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सबकी मदद करने वाला संयुक्‍त राष्‍ट्र अार्थिक संकट से जूझ रहा है

२९ जुलाई

अकसर मुसीबत के समय में विभिन्‍न देशों में विभिन्‍न तरह की मदद के रूप में संयुक्‍त राष्‍ट्र हमेशा से ही अग्रणी भूमिका निभाता रहा है। इसके अलावा संयुक्‍त राष्‍ट्र की अगुवाई में हिंसा की जद में आए विभिन्‍न देशों में शांति सेना भेजने का काम भी इसके ही जिम्‍मे आता है। सीरिया से लेकर अफ्रीका के कई देशों तक संयुक्‍त राष्‍ट्र कई तरह की भूमिकाओं में दिखाई देता है। लेकिन अगर इतनी बड़ी संस्‍था ही आर्थिक संकट से जूझती हुई दिखाई दे तो ताज्‍जुब जरूर होता है। लेकिन ये सच है। ऐसा किसी और ने नहीं बल्कि खुद संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव एंटोनियो गुतरेस ने ही इसके सदस्‍य देशों से यह सब कहा है।

गुतरेस की अपील 
उन्‍होंने सदस्‍य राष्‍ट्रों से अनिवार्य अनुदान की राशि पूरी और समय पर अदा करने का आग्रह किया है। उन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र के खराब होते आर्थिक हालातों का जिक्र करते हुए सदस्‍य देशों को एक पत्र भी लिखा है। इसमें उन्होंने लिखा है कि ‘नियमित बजट में सदस्य देशों की ओर से अनुदान राशि अदा करने में देरी के चलते नगदी की कमी का सामना जिस तरह हम कर रहे हैं, वैसा पहले कभी नहीं किया। गुतरेस का ये भी कहना है कि किसी भी वित्तीय वर्ष में हमारा धन इतनी जल्दी इतना कम कभी नहीं हुआ।

भारत कर चुका भुगतान, कई अब भी बाकी 
आपको बता दें कि भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र की स्‍थापना से ही इसका सदस्‍य है। इसके अलावा भारत ने इसकी स्‍थापना में काफी अहम भूमिका भी अदा की थी। जहां तक भारत के भुगतान का सवाल है तो 26 जुलाई तक न सिर्फ भारत बल्कि इसके 112 सदस्य देशों ने अपने नियमित बजट बकाये का पूरा भुगतान कर दिया था। भारत ने इस साल 29 जनवरी को 1.79 करोड़ डॉलर (लगभग 123 करोड़ रुपये) का भुगतान किया था। इस साल जून के आखिर में सदस्य देशों द्वारा 2008 के आकलन के लिए अदा की गई राशि करीब 1.49 अरब डॉलर (लगभग 10,238 करोड़ रुपये) रही।

पिछली अवधि में मिली राशि 
पिछले साल इसी अवधि में नियमित बजट में जमा राशि 1.70 अरब डॉलर (लगभग 11,680 करोड़ रुपये) से कुछ अधिक थी। आपको यहां पर ये भी बताना जरूरी लेकिन इसके बाद भी कुल देशों ने अब तक भी अपने नियमित बजट बकाये का भुगतान नहीं किया है। इन देशों में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, ब्राजील, मिस्र, इजरायल, मालदीव, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सेशेल्स, सूडान, सीरिया, अमेरिका और जिम्बाब्वे का नाम शामिल हैं।

कौन सा देश करता है कितनी मदद 
आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के कुल खर्च का सबसे ज्यादा हिस्सा अमेरिका देता है। वह वैश्विक निकाय को सालाना मुख्य बजट 540 करोड़ डॉलर (लगभग 37,095 करोड़ रुपये) का 22 फीसद भुगतान करता है। शांति अभियानों का वह 28.5 फीसद खर्च उठाता है। शांति अभियानों का सालाना बजट 790 करोड़ डॉलर (लगभग 54,245 करोड़ रुपये) का है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली रंधावा ने कहा कि अन्य देशों को अपना भुगतान बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अपना हिस्सा 25 फीसद से आगे नहीं बढ़ाएगा।

यूएन ने की योगदान में कमी 
अमेरिका की बात चली है तो आपको ये भी बता दें कि अमेरिका ने 2018-19 के लिए यूएन के बजट में ₹18 अरब से अधिक की कटौती करने की घोषणा की थी। अमेरिका का कहना था कि वह यूएन के मैनेजमेंट और सपोर्ट फंक्शन बजट में भी कटौती करेगा। यूएन चार्टर के तहत अमेरिका यूएन के सालाना बजट में 22 फीसद योगदान देता है। 2017-18 में अमेरिका ने करीब ₹76 अरब का योगदान दिया था।

क्‍या है संयुक्‍त राष्‍ट्र
गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मकसद अंतरराष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने में सहयोग करना, अंतरराष्‍ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, मानव अधिकार और विश्व शांति शामिल है। आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्‍टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकारपत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ हुई थी, जिसमें भारत ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्‍ट्रीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित किया था। वे चाहते थे कि भविष्य में फिर कभी इस तरह विध्‍वंसकारी युद्ध सामने न आए। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश (संयुक्त राज्य अमेरिका, फ़्रांस, रूस और संयुक्त राजशाही) द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत अहम देश थे।

यूएन के सदस्‍य देश 
वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र में 193 देश हैं। यूएन संरचना में आम सभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक व सामाजिक परिषद, सचिवालय और अंतराष्‍ट्रीय न्यायालय शामिल है। संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में स्थित है। इसके अलावा और अहम संस्थाएं जीनेवा, कोपनहेगन आदि में भी है।

यूएन की भाषा
संयुक्त राष्ट्र ने 6 भाषाओं को राज भाषा के तौर पर स्वीकृत किया हुआ है। इसमें अरबी, चीनी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनिश शामिल हैं। इनमें से केवल अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी भाषा को ही काम-काज की भाषा के तौर पर माना गया है। आपको यहां बता दें कि इसकी स्थापना के समय, केवल चार राजभाषाएं स्वीकृत की गई थीं, जिनमें चीनी, अंग्रेज़ी, फ्रांसीसी और रूसी भाषा शामिल थी।

 

साभार दैनिक जागरण से

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