सबकी मुस्कान का कारण बनना चाहती हूँ : अनिता यादव

अनिता यादव, काठमान्डू ।

धोती और टोपी की लडार्इ ने हम सब नेपाली एक दिन न धोती, न टोपी के हो जायंगे। वैशाख में बडा भूकम्प गया, विश्वभर के सभी लोगों ने हमारे प्रति सम्वेदना प्रकट करते हुए सहयोग किया। इतिहास के ही त्रासदीपूर्ण उस दुखद् घडी में किसि ने यह नही पूछा कि तुम पहाडी हो ? मधेसी हो ? थारू हो ? दलित हो ? उस समय एकमात्र भावना थी हमारे बीच– नेपाली होने की, मानवता की। टोल के मैदान मे एक ही टेन्ट के नीचे पहाडी, मधेसी, बाहुन, दलित सब मिलकर रहे थे, दुःख सुख मिलकर बांटे थे। क्या उस समय टेन्ट के नीचे एक होकर आश्रय लेते जैसा आज हम एक देश के अन्दर एक होकर रह नहीं सकते ? मै किसी दल या पार्टी से सरोकार नही रखती।

अनिता यादव

अनिता यादव

मै मानव हूँ, महिला हूँ, एसियन हूँ, साउथ एसियन हूँ, नेपाली हूँ, मधेसी हूँ जनकपुर की यादव हूँ । मै मानवता के लिए लडाइँ, या जाति व वर्ग के लिए ? ये आप ही बताएँ , सकारात्मक सोच के लिए हम नीचे से उपर की ओर जाएं या उपर से नीचे की ओर जाएं ? मेरा मधेसीपन, मधेसी संस्कार, मधेसी संस्कृति और यादव थर कोई भी छीनकर नहीं ले जा सकता पर और हैं जो खोकर, बेचकर, टूटकर जा सकते हें । मुझे मधेसी होने पर बहुत गर्व है पर उस से भी ज्यादा गर्व है नेपाली होने पर। आजकल कभी–कभी नेपाल ही नही रहेगा कर के मुझे एकदम चिन्ता होती है। सभी जातियां मिलकर बैठे हें वही अच्छा है। एक ही टेबुल मे दस प्रकार के विचार आना वही ठीक है। पर, काटमार, गोलीगठ्ठा तथा द्वन्द्व से कोई परिवर्तन नही आएगा । विचार से मनुष्य बड़ा होता है।

राजनीति हमको प्रभावित तो करता ही है। मै सामाजिक विज्ञान की विद्यार्थी होने के नाते भी समाज में राजनीति के प्रभाव के बारे में अच्छी जानकारी रखती हुं। अभी तराई में हो रहे घटना से मन रो रहा है। स्वाधीनता, राष्ट्रिय एकता और सार्वभौमसत्ता के नाम में देश का ये हाल ना करें। संसार फैलतेक्रम में है पर नेपाल तो सिकुडते क्रम में आगे बढ रहा है। अब आप ही बताइए, विश्व में फैलना है कि छोटे छोटे प्रदेशों में सिकुडना ?

