सप्तकोशी का कहर

हिमालिनी विशेष:३ अगस्त २०14 की सुबह प्रकृति के कहर ने एक बार फिर यह जता दिया कि मानव और विज्ञान चाहे कितनी भी तरक्की क्यों ना कर ले प्रकृति के सामने वह विवश हो जाता है । जब विनाश हमारे दरवाजे पर दस्तक दे देता है, तो हम बैचेन हो जाते हैं और उससे निकलने का मार्ग ढूँढÞते हैं किन्तु समय रहते न तो व्यक्ति सजग होता है और न ही राष्ट्र । सच तो यह है कि अगर नेपाल पर कोई भी आपदा आती है तो उसका कोई निराकरण हमारे समक्ष नहीं है । उससे बचने की कोई तैयारी हमारे पास नहीं है । एक त्रासदी को देश झेल रहा है और इबोला नाम की आपदा हर ओर दस्तक देने को तैयार है । हर रोज इससे जुडÞी खबरें आ रही हैं किन्तु नेपाल सरकार की ओर से कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हो पा रहा है । चिकित्सकों का मानना है कि अगर इबोला संक्रमित एक रोगी भी देश में आ जाय तो महामारी फैल सकती है । पडÞोसी देश भारत में इससे सम्बन्धित रोगी मिल भी चुके हैं । किन्तु इस बात का असर स्वास्थ्य मंत्रालय पर नहीं दिख रहा ।
सिन्धुपालचोक माङखा गाँव के जुरे में आई प्राकृतिक आपदा से देश जूझ रहा है । सुनकोशी नदी में पानी के बहाव के रुक जाने की वजह से एक बडÞी त्रासदी का संकेत मिल रहा है । क्षण भर में ही न जाने कितने लोग इस त्रासदी का शिकार हो गए । कितनों ने अपनों को खो दिया । कितने घर उजडÞ गए । सरकार जो भी हताहतों की संख्या बता रही है, निःसंदेह स्थिति उससे भी अधिक भयावह है । माङखा और राम्चे के बीच जुरे में सुनकोशी नदी में पहाडÞ के गिरने से नदी बन्द हो गई है और एक बडÞा ताल बन गया है । जिसके कारण आस-पास के हजारों गाँव वाले सुरक्षित स्थान की ओर चले गए हैं । सेना के प्रयास से विस्फोट का सहारा लेकर पानी के बहाव को खोला गया है । पर अविरल वषर्ा के कारण खतरा बना हुआ है । घटना रात में हर्ुइ, इसलिए गाँव वाले ज्यादा प्रभावित हुए । इस घटना में ४५ मेगावाट के भोटेकोशी जलविद्युत आयोजना के ४ ट्रांसमिशन टावर भी बह गए हैं । जिसकी वजह से उत्पादन बन्द है । नदी जाम होने के कारण दोलालघाट, भुम्लुटार, सापिंङ, फलाटे, कोसीदेखा, कोलाती भुम्लु, सस्युर्ंखर्क, बिर्तादेउराली, सरमथली, कात्तिकेय देउराली, बोल्दे फेदीचे, मादन कुँडारी और ठूलोपर्सर्ेेके लगभग दो हजार बस्ती खतरे में हैं ।
इतना ही नहीं इसकी वजह से पर्ूव के सात जिले भी प्रभावित हो रहे हैं । डर बना हुआ है और गाँववाले चिंता और भय के साए में समय बिताने को बाध्य हैं । अगर सुनकोशी का रुका पानी अचानक अपनी गति को पकडÞता है तो स्थिति अत्यन्त भयावह हो जाएगी । बर्बादी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है । पानी के उच्च बहाव में ओखलढुंगा, सिन्धुली, रामेछाप, उदयपुर, खोटांग, भोजपुर, धनकुटा, सुनसरी और सप्तरी के ७६ गाँव इसकी चपेट में आ जाएँगे ।  सप्तकोशी के आसपास के क्षेत्र को संकटग्रस्त क्षेत्र घोषित किया जा चुका है, गाँव वाले विस्थापित हो चुके हैं । पर सवाल उठता है कि कब तक अपने घरबार को छोडÞकर रहा जा सकता है । स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कोशी बैरेज के निर्माण के पचास वर्षबाद इसके सभी ५६ दरवाजे पहली बार खोले गए हैं । पहले कोशी बैरेज की क्षमता १२ लाख क्योसिक पानी नियन्त्रण की थी किन्तु, समय के साथ घटते-घटते कई एक कारणों से इसकी नियन्त्रण क्षमता घटती चली गई है । आजकल २ लाख क्यूसेक पानी के बहाव के साथ ही र्सतर्कता सूचक झंडा दिखा दिया जाता है । बिहार सीमा से सटे कई क्षेत्र इस आपदा से बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं । पिछली बार की बाढÞ ने सैकडÞों एकडÞ जमीन को बंजर बना दिया था । जानमाल की क्षति का तो अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता । उस विपदा को आज भी कोशी क्षेत्र के निवासी भूल नहीं पाए हैं यही कारण है कि इस बार भारत सरकार और बिहार सरकार ने पहले से ही संकट से जूझने की तैयारी कर ली है ।
