समग्र मधेश एक प्रदेश ही क्यों ?

गोपाल ठाकुर:रघुनाथ ठाकुर नेतृत्व का मधेश जन क्रांतिकारी दल से लेकर तत्कालीन नेकपा –माओवादी) द्वारा संचालित जनयुद्ध तक मधेश को एक राष्ट्र के रूप में ही घोषित किया गया है । जनयुद्ध के दौरान माओवादियों द्वारा गठित मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के तहत मधेश में चलाये गए मधेश मुक्ति आंदोलन इसका प्रमाण है । इसके साथ साथ सन् २००७ में हुए पहले मधेश आंदोलन ने संघीयता को और दूसरे मधेश आंदोलन ने समग्र मधेश एक प्रदेश के एजेंडा को सिर्फ स्थापित ही नहीं किया, अंतरिम संविधान में भी दर्ज कराया । यह इसलिए कि हमारा राष्ट्र या देश मधेश है और हमारी राष्ट्रीयता मधेशी है किंतु राज्य है नेपाल नाम का गोर्खा साम्राज्य । राजशाही, राणाशाही, संवैधानिक राजशाही और आज के लोकतांत्रिक गणतंत्र तक हम ने शासकों के चेहरे तो बदलते देखा है किंतु उनकी मौलिकता में किसी तरह का अंतर होने की अनुभूति नहीं की । कल यह सामंती साम्राज्य था तो आज भी नवसामंती साम्राज्य ही सावित हुआ है । जारी सातवाँ संविधान इसका सब से पिछला उदाहरण है । हम राष्ट्रीय पहचान सहित की संघीयता बहाल करना चाहते थे । किंतु खस–गोर्खाली चरम साम्प्रदायिक उपनिवेशकों ने भौगोलिक या प्रादेशिक संघीयता का झांसा देकर महेंद्रीय मण्डलीय अंधराष्ट्रवादी अवधारणा को ही हम पर थोपने का दुस्साहस किया है । यानी मधेश आज भी परतंत्र है । परतंत्रता से मुक्ति का गंतव्य तो स्वाधीनता ही है । किंतु आज की २१वीं शदी में एक नई अवधारणा भी आई है, अंतरनिर्भरता ९क्ष्लतभच–मभउभलमभलअभ० । इसका अभ्यास गोर्खा साम्राज्य को राष्ट्रीय आत्म–निर्णय का संवैधानिक अधिकार सहित राष्ट्रीय पहचान पर आधारित संघीयता के जरिए पूर्ण रूपेण संघीय नेपाल का निर्माण कर किया जा सकता है जहाँ समग्र मधेश एक प्रदेश होगा ।

किंतु इसके लिए कुछ भ्रांतियों से मुक्त होना जरूरी है । मधेश और मधेशी अब तक आम तौर से भ्रांतियों के बीच सताये जा रहे हैं । नेपाल के खस–गोर्खाली घरेलु सामंती साम्राज्यवादी एवं आंतरिक उपनिवेशवादी शासक मधेश की भूमि तो हड़पकर बैठे हैं और दिनानुदिन उसका भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं, साथ साथ मधेशियों को अपनी ही भूमि पर राज्यविहीन अवस्था में रहने को विवश कर रखे हैं । ऐसा करने के लिए उन्होंने भ्रम की खेती जरूर की है जिसके तहत वे सभी मधेशियों को औपचारिक या अनौपचारिक रूप से भारत से आये आप्रवासी करार देते हैं । इसलिए खास तौर पर मधेश और मधेशी जो गोर्खाली उपनिवेश नेपाल में धरतीपुत्र तो हैं परंतु नेपाली नहीं हैं, इस कड़वे सच को आप सबके सामने रखना मुनासिब होगा ।
