समय की कसौटी पर दिल्ली, काठमांडू और मधेश

बाबुराम पौड्याल:इनदिनों दक्षिण एशिया के दो बेमिसाल दोस्ती के रिश्ताें में बंधे बताये जानेवाले देश नेपाल और भारत के बीच असमझदारी के चलते गतिरोध उत्पन्न हो गया है । दोनों देश के बीच ऐसी ही नौबत पहले भी आ चुकी है । तकरीबन सत्ताइस साल पहले भी जब नेपाल में

सबसे बडी बात नैतिकता है । नेपाल के हर राष्ट्रीय राजनीतिक आन्दोलन में आन्दोलनकारियों ओर से भी काठमाण्डो के खिलाफ भारत को जायज नाजायज रुप में उपयोग करने का प्रयास किया जता रहा है । यह एक परम्परा सी बन गयी है, जो बस्तुतःदेश के हित में नहीं है । यही सब अब मधेश के आन्दोलनकारी नेपाली कर रहे है तो उसको विरोध करने का नैतिक धरातल बचता ही कहां है । इसलिए भावना और संवेग से बाहर निकलकर हकीकत को गले लगाते हुये मूल्यों की राजनीति करने का विकल्प नहीं है ।
पंचायती राजतन्त्र का राज था तब भी इन दो देशों के रिश्ते में भारी अवरोध उत्पन्न हो गया था और व्यापार और वाणिज्य सन्धि नवीकरण को लेकर भारत की ओर से नेपाल पर नाकाबन्दी लगा दी गई थी । गतिरोध तकरीवन तेरह महीने बाद अन्त हो गया था । उसके तत्काल बाद छिड़े आन्दोलन ने नेपाल में बहुदलीय शासन का शुरु किया था । इसबार भारत अपनी ओर से नाकाबन्दी से इन्कार करते हुये नेपाल के मधेश में चलरहे आन्दोलन से उत्पन्न असुरक्षा को कारण बता रहा है । आश्विन १२ गते काठमाण्डों में नेपाल भारत मैत्री समाजद्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में नेपाल के लिए भारतीय राजदुुत रणजित रे ने सरहद पर नेपाल की ओर हो रही असुरक्षा को ही एक मात्र कारण बताकर भारत की ओर से अन्य किसी भी समस्या से इन्कार किया ।

परन्तु नेपाल में इस भारतीय कदम को मधेश में चलरहे आन्दोलन को सह देने के लिए किया गया अघोषित नाकाबन्दी माना जा रहा है । दुनिया को आश्चर्य लगता होगा कि रिश्तों को बारबार खटाई में डालने वाले ये दो देश कैसे बेमिसाल रिश्तों का ढिढोरा पीटने का समय निकाल लेते हैं । साल भर भी बीत नहीं पाये हैं भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री शुशील कोईराला ने काठमाण्डो में बेमिशाल दोस्ती का ढिंढोरा बडे जोरशोर से पीटा था । अब उस दोस्ती की अग्नि परिक्षा हो रही है । सत्ताईस साल पहले का और इसबार की नाकाबन्दी के माहौल में भिन्नताएं है । इसबार नेपाल संघीय गणतान्त्रिक युग में प्रवेश कर रहा है ।

इसके लिए नेपाली जनता को काफी बड़ी कुर्बानी देनी पडी है । काफी बडी मशक्कत के बाद अब संविधानसभा तकरीबन नब्बे फीसद मतों से संविधान जारी भी कर चुका है । भारत जो नेपाल के सभी राजनीतिक परिवर्तनों को किसी न किसी रुपसे प्रभावित करता आ रहा है इसबार नेपाल के नये संबिधान को स्वागत करने में कंजुसी दिखा कर अपनी नाखुशी जता चुका है । संविधान के स्वागत में भारत का कोताही बरतना उसके किसी मकसद पर ठेस पहुंचने का संकेत है । नेपाल चाहता था कि लम्बे प्रयत्न और कुर्बानियों के बाद बने संविधान को भारत खुलकर समर्थन करे । परन्तु ऐसा नहीं हुआ ।
