“सब कुछ है परन्तु कुछ भी नहीं”:कैलास दास

जनकपुर। दिसम्बर से मार्च तक जनकपुर में भारतीय पर्यटकों की लाइन लगी रहती थी। कडी ठण्ड के वावजूद भी नङ्गे पांव अर्थात् बिना जुता(चप्पल के यात्री होते थे। खास कर भारत के दिल्ली, कोलकात्ता, मद्रास, हरियाणा, पञ्जाब से बडÞी आस्था और विश्वास के साथ पर्यटक जनकपुर दर्शन के लिए आते रहे हैं।
कैसे न आएं ! जहाँ धर्म है, वहीं तोर् इश्वर का वास होता है। और जनकपुर में तो स्वयं भगवती सीता ने जन्म लिया था, जिनकी चर्चा विश्व मंे त्रेता युगा से ही होती आ रही है। कहते है, ‘अन्यत्र किया गया पाप जनकपुर दर्शन से मिट जाता है और जनकपुर में किया गया पाप अन्यत्र कही नहीं मिटता।’
परन्तु बहुत ही अफसोस हो रहा है कि ‘यहाँ सभी कुछ है परन्तु कुछ भी नही’ अर्थात् कहने का मतलव राज्य जानता है जनकपुर में पर्यटकों के लिए पर्यटकीय धरोहर कौन(कौन सी है। कैसे पर्यटकों को ज्यादा से ज्यादा दिनों तक रोका जा सकता है। लेकिन अपार सम्पदा और धरोहर होते हुए भी इसका संरक्षण और सौन्दर्यीकरण नहीं होने के कारण पर्यटक नहीं रुक पाते हैैं।
इसका संरक्षण, सर्म्बर्द्धन और सौन्दर्यीकरण से राज्यको कई प्रकार के फायदे हैं। पहला तो पर्यटकीय गाडिÞओं से -प्राप्त भन्सार का महसूल कर) राजस्व में वृद्धि होगी। दूसरा स्थानीय स्तर पर स्थानीय व्यवसायी को लाभ होगा। तीसरा धार्मिक दर्शनिक स्थलों पर अगर मनमोहक, मनोरञ्जनात्मक, कलात्मक पर््रदर्शनी के साथ ही तालावो में बोट रख दी जाए और कुछ न्यूनतम शुल्क लिया जाए तो सरकार फायदे में रहेगी। इसी तरह जनकपुर से सटे धनुषा, महोत्तरी, सिरहा -लहान) र्सलाही सहित तर्राई के अन्य धार्मिक और दर्शनीय स्थलो का प्रचार-प्रसार हो तो पर्यटक और राजस्व मंे वृद्धि होगी। इसके लिए राज्य और स्थानीयवासियों को खुलकर आगे आना होगा।
जनकपुर में एक-से-एक ऐतिहासिक एवं धर्म से जुडÞे पोखरे हैं। सैकडों मन्दिर हैं। दर्जनों ऐसे स्थान है- जहाँ धर्म और कर्म से जुडÞी वस्तुएँ हैं। लेकिन इन सबों का संरक्षण, सर्म्बर्द्धन एवं सौन्दर्यीकरण बिना विकास सम्भव नहीं है। यहाँ के दर्जनौं पोखर और मन्दिर अतिक्रमण में पडकर लुप्त प्राय हो रहे हैं। यहाँ तक कि मन्दिर तक जाने के लिए रास्ते भी बन्द कर दिए गए हैं। लेकिन इसके विरोध में न तो स्थानीय स्तर से कोई आवाज उठ रही है और नहीं राज्य स्तर से किसी प्रकार की कारवाई हो रही है।
अगर हम सच में जनकपुर को  तर्ीथयात्रिओं की भावना के अनुरुप विकास करना चाहते हैं तो धार्मिक पुरातत्व का अनुसन्धान होना चाहिए, और उन्हे प्रचार-प्रसार के माध्यम द्वारा इस स्थल को विश्व सम्पादा सूची में सम्मिलित करना होगा। राजा जनक का दरबार कहाँ था – ऐसे बहुत सारे प्रश्न है जो अपने आप में बहुत माने रखते हैं।
एक दिन की घटना है- जब पंक्तिकार जनक मन्दिर के दक्षिणी द्वार पर चाय पी रहा था। तभी भारतीय एक तर्ीथ यात्री ने पूछा, ‘भाई साहेब ! जनक का दरबार किधर है -‘ पंक्तिकार ने बडी आसानी और सरल भाषा में कहा, ‘यही है, आप आगे से पर्ूवारी द्वार पर जाकर राजा जनक का दर्शन कर सकते हैं।’
कुछ देर बाद फिर से वही तर्ीथयात्री जनक मन्दिर की चारो तरफ घुमकर आया और बोला, ‘भाई साहेब ! क्यो मजाक कर रहे हैं -‘ पंक्तिकार ने उनकी बातों पर आर्श्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, ‘क्या जनक के दर्शन नहीं हुए -‘
तर्ीथयात्री उदास होकर बोला, ‘भाई साहेब, ये तो मन्दिर है, मैं तो राजा जनक की दरबार की बात कर रहा हूँ। जहाँ हजारों ऋषिमुनी धर्म की चर्चा करते थे। राज महल था। भरी सभा में भगवान राम ने धनुषा तोडÞकर माता सीता से स्वयंबर रचाई थी। क्या यही जनकपुर है -‘
उनकी बातों को सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। अगर वास्तव में राजा जनक का दरबार था तो क्या हुआ – अतिक्रमण कर लिया गया या अनुसन्धान नहीं होने पर पता नहीं चला – बहुत गहरा प्रश्न है। वैसे बहुत सारे प्रश्न हैं जो अभी भी अनुसंधान की खोंज में है।
जब मिथिला नगरी की चर्चा उठती है तो लोग कहतेे जनकपुर र्स्वर्ग है। यहाँ पर देवगण भी अवतार लेने के लिए ललायित होते थे। ऋषि मुनि की तपोभूमि है, जनकपुर। यहाँ पुष्प की वषर्ा होती थी। बात तो सच है। लेकिन अभी जनकपुर की दर्ुदशा देखकर लगता है- जहाँ पुष्प वषर्ा होती थी, वहाँ पर अभी कीचड ही कीचड है। जहाँ देवगण अवतार लेने के लिए ललायित रहते थे, वहाँ पर मच्छर अवतार ले रहे है।
जनकपुर को पर्यटकीय स्थल बनाने के लिए जानकी मन्दिर और पोखरे दिखा कर मात्र पर्यटकों को आकषिर्त नहीं किया जा सकता है। उसके लिए वातावरण, साँस्कृतिक, भेषभूषा, गीत(नाद तथा रमणीय स्थल -लव प्वाइन्ट) को व्यवस्थित कर पर््रदर्शन करना होगा। पर्यटकों के लिए नाट्यशाला, म्यूजियम तथा पार्क होना चाहिए, जहाँ वे लोग घुमफिर कर सकें। स्वच्छ वातावरण महसूस कर सकें। नाट्य घर में जाकर यहाँ की कला-संस्कृति का अध्ययन कर सके। भेष भूषा तथा रीति-रिवाज का अवलोकन कर सकंे। इसका दायित्व राज्य और स्थानीयवासी दोनो पर है। तभी हम सही मायने में कुछ हद तक जनकपुर का पर्यटकीय विकास कर सकते हैं।

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