेट में पूँजीवादी देश भी आ गए हैं और वे भी जो कभी साम्यवादी थे। लोकतान्त्रिक देशों में भी लोग सडÞक पर उतर आएँ। ‘आम्यूपाई बालस्ट्रीट’ अर्थात बालस्ट्रीट पर कब्जा करो के नारे से अमेरिका गंूज उठा तथा अमेरिकी नागरिकों को पूँजीवादी ढांचे में काँरपाँरेट घरानों के विरुद्ध एकजूट कर दिया। देखते ही देखते जकोटी पार्क अमेरिका का तहरीर चौक बन गया। यह आवाज आँस्ट्रेलिया तक पहुँच गई। इजरायल की राजधानी तेल अबीब में इतिहास की सबसे बडÞी रैली का आयोजन किया गया। २०११ के अंत तक रुस में भी प्रधानमन्त्री भ्लादिमीर पुतिन के खिलाफ लोगों का आक्रोश सडÞकों पर जगजाहिर है। मास्को में १९१७ की मार्क्सवादी क्रान्ति के बाद यह पहली क्रान्ति थी। इंग्लैंड हो या फिर पं|mास, इटली हो या स्पेन, ग्रीस हो या पर्ुतगाल, बस एक ही आवाज, एक ही गुस्ाा एक ही नारजगी चारों तरफ। चीन में भी जहाँ खुल कर विरोध करने पर प्रतिबन्ध है, लोग अपने तरह से विरोध जताने में लगे हैं। भारत में भी जहाँ वर्षों से कोई व्यापक विरोध देखने को नहीं मिला था, महाराष्ट्र के गांधीवादी, अहिंसक नेता अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोग सडÞकों पर निकल गए तथा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम छेडÞ दिया जो आज एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया।
भारत जैसे विकासशील देश में यह माना जाता था कि आर्थिक सुधारों के कारण यहाँ के आम लोग अराजनीतिक हो गए हैं। अब तक यह भ्रान्ति थी कि यहाँ का मध्यम वर्ग अपने आप में मस्त रहता है। उसे अपनी नौकरी और गाडÞी को छोडÞ कर किसी भी चीज की चिन्ता नहीं है। इनकी दुनियाँ माँल से बेकर पब और फेसबुक तक सीमित होती है। लेकिन २०१० के अंत तक यह बात समझ में आने लगी कि इनकी सोंच में अब व्यापक परिवर्तन हो चुका है। देश में हो रहे एक के बाद दूसरे बडÞे घोटाले से परेशान जनता ने खुल कर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपने गुस्से का इजहार करना शुरु कर दिया। लेकिन जंतर मंत्रर पर अप्रैल महीने में जब अन्ना हजारे बैठे और जिस तरह लोगों का भारी र्समर्थन उन्हें मिला, तब सरकार और राजनीतिक दलों के पैरों के नीचे की जमीन खिसकने लगी कि कहीं भारत में भी कोई तहरीर चौक न बन जाए। इसी डर से सरकार और राजनीतिक दल लोकपाल पर कानून बनाने को राजी हुए। वास्तव में यह बहुत बडÞा परिवर्तन का संकेत है। इन सभी बातों के पीछे आज के संचार तकनीक का बहुत बडÞा हाथ है। आज फेसबुक और सेलफोन के कारण पूरी दुनियाँ एक चौप्ााल में तब्दील हो गई है। सभी प्रकार के विचारों का खुल कर आदान प्रदान हो रहा है।
दूसरी महत्वपर्ूण्ा बात यह है कि बहुत दिनों से किसी सशक्त आन्दोलन के अभाव में शासक वर्ग अहंकारी हो गया था। शासक वर्ग अपने आप को र्सर्वेर्सवा समझने लगा था। उसे लगता था कि वह अपनी ही मनमानी कर सकता है लेकिन जनता के विचारों ने तूफान खडÞा कर दिया जिससे शासन की नींब हिलने लगी। पश्चिम एशिया में तो पहले से ही शासक जवाबदेह नहीं थे, दूसरे देशों में भी लगभग वही हाल था। जार्ँज बुस इराक पर बिना कारण हमला कर दें और कहीं कोई विरोध नहीं हो, तो स्वभाविक है कि शासकों का हौसला बढेÞगा। पुतिन का हौसला इतना बढÞ गया कि वह संविधान का मजाक उडÞाते हुए दिमित्री मेदवेदेव को कठपुतली राष्ट्रपति बनाकर सत्ता की कमान अपने हाथ में रखने का दुस्साहस कर बैढे।