नये संविधान जारी होने से पहले ही प्रक्रिया और कुछ एजेंडों के प्रति तराई के मधेशी और थारु समुदाय में असंतोष और अविश्वास का माहौल था । घोषणा के बाद असंतोष और उग्र होता गया । ऐसीबात नहीं है कि अकेले थारु और मधेसी ही नई संविधानके प्राति असन्तुष्ट हैं जातिवादी,दलित और हिन्दुवादी भी असन्तुष्ट हैं तो खसआर्य का शासकवृत भी अपने घटते दायरों के चलते खुश नहीं है । आखिरी वक्त पर भारतीय विदेश सचिव सुब्रमण्यम जयशंकर भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के विशेष दूत के रुप में नेपाल आकर नेताओं सामने संविधान की घोषणा फिलहाल कुछ समय असन्तुष्टों से और बातचीत के लिए टाल देने की पेशकश की । नेताओं को इस प्रस्ताव ने हैरानी में डाल दिया । संविधान के लिए चले विवाद में लम्बा समय व्यातित हो चुका था और एक संविधान सभा का विघटन भी हो चुका था । अगर इसबार भी संविधान बनाने में विफलता हाथ लगती है तो देश में और भयानक अस्थिरता का त्रास नेताओं को था । इसी त्रास ने भारत के प्रस्ताव को दरकिनार करते हुए आगे बढने का जोखिम नेताओं ने उठाया । जानकारों का मानना है कि दोनों देशों के बीच अभी चलरहे विवाद का यही प्रमुख कारण था ।
संविधान घोषणा के आगे और पीछे के दिनो में पुलिस की गोली से कई आन्दोलनकारियों की जानें गई हैं । टिकापुर में आन्दोलनकारियों द्वारा घर के आंगन में खेलते एक बच्चे के अलावा आन्दोलनकारियों को समझ ने पहुंचे एक पुलिस अधिकारी सहित अन्य पुलिसवालों की दर्दनाक मौत के बाद स्थिति और भी तनावग्रस्त हो गया । बताया जाता है इस घटना के बाद पुलिस भी आन्दोलन के प्रति आक्रमक हो गई जिसके कारण हिंसा को मात्रात्मक बढ़त मिली । तराई के कई आन्दोलन प्रभावित शहरों को सरकार ने दंगाग्रस्त घोषित करते हुये आंशिक रुप से सेना परिचालन और कफ्र्यु के आदेश दिये । इधर मध्य तराई में आन्दोलन अब सड़कें और भारत के साथ लगी भन्सारों को बन्द कर समुचे देश को आर्थिक नाकेबन्दी करने तक आ पहुंची है । जून आठ तारीख के बाद की हिंसा में चौवालिस लोगों की मौत हो चुकी है जिस में ग्यारह सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं ।
तकरीबन पिछले दो महीनाें से तराई का अधिकांश भाग आम हड़ताल को झेलता आ रहा है । लगातार के इस बन्द ने तराई का आम जनजीवन बहुत ही कठिन हो गया है । दैनिक मजदूरी से गुजारा करनेवाले निम्नवर्गीय लोग भूख के चपेट में है । जरुरत की चीजों की भारी किल्लत हो रही है । काला बजारियों की चांदी कट रही है । इस भयानक परिस्थिति से उबारने के लिए न तो सत्ता के लोगों ने चिन्ता दिखाई ना ही देश का बौद्धिक वर्ग और नागरिक समाज ने कोशिश किया है । आन्दोलन का नेतृत्ववर्ग भी किसी भी विकल्प को परहेज करते हुये अपनी मागों को सौ फीसद पूरी कराने के नाम पर सरकार के साथ बातचीत को इन्कार करता रहा । सरकार सुरक्षाकर्मी की स्कर्टिङ में सामान से भरे कुछ गाडियों को गन्तव्य तक पहुंचाने को ही अपनी जिम्मेदारी मानती रही । राजनीतिक दल जिन लोगों के स्तरोन्नति के लड़ने का दावा करते हैं उन्हीं पर पड़नेवाली मार के प्रति संवेदनशील होना बेहद जरुरी है ।
अब भारतीय सुरक्षाकर्मियों ने उपर के आदेशों का हवाला देते हुये नेपाल की ओर आनेवाली तेल और अन्य सामानों से लदे ट्रकों को रोकना शुरु कर दिया है । नेपाल में आमलोगों के बीच भारत के इस कार्य के प्रति तीखी प्रतिकृयाएं शुरु हो गई है ।