मधेश ‘मध्यदेश’ के अपभ्रंश के रूप में नेपाल में प्रयुक्त होता आ रहा है । निश्चित रूप से जब मध्यदेश अस्तित्व में था, नेपाल और भारत बने ही नहीं थे । मध्यदेश की सीमा के बारे में अगर कहा जाए तो विनयपीटक को उद्धृत करते हुए पश्चिम में थानेश्वर से पूर्व में भागलपुर तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्याचल पर्वत तक इसका फैलाव बताया गया है (वर्मा, १९५५ः९) । वर्मा द्वारा उद्धृत यह तथ्य स्पष्ट बतलाता है कि नेपाल भी मध्यदेश के तहत ही था । साथ ही नेपाल का निर्माण भी मध्यदेशियों ने ही किया और कई शताब्दी शासन भी किया । क्योंकि खस–गोर्खाली इतिहासकार भी नेपाल के प्रथम शासकों के रूप में गोपाल और महिषपाल वंशों का नाम लेते हैं जो मध्यदेशी थे । मल्लकाल तक नेपाल घाटी में भोजपुरी व मैथिली का प्रयोग राजकाज के लिए होना भी इस बात का प्रमाण है ।
ऐतिहासिक घटनाक्रम में गोर्खा का राजा पृथ्वीनारायण शाह ने चक्रवर्ती सम्राट बनने का सपना देखा था । इसलिए अपने गोर्खा राज्य विस्तार के क्रम में उसने पहाड़ के छोटे–छोटे राजवाड़ों को तो जीता ही, उसकी नजर थी मकवानपुर के सेन राज्य पर जो मधेश का अच्छा–खासा हिस्सा था । इसलिए पहले शादी–संबंध और बाद में षड्यंत्रमूलक ढंग से युद्ध का सहारा लेकर मकवानपुर सहित मधेश में गोर्खा राज्य का विस्तार होता रहा । किंतु मधेशियों के साथ पृथ्वीनारायण या उनके वंशजों का व्यवहार बिलकुल क्रूर और अमानवीय ही रहा । इसी दौरान बेलायती साम्राज्य भी भारतीय उपमहाद्वीप को निगल रहा था । स्वाभाविक है इन दोनों के बीच युद्ध होना था और हुआ भी । सन् १८१४ में गोर्खा और बेलायती साम्राज्य के बीच युद्ध हुआ । युद्ध में इन गोर्खालियों के द्वारा सताये गये मधेशी भला इन्हें साथ क्यों देते ! परिणामतः इन्हें युद्ध में मँुह की खानी पड़ी और सन् १८१५ में सुगौली में संधि हुई जिसके तहत इन्हें मेची से महाकाली तक पहाड़ों में ही सीमित रहना पड़ा । हाँ, इनके सरदारों के लिए अंग्रेजों ने सलाना दो लाख रूपये की जागीर मंजूर की थी । किंतु मधेशी भूभाग के बिना इनका जीना मुहाल था । इसलिए इन्होंने अंग्रेजों की जबर्दश्त खुशामद की । अतः सुगौली संधि के बाद सन् १८१६ की बेलायती शर्तबंदी के तहत पूरब मेची नदी से पश्चिम राप्ती नदी तक का कुछ मधेशी भूभाग देते हुए अंग्रेजों ने सलाना दो लाख रूपये की जागीर को खारिज कर दिया । इसके बाद सन् १८५७ में नेपाल की राणाशाही द्वारा भारत का सिपाही विद्रोह दबाये जाने के पारितोषिक में सन् १८६० की गोर्खा–बेलायत संधि के तहत राप्ती नदी से पश्चिम शारदा (महाकाली) नदी तक का कुछ भूभाग भी इन्हें पारितोषिक में सौंप दिया । इस तरह मिथिला, भोजपुर और अवध का हिस्सा, जो मध्यदेशीय क्षेत्र था, वर्तमान नेपाल में अंगीकृत कर दिया गया ।
