समझें किशोरों की मानसिकता को

चन्दा सिंह:जीवन मंे बदलाव होना बहुत ही जरूरी है, क्यांेकि बदलाव से हम लोग नई चीजों को अपनाते हैं और जीवन की नीरसता को दूर करते हैं । ठीक इसी तरह माँ-बाप भी अपने व्यवहार में बदलाव लाकर बच्चों से अपने रिश्तों में नयी ताजगी बनायें रख सकते हैं । किशोरावस्था में कदम रखने वाले बच्चों को बदलाव से होकर गुजरना पडÞता है, शारीरिक व मानसिक बदलाव के इस दहलीज पर बच्चों में अचानक तमाम परिवर्तन देखने को मिलते हंै ।bacha
कुछ अभिभावक काफी चिन्तित हो जाते हैं, उनको समझ में नहीं आता है, किशोर उम्र के बच्चों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए । क्योंकि इस दहलीज में कदम रखने वाले बच्चे अक्सर बदल जाते हैं । इस उम्र में बच्चे खास तौर पर खुद को ज्यादा परिपक्व या समझदार समझने लगते हंै । और माँ-बाप की अधिकतर नसीहतें उनको अच्छी नहीं लगती । जिसके कारण बच्चों और अभिभावक के बीच एक दूरी बन जाती है, इस दूरी को अभिभावक अपनी समझदारी से कम कर सकते हंै । किशोरावस्था में पहुंचे बच्चों के लिए ये समय काफी संवेदनशील होता है, जिसमें वो पुराने परिवेश से निकल कर एक नई शुरुआत करते हैं और शुरुआत चाहे कोई भी चीज की हो, थोडÞी बहुत परेशानी तो होती ही है । इसलिए इस बिषय में यदि माँ-बाप अपने बच्चों को सही ढंग से मार्गर्-दर्शन कर सकें तो, किशोरावस्था का यह समय कई मायने में सहज और आरामदायक हो सकता है ।
कल की बात छोडिÞये और आज को अपनाइये । अधिकांश माँ-बाप ये कहते सुने जाते हंै कि हम भी तो इस उम्र से गुजरे थे । हम ने तो कभी भी ऐसा नहीं किया, या फिर हमारे माँ-बाप ने हमंे कभी ऐसा नहीं करने दिया, इसी तरह कुछ बातें हंै जो अक्सर माँ-बाप अपने किशोर बच्चांे से कहा करते हैं । छोटे बच्चांे के मामले में बात और होती है उनका र्सर्म्पक इतना ज्यादा नहीं रहता है, जितना कि किशोर बच्चों का रहता है । और छोटे बच्चे ज्यादा से ज्यादा अपने माँ-बाप की निगरानी में ही रहते हैं, लेकिन बढÞती उम्र के बच्चे जब बाहरी दुनियाँ में प्रवेश करते हैं, तो नये-नये बदलाव को अपनाते हंै । मगर उनके साथ तालमेल बैठाने के लिए माँ-बाप को समय के साथ अपने आप में भी परिवर्तन लाना ही पडÞता है । ऐसा न हो, कि आप की ताना देने की आदत से आप अपने बच्चों से दूर हो जायें । मेरे कहने का मतलब यह है कि बात-बात पर बच्चों को गुजरे वक्त की नसीहतें देने के बजाय आज की जरूरत के हिसाब से समझाईए । इसका मतलब यह नहीं है, कि आप उनकी हर फरमाईश पूरी करें । लेकिन आप अपने खुद के व्यवहार में थोडÞी समझदारी से काम लेंं । किशोर-किशोरी को यह जताने की कोशिश ना करें, कि वो अभी भी बच्चें है, और सब फैसला लेने का हक उनके मँा-बाप का है, इससे उनमें नफरत घर बना सकती है । गलतियाँ माफ करने की जरूरत है, जिससे कि भविष्य में वो सही राह पकडÞ सकें । कोई भी काम के लिए बच्चों पर दबाव डालने के बजाय उनको उस काम के फायदे जरूर बतायें और निर्ण्र्ाालेने का अधिकार उनपर छोडÞ दें, इससे बच्चों के सोचने-समझने की क्षमता में विस्तार होगा ।
किशोर-किशोरी पर विश्वास करें भी और जतायें भी, इससे उनके आत्मविश्वास में बढÞोत्तरी होगी । छोटी-छोटी बातों पर टोका-टोकी करने से बचें । बेहतर यह होगा कि अगर आप एकांत में उनको प्यार से समझायेंगे तो इससे उनमें आप के प्रति सम्मान पैदा होगा । अभिभावक को चाहिए कि वो किशोर-किशोरी में आए बदलाव को पहचानने की कोशिश करंे, और उसके अनुसार बरताव करें, इससे आपसी तालमेल बढेÞगा । नयी जानकारियों का आदान-प्रदान करें, इससे बच्चे आपके करीब आएगें क्योंकि, बच्चों में भी अपने अभिभावक के प्रति प्यार होता है, बस उसे समझने की आवश्यकता है ।

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