अन्देशा यह भी है कि नेपाल की सीमा से लगे भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में सर पर आरही चुनावों को ताक में रखकर वहां की जनता में अपना प्रभाव विस्तार करने के लिए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी मधेश कार्ड का इस्तेमाल कर रही है । नेपाल से लगी इन दो भारतीय प्रदेशों की जनता के बीच भाषिक और सांस्कृतिक समानता है । लोगों की धर्म, जाति और भाषिक संवेदनशीलता के सहारे चुनावी राजनीति करना भारत में नई रिवाज नहीं है । अगर यह सही है तो फिर उसकी चिन्ता काठमांडू की सत्तासीन और मधेश में आन्दोलनरत सियासी ताकतों को समय रहते ही समझ लेना चाहिए । भारतद्वारा आन्दोलनकारियों को उत्साहित कर नेपाली सत्ता को सबक सिखाने के हिसाब से सब हो रहा है तो एकाएक यह कदम उठाना नेपाल के ही नहीं भारत के हित में भी नहीं हो सकता ।
मधेश नेपाल है और मधेश की समस्या नेपाल की अपनी समस्या है । उसका उचित समाधान होना चाहिए । अपनी समस्याओं को घर की दहलीज के बाहर ले जाना और उसके लिए वाध्य करना सभी के लिए घातक होने में दो राय नहीं है । राजतंत्र के खिलाफ संघर्ष की घडी तक नेपालीं जनता में जो एकता थी अब वह आधार बदल गया है । नेपाली समाज के अन्दर की आवश्यक अनावश्यक अन्तरविरोध सतह पर आ गये हैं । पहले नेपाली समाज मुख्य रुपसे शासक और शासितों के बीच बंटा था अब जातीय, भौगोलिक, लैगिक और धार्मिक हिसाव से कई टुकड़ों बंटा है । इस विविधता को सद्भावों से संवारा जाये तो यह देश शान्त और समुन्नत बन सकता है । इस विविधता पर अगर अहंकार पैदा हो तो भविष्य सुखद होने की संभावना नहीं है । इस समय नेपाल हर दृष्टि से बिल्कुल तरल स्थिति में है । एकात्मकता के अन्दर सकारात्मक विभाजन हमारे लिए बिल्कुल नयां अनुभव है ।
परदे के बाहर जो कुछ हो रहा है उसमें तो लगता है भारत नेपाल की तराई में चल रही हिंसा से चिन्तित है । नेपाली सत्ता और आन्दोलनकारी दोनों पर अपनी सुरक्षा चिन्ता का अहसास दिलाना चाहता है । तकरीबन चालीस दिन से बन्द पडे तराई की पीड़ा को नजरअन्दाज करते सत्ता के कुछ लोग भारत से दो दिन आयात बन्द हो जाने बाद बयानबाजी पर उतर आये हैं । पता चला है कि इतने दिन बिती जाने के बाद भी दोनों देशों के बीच उच्चस्तर और राजनीतिक स्तर पर कोई खास पहलकदमी नही हो रही है । इधर बडे पोष्टर के कुछ आन्दोलनकारी नेता दावा कर रहे हैं कि नाकाओं को उन्होने ही बन्द किया है इस मे भारत को दोष देना गलत है और दक्षिण ही नहीं अब उत्तर की ओर से भी नाकाबन्दी की जायेगी । हकीकत अक्सर यही होता है कि परदे के बाहर और भीतर अलग अलग खिचड़ी पक रही होती है । सबसे बडी बात नैतिकता है । नेपाल के हर राष्ट्रीय राजनीतिक आन्दोलन में आन्दोलनकारियों ओर से भी काठमाण्डो के खिलाफ भारत को जायज नाजायज रुप में उपयोग करने का प्रयास किया जता रहा है । यह एक परम्परा सी बन गयी है, जो बस्तुतःदेश के हित में नहीं है । यही सब अब मधेश के आन्दोलनकारी नेपाली कर रहे है तो उसको विरोध करने का नैतिक धरातल बचता ही कहां है । इसलिए भावना और संवेग से बाहर निकलकर हकीकत को गले लगाते हुये मूल्यों की राजनीति करने का विकल्प नहीं है ।