इसके साथ साथ वि.सं. १९९० (१९३३ ई.) तक यहाँ की कोई भाषा नेपाली नहीं थी । वि.सं. १९७० (१९१३ ई.) में बनी गोरखा भाषा प्रकाशिनी समिति को ही वि.सं. १९९० (१९३३ ई.) में नेपाली भाषा प्रकाशिनी समिति करार दे दी गई । पहले ‘खसकुरा’ यानी खस बोली को इस समिति के जरिए गोरखा भाषा में स्तरीकृत किया गया और पुनः इसी भाषा को नेपाली के नाम से स्तरीकृत करने के लिए इस समिति को यह नया नाम दे दिया गया । ऊपर के उद्धरणों से यह साफ हो जाता है कि अगर नेपाली नाम से किसी भाषा को स्तरीकृत होने का हक था तो वो थी नेपाल घाटी के नेवारों की भाषा जिसे आज भी नेपाल भाषा कही जाती है ।
गोर्खालियों के द्वारा नेपाल की अन्य राष्ट्रीयताओं का परायीकरण करने का औपचारिक रूप से यह राज्य प्रायोजित औपनिवेशिक प्रयास था । इससे ये उस मनोविज्ञान का जन्म देना चाहते थे कि जो इस भाषा का प्रयोग नहीं करता वो नेपाली नहीं । नेपाल एक बहुभाषी देश है जैसे भारत, पाकिस्तान या और भी देश हैं । तो न भारत में कोई एक भारतीय भाषा है ना ही पाकिस्तान में कोई एक पाकिस्तानी भाषा तो बहुभाषी देश नेपाल में किसी एक जाति या राष्ट्रीयता की भाषा नेपाली कैसे होगी ? राज्य के इस साजिश के तहत भी मधेश और मधेशी नेपाली नहीं हो सकते और व्यवहार में कुछ लोगों के लाख प्रयास के बाद भी ऐसा होता नहीं देखा गया है । परंतु वि.सं. २००७ (१९५०–५१ ई.) के राजनीतिक बदलाव के बहुत बाद तक सरकारी दस्तावेजों में गोरखा राज्य ही लिखा जाता रहा । इसके साथ ही विदेशी सैनिक के रूप में काम कर रहे नेपालियों की टुकडि़यों को ‘गोर्खा बटालियन’ कहा जाना, नेपाल के सबसे बड़े सरकारी अखबार का नाम अब तक भी ‘गोरखापत्र’ होना, राज्य के आधिकारिक दस्तावेजों में ‘गोरखा राज्य’ और ‘गोरखा सरकार’ लिखा जाना इस तथ्य को मजबूती के साथ प्रमाणित करते हैं कि नेपाल अब भी गोरखा साम्राज्य ही है जिसे जबरन नेपाल और नेपाली कहकर यहाँ की बहुलता को दबाया जा रहा है जिसमें मधेश और मधेशी सबसे अधिक दबाये गये हैं ।
इसके बावजूद आज शासकों ने मधेशियों के बीच आपसी मतभेद के कुछ बीज बो दिया है । आज हमारे बीच आदिवासी जनजाति, थारू–बाजी, हिंदू–मुस्लिम, दलित–गैरदलित, विकसित–पिछड़ावर्ग जैसी शब्दावलियों का मधेश विरोध के लिए बहुत हद तक दुरुपयोग ही किया जा रहा है । अतः हमें इस भ्रांति से भी उबरना पड़ेगा कि मधेशी कौन हैं ।
थारू जाति के साथ साथ मूलतः अनार्याें की मूल भूमि के रूप में रहा चुरिया पठार के बीच की घाटियों को गोर्खा साम्राज्य के तहत भीतरी मधेश और इससे नीचे के समतल भाग को मधेश के नाम से संबोधित किया जाता रहा है । इसलिए कथित ‘नेपाली’ नाम की खसभाषा को परंपरागत रूप से मातृभाषा या संपर्कभाषा के रूप में प्रयोग न करनेवाले मधेश से भीतरी मधेश तक के मूलवासियों को सामान्यतया मधेशी कहकर इन खस–गोर्खाली शासकों ने ही घृणा की दृष्टि से ही सही, परिभाषित करता आया है । यही यथार्थ भी है । नेपाल का कानूनी दस्तावेज भी इस यथार्थ की पुष्टि करता है ।