नेपाल सरकार ने भी सुनकोशी के पीडिÞतों के लिए आवश्यक सहायता और राहत का काम शुरु कर रखा है । किन्तु स्थिति की भयावहता और गम्भीरता को देखते हुए सरकार के कदम में तत्परता नहीं दिख रही है । जितनी तैयारी और सहायता की आवश्यकता है, वह नजर नहीं आ रही ।
देश हर वर्षप्रकृति की इस मार को झेलता है । जुरे से कुछ ऊपर गुम्थांग में बारिश बहुत होती है । यह क्षेत्र भूकम्पीय दृष्टिकोण से भी जोखिमपर्ूण्ा है । पानी के बहुत पडÞने से जमीन गलती है और उसके बाद ही पहाडÞ धसने या गिरने की सम्भावना अधिक हो जाती है । विशेषज्ञ मानते हैं कि पिछले वर्षही यहाँ की जमीन कमजोर हो गई थी, जिसके कारण ऊपर से आए चट्टान को जमीन रोक नहीं पाई और पूरी तेजी के साथ एक ही बार पहाडÞ नीचे गिर गया । बुढÞी गण्डकी, मादी, पश्चिम सेती जैसे देश में कम से कम २० से २५ स्थान ऐसे हैं, जहाँ ऐसी दर्ुघटना होने की सम्भावना हमेशा बनी हर्ुइ रहती है । पिछले वर्षभ्ााद्र २१ गते महाभारत और भेडेटार में अचानक पहाडÞ गिरने की वजह से देखते ही देखते बस्ती बह गई थी । भरतपुर, नारायणगढ, नागढुंगा सडÞक क्षेत्र हमेशा वषर्ायाम में इस त्रासदी से ग्रस्त रहते हैं ।  विगत में कहाँ-कहाँ ऐसी घटनाएँ हर्ुइ हैं इसका अध्ययन कर जलाधार संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता है । नदी तटीय क्षेत्र में देश के कई हाइड्रोपावर हैं जो इसके चपेट में आ जाते हैं इनके ऊपर ध्यान देने और इसके लिए सुरक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
सरकार को गम्भीरता के साथ सहायता, घायलों के इलाज और जो लापता हैं, उनकी खोज के लिए प्रयास, बेघर हुए पीडिÞतों के लिए आश्रय की व्यवस्था पर केन्द्रित होना पडÞेगा । सरकारी निकायों को तत्परता और सक्रियता के साथ आगे आने की आवश्यकता है । यों तो गृहमंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय दैवीप्रकोप उद्धार समिति की बैठक भी हर्ुइ, प्रभावित क्षेत्र को संकटग्रस्त क्षेत्र घोषित करने की औपचारिकता का निर्वाह भी हुआ, कुछ आवश्यक निर्ण्र्ााभी लिए गए किन्तु, इसकी कार्यान्वन में जो तत्परता होनी चाहिए थी वह नहीं हर्ुइ । देश में किसी बडÞी आपदा से जूझने की क्षमता नहीं है, यह तो जाहिर है क्योंकि, ऐसे अवसर पर भी देश अन्य पडÞोसी देशों से ही सहायता की उम्मीद करता है । सुनकोशी में आई इस आपदा की वजह से कई जलविद्युत-आयोजना प्रभावित हर्ुइ हैं और विद्युत आपर्ूर्ति कम हो गई है और लोडसेडिंग की मार भी बढÞ गई है ।
पिछले कुछ दिनों में लगातार बारिश की वजह से सम्पर्ूण्ा देश में त्राहि मची हर्ुइ है । हर ओर हाहाकार मचा हुआ है ।  नेपाल की प्राकृतिक संरचना की वजह से यह हमेशा जोखिमपर्ूण्ा अवस्था में है इसलिए सिर्फदर्ुघटनाओं के समय इस पर चर्चा न होकर पहले से ही सजगता, सुरक्षा और र्सतर्कता के इंतजाम पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।

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