नेपाल अपनी उपयोग का तकरीबन अस्सी फीसद से अधिक सामान भारत से ही आयात करता आ रहा है । नेपाल आर्थिक हिसाब से भारत पर ही निर्भर है । इस हिसाब से नेपाल भारत का बाजार भी है । नेपाल को यह सुविधा लेने में भौगोलिक रुप से भारत के साथ जो सहजता है वह अन्यों के साथ संभव नहीं हो सकेगा । पडोसी देशों के किसी समुदाय के प्रति गैरकूटनीतिक रास्ते से आग्रह और दुराग्रह रखना कितना घातक हो सकता है इसका भारत स्वयं जानकार है । कश्मीर में पाकिस्तान के चलते हो रही समस्या और अस्सि के दशक में श्रीलंका में भारत की समस्या हमारे बहुत नजदीकी नजीर हैं ।
पिछले साल अगस्त तीन तारिख को जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दो दिन की औपचारिक यात्रा पर काठमाण्डौ आए तो पहले लगा कि विशिष्ट और घनिष्ट कहे जानेवाले भारत और नेपाल के रिश्तों में वे पुरानी परम्परा में शायद ही कोई खास तब्दील कर पायें । चुंकि इससे पहले की अधिकांश दिल्ली की सरकारों ने नेपाल के साथ राजनीतिक सम्बन्धों को बिल्कुल अहमियत नहीं दी थी । कई नियमित बैठकें तो दो देशों के बीच लम्बे अरसे से नहीं हो पारही थी । भारत की विदेश नीति के अधिकांश जानकारों का मानना है कि दिल्ली की सरकार पर पार्टियों के बदल जाने से विदेश नीतियों पर किसी बडे फेरबदल की कम संभावना होती है । मोदी ने बन्द पडी इन प्रक्रियाओं को गतिशील करने का माहौल नेपाली नेताओं के साथ मिलकर किया । संविधानसभा को सम्बोधन करते हुये उन्होंने पौराणिक जम्बुद्वीप के इन दो देशों की मिट्टी के आपसी सम्बन्धों को याद किया था । नेपाल में उनके दो दिन की सक्रियता राजनीतिक तो था ही कुछ लोगों ने इसे जबरजस्त सांस्कृतिक और धार्मिक रुप में भी महसूस किया । उन्होने बारबार भारत को नेपाल का एक अच्छे मित्र के रुप में याद किया । नेपाल में मोदी को लोगों ने एक सच्चा मित्र मान लिया था । सामाजिक संजाल और मिडिया में उनकी चारों ओर वाहवाही हो रही थी । यह शायद पहली बार हुआ कि नेपाल ने अपनी लघुताभास को भुलाकर सच्चे मित्र के रुप में किसी भारतीय प्रधानमंत्री को स्वागत किया । मोदी के इस व्यक्तित्व के कारण भारत के प्रति लोगों के नजरिये में सकारात्मकता देखने को मिली । कुछ ही माह पहले नेपाल में आई विनाशकारी भुकम्प से हुई धनजन की क्षति और पुनरनिर्माण के लिए सहयोग और प्रतिबद्धता ने भारत पर नेपाली जनमानस में विश्वाश बढा था । लेकिन अब आकर नेपाल में चढ़ा मोदी का रंग फीका पड़ता दिखाई देरहा है ।
भारत का इस समय नेपाल से चिढ का एक और भी कारण है । लम्बे विचार विमर्श के वाद अन्तहीन राजनीतिक कलह से तंग और भूकम्प से हुई दिलदहला देनेवाली क्षति ने बडे दल के नेताओं ने संविधान बनाने के लिए २०७२ साल जेष्ठ २५ गते रात को सोलह एजेण्डों पर सहमति जताई । एनेकपा माओवादी के कामरेड प्रचण्ड और एमाले के केपी ओली जिनकी अबतक साथ होने की कल्पना तक नहीं की जाती थी अब एक ही मकसद पर खड़े थे । इस काम के लिए प्रधानमंत्री शुशील कोईराला और मधेशी जनअधिकार फोरम के विजय कुमार गच्छदार ने महत्वपुर्ण