फिर भी किसी के कहने से ही किसी पहचान को स्वीकार करना या न करना कोई मजबूरी नहीं है । इसके लिए वस्तुगत आधार पर समानता और विविधता को तुलनात्मक रूप से परखना होगा । इसलिए मधेश भीतर के किसी एक ही समुदाय की आकांक्षा अनुसार सभी को एक ही छाते के भीतर गोलबंद करने की कोई आवश्यकता भी नहीं होगी । क्योंकि हमारा मधेश भी बहुरंगी है । यहाँ आर्य, मंगोल, आग्नेय, द्रविड मूल के मानव समुदाय रहते हैं । भाषा के सवाल पर भी यहाँ हिंद–आर्य, भोट–बर्मी, आग्नेय, द्रविड भाषा परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं । धार्मिक हिसाब से हिंदू, इस्लाम, बौद्ध, इसाई धर्मावलंबी बसते हैं ।
इसके बावजूद मूलतः यहाँ किसी की भी मातृभाषा या संपर्कभाषा इस क्षेत्र में खस–गोर्खाली या ‘नेपाली’ नहीं है । इसके साथ साथ यहाँ की सभी जनभाषाओं के बीच उच्चस्तर की बोधगम्यता तो है ही, हिंदी की बोधगम्यता से यहाँ कोई परे नहीं हैं । इसके साथ साथ जमीन का मापन यहाँ सभी जगह बिगहा, कट्ठा और धूर में होता है । जलवायु सभी जगह समशीतोष्ण है । इसी आधार पर भोजन, लिवास और जीवनशैली में एकरूपता है । अर्थात मुख्य भोजन के रूप में दाल, भात, तरकारी मुख्य लिवास के रूप में धोती–कुर्ता, कुर्ता–पैजामा, लहंगा–चोली, साड़ी–ब्लाउज सभी जगहों पर लोग लगाते हैं । इसी तरह संपर्कभाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग सर्वत्र होता है ।
इसलिए मधेश या भीतरी मधेश के मूलवासी के रूप में रही थारू, बाँतर, दनुवार, राजवंशी, ताजपुरिया सहित की आदिवासी जनजातियाँ, आर्य वंशज के रूप में परिचित्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कर चारो वर्णाें के हिंदू के साथ साथ मुस्लिम, जैन, सिख, इसाई सभी के सभी खस–गोर्खाली इतर भाषाभाषी मधेशी हैं और इन सभी का राष्ट्र मधेश है जिसे गोर्खा साम्राज्य में अब तक गुलाम बनाकर रखा गया है ।
ऊपर के तथ्यों को देखने के बाद सामान्य जन भी यह जरूर समझ लेंगे कि नेपाल गोर्खा साम्राज्य का अंगीकृत नाम है जो कभी एक राष्ट्र राज्य ९ल्बतष्यल क्तबतभ० नहीं हो सकता । इसके लिए हमें राष्ट्र और राज्य के बीच के अंतर को समझना होगा ।
हमारे पूर्वीय अभ्यास में ‘राजृ’ धातु से कर्म में ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय जुड़ने से संस्कृत में राष्ट्र शब्द बनता है अर्थात विविध संसाधनों से समृद्ध निश्चित सांस्कृतिक पहचान वाली जनता ही राष्ट्र है जिनकी समान भाषा, धर्म, इतिहास, नैतिक आचार या मूल उद्गम होते हैं । अतः राष्ट्र लोगों की मानसिकता की निर्मिति होता है । हम यह भी कह सकते हैं कि राष्ट्र यानी लोग होते हैं ।
तो किन लोगों का राष्ट्र बनता है ? इसके लिए मोटी–मोटी तीन शर्ते हैं— पहली शर्त है, जिस भूमि पर लोग रहते हैं, उस भूमि के प्रति उनकी भावना, दूसरी शर्त है, इतिहास में घटित घटनाओं के संबंध में समान भावनाएँ चाहे वह आनंद की हो या दुःख की, हर्ष की हो या विस्मय की और तीसरी जो सबसे अधिक महत्त्व की शर्त है, समान संस्कृति की ।