आज दुनिया के ग्लोबल विलेज बन जाने के कारण एक नए समाज का जन्म हुआ है। आज जनता की सोच में परिवर्तन हो चुका है, उसके सरोकार बदल गए है, उनके मूल्य और सोंच भी नए हो गए हैं। लेकिन सरकार और शासक वर्ग इन सभी चीजों से अनभिज्ञ सत्ता के मद में मदांध रहे। यही कारण है कि आज दुनिया भर में समाज और सरकार के बीच टकराव शुरु हो गया है। सत्ता परिवर्तन के लिए जनता बगावत पर उतर आई। बगावत को जनर्समर्थन मिलना शुरु हुआ। जैसे प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सत्ता के चरित्र और स्वभाव में बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की गई थी, वैसे ही एक बार फिर सत्ता के परंपरागत स्वरुप में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। अब लोकतान्त्रिक देशों में सत्ता में जनता की भागीदारी को महत्व देने का समय आ गया है। अमेरिका को अपनी सत्ता में काँरपोरेट के दखल को खत्म करना होगा। रुस में सामन्तवादी प्रवृत्ति को छोडÞ समाज को और खुला बनाना होगा। इजरायल को सैनिक मानसिकता से बाहर आना पडेÞगा। नेपाल में मधेशियों को सत्ता में उचित भागिदारी देनी होगी, पश्चिम एशिया में लोकतन्त्र की स्थापना करनी होगी। सत्ताधारियों को अब सचेत हो जाना चाहिए कि अब जनता जाग चुकी है- कुशासन के खिलाफ, भ्रष्टाचार के विरुद्ध।
बीता हुआ वर्ष२०११ पूरे विश्व के लिए परिवर्तन का वर्षरहा है। इसकी शुरुआत अरब देशों के व्रि्रोह से हर्ुइ। इन देशों के शासक वर्ग काफी अरसे से तानाशाह बने बैठे थे। लोकतन्त्र, संविधान सभी उनके अधीन की वस्तु थी। इन्हें अपनी ऐयासी के सामने परिवर्तन की आँधी नहीं दिखाई दे रही थी। १४ जनवरी को लगभग २३ वर्षों से ट्यूनिशिया की सत्ता पर काबिज बने अली जब राजधानी छोडÞकर भागे तो परिवर्तन की आंधियों ने इस ऐतिहासिक मरुभूमि को ही अपने कब्जे में ले लिया। मिश्र, लेबलान, सूडान, यमन, बहरीन, सिरिया हो या लिबिया, कोई भी अछूता नहीं रहा। असंतोष जनता में इतना बढÞ गया था कि कर्नल गद्दाफी जैसा व्यक्ति जो अमेरिका तक को भी आँखें दिखाने से बाज नहीं आता था, उसको अपने ही देश की जनता ने सारेआम पीट-पीट कर मार डÞाला।
अपने अन्तरविरोध के कारण अमेरिका में उत्पन्न हुए आँम्युपाई वालस्ट्रीट आन्दोलन के कारण अमेरिका भी ओसामा के बध का जश्न लंबे समय तक नहीं मना सका। चार महीने से भी कम समय में अमेरिकी पूँजीवाद के वर्तमान शासन के विरुद्ध वहाँ के लोग उत्तेजीत हो कर सडÞको पर आ गए। अब यह आन्दोलन सिर्फअमेरिका तक ही सीमित नहीं है। यूरोप भी इसकी चपेट में आ गया है। अगस्त में लंदन में हर्ुइ जातीय हिंसा से यह बात प्रमाणित होती है कि पश्चिमी समाज अपनी सभ्यता को बदलने के लिए बेताब है। बदलाव की जो आँधी अरब देशों से शुरु हर्ुइ थी, उसने यूरोप और अमेरिका को भी कब्जे में ले लिया है। ग्रीस, इटली, पर्ुतगाल और स्पने में तो जन प्रतिरोध के सामने सरकारें तास के पत्तों की तरह भर भराकर गिर गई। इन सभी बातों को देख कर तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और प|mान्स में भी सत्तानायकों के चेहरे बदल जाएंगे। प|mान्स के सरकोजी और अमेरिका के ओबामा अभी कुछ दिनों पहले तक परिवर्तन के प्रतीक माने जाते थे, अब आज स्थिति यह है कि लोग उन्ही को परिवर्तित करना चाहते है।
परिवर्तन के इस माहौल में हम वर्ष२०१२ में कुछ आशंकाओं के साथ प्रवेश कर रहे है। अरब से लेकर एशिया तक तथा पश्चिम में भी यह भय बना हुआ है कि हम कही एक अराजकता की ओर तो नहीं बढÞ रहे हैं – भविष्य में देश संसद से चलेगा या सडÞक से। ऐसे में एक यह भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ग्लोबल विलेज की यह अवधारणा कितनी सही है – इसी अवधारणा का प्रभाव है कि अमेरिकी आर्थिक मंदी से पूरा विश्व प्रभावित हो जाता है। इन सब बातों का ध्यान रखते हुए वर्ष२०१२ में हमें सचेत रहना होगा। ±±±

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