भूुमिका निभाई । उसके तत्काल बाद पड़ोसी देश भारत और चीन ने नेपाल में नेपाल पर नजर रखना शुरु करदिया । चीन नेपाल की संघीयता से उसकी सुरक्षा पर पड सकनेवाले प्रभाव से सशंकित है । भाद्र ६ गते नेपाल आए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के वैदेशिक विभाग के एक विज्ञ ने नेपाल आकर इन्ही बातों की जानकारी पर दिलचस्पी दिखाइ । भारत भी बारबार नेपाल की ओर से संभावित असुरक्षा के प्रति सजग तो था ही चार दल के बीच की सोलह एजेण्डाें की सहमति से हैरत में पड गया था । इस सहमति में प्रदेश की नामाङकन का कार्य प्रदेशसभा को ही सौपने और सीमाङ्कन को निश्चित समय में आयोग के जरिए ंनिबटाने की बात बताई गई थी । इसको तराई के आन्दोलनकारियों ने उधार की संघीयता बताकर विरोध किया । सर्वोच्च अदालत ने भी सीमाङकन को आवश्यक मानते हुये एक रिट पर फैसला देने के बाद चार दलों के लिए यह वाध्यकारी हो गया था । नेपाल में चल रही राजनीतिक तरलता के बीच चल रही सरगर्मियों के उपर पैनी नजर रखने काठमांडू स्थित राजदूतावास को दिल्ली से मिले निर्देश के बाबजूद चार नेताओं के बीच सहमति हो गयी थी । नेपाल में होनेवाले सभी राजनीतिक परिवर्तनों पर स्वयं को अभिभावक माननेवाला भारत पता नहीं क्यों न चाह कर भी इसबार हासिए से बाहर पड़ गया था । भारत नेपाल में अपने खिलाफ कई तरह की ताकतो की सक्रियता पर नजर रखना चाहता है । इसके अलावा नेपाली जलश्रोत पर भी उसकी नजर है । इसलिए नेपाली राजनीति पर उसकी सक्रियता रहती है । इसी के चलते वह अक्सर विवादों में रहता है । भारत पर कई निर्भरताओं के वावजूद भी नेपाल में उस की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे ही रहता है । लोकप्रियता के हिसाब से नेपाल में चीन की साईलैंस डिप्लोमेसी सफल माना जाता है । वह हालिया संकट के समय में नेपाल को सहयोग देने की बात पर सकारात्मक है । इसी समय चीनी राष्ट्रपति सि ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में किसी का नाम न लेते हुये छोटे और गरीब देशों पर बडे देशों के हस्तक्षेप का मामला उठाया है । चीन नेपाल के उत्तरी भाग में यातायात और अन्य क्षेत्र में कई परियोजनाओं पर काम करने का ईच्छुक रहा है ।
इन हालातों में आनेवाले दिनों में नेपाल की रणनीतिक महत्व बढने के आसार दिखाई देते है । इन स्रुवाथोर्रुं कोरु कूटनीतिक रुप सेरु उपयोरुग कररुनेरु केरु लिए नेरुपाल अगररु सक्षम नहीं होरुता हैरु तोरु औरुररु भी कई समस्रुरुयाएं खडवार्थों को कूटनीतिक रुप से उपयोग करने के लिए नेपाल अगर सक्षम नहीं होता है तो और भी कई समस्याएं खड़ी हो सकती है ।
नेपाल में राजनीति सिर्फ सस्ती प्रचारबाजी के बैशाखी के सहारे आगे बढाया जाता है । नैतिकता और दूरदर्शिता जैसे राजनीति के आवश्यक गुणों को महत्व नहीं दिया जाता है । इसका सीधा प्रभाव नेपाली कूटनीति पर भी पडा है । जातिवाद, क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर संभव असंभव बातों पर लम्बे लम्बे भाषण देकर जनता की भावना को शोषण करने की बजाये जनता लिए अच्छे काम कर दिखाएं । यही आज की आवश्यकता है ।

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