इसीलिए राष्ट्र के लिए शासक और शासित में अंतर होना वर्जित बताया गया है । यानी पूर्ण स्वराज की अनुभूति सहित की किसी निश्चित क्षेत्र की जनता को राष्ट्र कहा जा सकता है ।
अगर पश्चिमी अभ्यास की बात करें तो इहायचम ब्मखबलअभम ीभबचलभचुक म्ष्अतष्यलबचथ में राष्ट्र को एक तरफ किसी खास क्षेत्र में एक ही हुकूमत में रहे एक ही भाषा, संस्कृति और इतिहास का साझेदार जनसमूह बताया गया है तो दूसरी ओर किसी देश की पूरी जनता को ।
ल्बतष्यलस् ब अयगलतचथ अयलकष्मभचभम बक ब नचयगउ या उभयउभि धष्तज तजभ कबmभ बिलनगबनभ, अगतिगचभ बलम जष्कतयचथ, धजय ष्खिभ ष्ल ब उबचतष्अगबिच बचभब गलमभच यलभ नयखभचलmभलतस बिि तजभ उभयउभि ष्ल ब अयगलतचथ।
इसी तरह ‘देश’ की बात करें तो हमारे पूर्वीय अभ्यास में इस शब्द की उत्पत्ति ‘दिश’ धातु से हुई है यानी दिशा ‘देश’ बनी है जिसका अर्थ भूगोल और सीमाओं से है । इस अभ्यास में यह हुकूमत से भी संबंध रखा दिखता है ।
जब हम पश्चिमी अभ्यास की ओर जाते हैं तो इहायचम ब्मखबलअभम ीभबचलभचुक म्ष्अतष्यलबचथ ने इसे एक निश्चित क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया है जिसकी अपनी हुकूमत और कानून वर्तमान में हैं या विगत में हुआ करते थे । इसके अतिरिक्त इसके पर्यायवाची शब्द के रूप में इस शब्दकोश ने देश की जनता, समष्टि में राष्ट्र और गैर शहरी क्षेत्र को भी देश बताया हैः
ऋयगलतचथस् बल बचभब या बिलम तजबत जबक यच गकभम तय जबखभ ष्तक यधल नयखभचलmभलत बलम बिधकस तजभ उभयउभि या ब अयगलतचथस तजभ लबतष्यल बक ब धजयभि, बल बचभब यगत या यगतकष्मभ तयधलक बलम अष्तष्भक, धष्तज ाष्भमिक, धययमक, ाबचmक, भतअ।
इस प्रकार पूर्वीय या पश्चात्य किसी भी अभ्यास या परिभाषा के साथ साथ हमारे इतिहास को देखने के बाद हमारा मधेश पूर्णतया एक राष्ट्र तो है ही, एक देश भी है जिसकी सार्वभौमिकता शासकों की छीनाझपटी के कारण लुट गई है । इतना ही नहीं, बेलायती और गोर्खाली उपनिवेशकों ने इसे अलग अलग साम्राज्यों में भी बाँट दिया । हाँ, आजादी के बाद भारत में इसका भारतीयकरण कर लिया गया किंतु नेपाल में अब भी यह अपनी परतंत्रता की पीड़ा भुगत रहा है ।
इसी प्रकार हमारे यहाँ सबसे अधिक सवाल उठाये जाते हैं हमारी राष्ट्रीयता पर । तो बेशक हमारा राष्ट्र और देश, परतंत्रता में ही सही, मधेश है तो हमारी राष्ट्रीयता मधेशी ही है । राष्ट्रीयता के बारे में भी यहाँ पूर्वीय और पश्चिमी दोनों अभ्यासों पर एक नजर डालना ही उचित होगा ।
‘राष्ट्र’ शब्द में ‘इय’ प्रत्यय लगने के बाद विशेषण और पुनः इसमें ‘ता’ प्रत्यय के बाद फिर से संज्ञा बन जाती है ‘राष्ट्रीयता’ । इस तरह राष्ट्र के स्तर पर अगर कुछ सोचा या किया जाए तो उस सोच या कार्य को राष्ट्रीय कहा जाएगा और ऐसे करने की मानसिकता ही राष्ट्रीयता होगी । इस तरह राष्ट्र के हित के लिए किया गया समर्पण ही ‘राष्ट्रीयता’ है । फिर यही मानसिकता बाद में किसी राष्ट्र की या वहाँ की जनता की पहचान बन जाती है । इस अर्थ में राष्ट्रीयता भी अपनेआप में किसी राष्ट्र की जनता को ही संबोधित करती है ।