देश रहेगा तो जनता रहेगी, नेपाल रहेगा तो नेपालीत्व रहेगा। इसलिए आज मेरा देश है तो मै हूँ। मै नेपाली हूँ तो मेरा नेपाल देश है। मेरा नेपाल, मेरा देश मुझे प्यारा लगता है। अब तो एक हो जाएं हम सब नेपाली। कुछ करें समाज व देश के लिए। मुलुक सत्य, शान्ति, अहिंसा और मेलमिलाप की ओर आगे बढेगा तो अहंकार, हिंसा, विध्वंश, भय, त्रास मिटता ही जाएगा। सब को अपने स्वार्थ के लिए मात्र राजनीति करने की आदत त्याग्ना चाहिए। एक जाति समुदाय का मात्र नेता नही, राष्ट्र का नेता बनने की कोशिश करें। वंश और जाति से मानव भला और बुरा नही होता। उस के कार्य से मात्र होता है। इसलिए साम्प्रदायिक घृणा को संस्थागत ना करें। जीवन को सुन्दर फूल के रूप में देखें। मधेस आन्दोलन और नेपालीपन से एक साल से देश इतिहास के ही कठिन मोड में है। मधेस में अधिकार प्राप्ति का आन्दोलन चल रहा है पर नागरिकों की माँग के प्रति सरकार की संवेदनशीलता नही देखी गयी । क्या मधेस में बहा गया खून का कोई मूल्य नही है ? क्या मधेसी नेपाली नही हैं ? उन लोगों में भी नेपाली माता का ही बह रहा है । खून नेपाली का है चाहे हिमाल में बहे, मधेस या पहाड में बहे। यदि आप सच्चे नेपाली हें तो यह समय चुप रहकर बैठने का नही है। उत्पीडित लोगों के पक्ष में आवाज उठाना हमारा दायित्व है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। हो सकता है, कुछ मधेसी मूल के नेता की सोच नेपाली नही होगी पर यह बुद्ध का देश है यहाँ लाशों की राजनीति किसी हालत में ठीक नही है। १७ हजार ने जान गवांई फिर और भी गवां रहे हें। इस का बीज लगाने वालों को क्या कहें ? आन्दोलन में मरने वाले तो आखिर सामान्य नेपाली जनता ही है। कल यह आग अन्यत्र भी नही लगेगी नही कहा जा सकता। कभी सीमा, कभी धर्म, कभी जात के लिए नेपाल में कब तक खून की नदी बहाएं ? यह कैसा लोकतान्त्रिक अभ्यास ?

earthquake-553e47893a04e_exlst

मरने और मारने के क्रम से समाधान नही, देश को और समस्या में धकेल देता है। वह किसी के हित में नही है। अतः युद्ध नही, बुद्ध मन लेकर सब एकजुट होकर वर्तमान समस्या क समाधान निकालना पडेगा। मधेसी, पहाडी, हिमाली, जनजाति, महिला सब नेपाल की जनता हैं। सब के लिए लडें, सब को गले लगाएँ। नश्लवादी व क्षेत्रवादी सोच देश की एकता व निष्ठा के लिए बहुत घातक था, है और होगा। कल क्या हुआ कहने से भी आज क्या होरहा है और कल क्या होना चाहिए, इस विषय में ज्यादा केन्द्रित होकर सब क्षेत्र और वर्ग को लाभ होगा। प्रदूषित सोच से समाज को बचाना जरुरी है। इसलिए जातीयता नहीं, आत्मीयता खोजें। साम्प्रदायिकता और क्षेत्रीयता नही, राष्ट्रियता रोजें।

समाजसेवा निस्वार्थ भावना से समाज परिवर्तन के लिए किया जाता है। इसलिए आशा है, मेरी छोटी सी कोशिश से समाज कुछ परिवर्तन हो सकता है । जिस से औरों का दुःख देखा नही जाए, जिस का हृदय औरों का दुःख देखकर विदह्वत नही होता, उस आदमी में मानवीय गुण नहीं होता है। मैने कल्पना किया की है समाज में पहुंचने की पर अभी बहुत कोशिश करनी बांकी है। इसलिए मेरी कोशिश जारी रहेगी। आज इस देश को पद का महत्व न रखने वाले महात्मा गान्धी, मदर टेरेसा, मार्टिन लुथर किङ्ग जैसे नेता की आवश्यक है ।

मेरे पास बहुत से विकल्प थे पर मैने पैसों से ज्यादा आवेग को चाहा। उदासीनता से ज्यादा सहानुभूति को चाहा। मैने तीक्ष्णता से ज्यादा प्रेम को चाहा। घृणा से ज्यादा मुस्कान को चाहा। अपनी खुशी के साथ एक गरीब दुःखी के होठों में मुस्कान देखने की चाहत और मेरी कोशिश सदा रहेगी व उस से भी ज्यादा उनलोगों की मुस्कान का कारण बनना चाहती हूँ।

Loading...