अगर पश्चिमी अभ्यास की ओर जायें तो इहायचम ब्मखबलअभम ीभबचलभचुक म्ष्अतष्यलबचथ ने इसे किसी राष्ट्र के होने का अधिकार तथा समान भाषा, संस्कृति और इतिहास वाले जनसमूह को बताया है जो किसी राजनीतिक राष्ट्र के हिस्सा होते हैं ।
ल्बतष्यलबष्तिथस् तजभ भिनब िचष्नजत या दभयिलनष्लन तय ब उबचतष्अगबिच लबतष्यलस ब नचयगउ या उभयउभि धष्तज तजभ कबmभ बिलनगबनभ, अगतिगचभ बलम जष्कतयचथ धजय ायचm उबचत या ब उयष्तिष्अब िलबतष्यल।
इस तरह राष्ट्र, राष्ट्रीयता और देश तक हम देखते हैं कि इनके लिए सार्वभौमिकता अनिवार्य शर्त नहीं है । किंतु जब हम राज्य की बात करते हैं तो वह निश्चित रूप से हुकूमत का पर्याय दिखता है । अतः राष्ट्र और देश के बहुत बाद में राज्य की उत्पत्ति हुई है । महाभारत के शांतिपर्व में कुछ ऐसा उल्लेख मिलता हैः
‘न वै राज्यं न राजाऽसीत् न दण्डो न च दाण्डिकस् ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् !’
अर्थात एक समय ऐसा था कि जब कोई राजा नहीं था, राज्य नहीं था, दंड नहीं था, दंड देने की कोई रचना भी नहीं थी । लोग ‘धर्म’ से चलते थे और परस्पर की रक्षा कर लेते थे । यहाँ ‘धर्म’ को किसी आध्यात्मिक विश्वास से नहीं वरन् लोगों के सामाजिक या राष्ट्रीय गुण से जोड़कर देखने पर सहज होगा ।
द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद समाज के इस चरण को आदिम साम्यवाद मानता है । यानी इस चरण में संचय की दृष्टि से उत्पादन नहीं होता था । जब ऐसा होने लगा तो निर्धन और निर्बल पर शासन करने के लिए ही राज्य की उत्पत्ति हुई जो एकल राष्ट्रीय राष्ट्र राज्य ९ःयलय–ल्बतष्यलब िल्बतष्यल क्तबतभ० था । किंतु इन प्रारंभिक शासकों की पदोन्नति जब राजा की श्रेणी तक पहुँची तो इस तरह के अनेक राष्ट्र राज्यों के बीच छीनाझपटी चलने लगी । यह दौर शुरुवाती पुँजीवाद तक चली । इस तरह सामंती गोर्खा साम्राज्य और पुँजीवादी बेलायती साम्राज्य के बीच की छीनाझपटी में हमारा मध्यदेश बँटा जो नेपाल में अब तक परतंत्र मधेश की अवस्था में है ।
जब कोई राष्ट्र परतंत्र होता है तो वहाँ की पूरी जनता को उसकी पीड़ा भुगतनी पड़ती है । जाहिर है सामंती साम्राज्य में औपनिवेशिक उत्पीड़न तो होना ही था । इसलिए जब गोर्खा–बेलायत युद्ध हुआ तो मधेशियों ने गोर्खालियों को साथ देने के बदले बेलायतियों को ही सहयोग किया था । इसका कारण यह था कि बेलायती भारत में जमींदारी और मुंसियत तक भारतीय ही होते थे । किंतु इन गोर्खालियों ने पूरा राज्य संयंत्र को ही मधेशी विहीन रखा था । इसका कारण यह था कि नेपाल घाटी पर आक्रमण के समय गोर्खाली सेना को मधेशी सेना से तीन बार मुँह की खानी पड़ी थी । इसलिए पृथ्वीनारायण शाह ने अपनी संतति को ‘देशी’ यानी मधेशियों को राजकाज से बाहर ही रखने का निर्देश दिया था । यह तथ्य तो सन् १८१६ में नेपाल के राजा द्वारा स्वीकृत बेलायती शर्तबंदी से भी उजागर होता है । उस में राप्ती नदी से पूरब मेची तक का मधेशी भूभाग देते समय अंग्रेजों ने मधेशियों की पीड़ा को उस ज्ञापनपत्र को स्वीकृत कराते समय उसकी ७वीं दफा में मधेशियों पर बेलायती हुकूमत को सहयोग करने के बदले किसी किस्मका दंड न देने की शर्त रखी थी जिसे गोर्खा शासक ने मान लिया थाः
ःयचभयखभच, तजभ च्बवबज या ल्ष्उब िबनचभभक तय चभाचबष्ल ाचयm उचयकभअगतष्लन बलथ ष्लजबदष्तबलतक या तजभ त्भचबष्, बातभच ष्तक चभखभचतबलअभ तय जष्क चगभि, यल बअअयगलत या जबखष्लन ाबखयगचभम तजभ अबगकभ या तजभ द्यचष्तष्कज न्यखभचलmभलत मगचष्लन तजभ धबच, बलम कजयगमि बलथ या तजयकभ उभचकयलक, भहअभउतष्लन तजभ अगतिष्खबतयचक या तजभ कयष्,ि दभ मभकष्चयगक या त्रगष्ततष्लन तजभष्च भकतबतभक, बलम चभतष्चष्लन धष्तजष्ल तजभ अयmउबलथुक तभचचष्तयचष्भक, जभ कजबिि लयत दभ ष्बिदभि तय जष्लमचबलअभ। – एयष्लत ठ, ःझयचभलमगm ायच ब्उउचयखब िाचयm द्यचष्तष्कज न्यखभचलmभलत बलम ब्अअभउतभम दथ ल्भउब ियल म्भअझदभच ज्ञज्ञ, ज्ञडज्ञट
किंतु इस शर्त की पालना हुई या नहीं, इसका कोई खयाल किए बिना सन् १८५७ के सिपाही विद्रोह दबाने के पारितोषिक में प्रथम राणा प्रधानमंत्री जंग बहादुर को अंग्रेजों ने राप्ती से पश्चिम शारदा (महाकाली) तक का मधेशी भूभाग भी १८६० में दे दिया । इस प्रकार इस मधेशी राष्ट्रीयता की परतंत्रता की कहानी शुरू होती है । इसके बाद से हमारी भूमि पर ही हमें अधिकारविहीन रखने का प्रपंच शुरू हुआ । पहले शाह और राणा की संतति और सैन्य अधिकारियों को हमारी भूमि की मालगुजारी वसुली का अधिकार दिया गया । बाद में उन्ही के नाम विर्ता, बक्शीस, मौजा के नाम पर उनका पूर्ण स्वामित्व भी कायम किया गया । किंतु प्राकृतिक विपदा के कारण वे खुद दाखिल नहीं होते थे । इसलिए कि मधेश में मलेरिया का खौफ जानलेवा था । फलतः उन्होंने पहले हमारे वन–जंगलों को अंग्रेजों से बेचा । यह दौर भारत की आजादी के बाद तक भी चला । इसी उद्देश्य से कुछ जगहों पर रेल भी बिछाई गई थी । अतः इससे यह पुष्टि होती है कि गोर्खा साम्राज्य ने मधेश के वैभव को लूटना और बर्बाद करना ही अपना परम धर्म समझ रखा है ।
चाहे कुछ भी हो, इन सभी पीड़ा का हम भरपाई तो किसी तरीके से भी नहीं कर सकते हैं । किंतु राष्ट्रीय आत्म–निर्णय के अधिकार की संवैधानिक सुनिश्चितता के साथ समग्र मधेश एक प्रदेश ही एक ऐसा न्यूनतम मार्गचित्र है, जहाँ हम साझा नेपाल के तहत अखण्डता, सार्वभौमिकता और स्वाधीनता का उपभोग कर सकते हैं ।

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