समय पर सोचने की आवश्यकता, कहीं चाभी विखण्डनकारी के हाथो में ना चला जाये ?

एस.के.लाल, सिरहा , ५,नोभेम्बर |
किसी यूद्ध अथवा द्वन्द्ध के बाद मे किसी भूभाग का बटवारा उस भूभाग के बासिन्दों के लिये बहुत दुखदायी और पीड़ादायी होती है । चाहे वह दिवतीय विश्वयुद्घ के वाद हुई जर्मनी का बटवारा हो चाहे कोरिया प्रायद्घीप का बटवारा हो चाहे भारत के स्वतन्त्रता के बाद भारत पाकिस्तान का बटवारा हो । नेपाल और ईष्ट ईन्डिया कम्पनी के बीच में युद्घ के बाद सुगौली सन्धि हुआ और उसमे नेपाल का दक्षिणी मैदानी भु भाग जो युद्घ से पहले गंगा नदी तक फैला हुआ था वह संकुचित होकर हाल का दशगजा क्षेत्र तक आ गया । उस लड़ाई में नेपाल ने जो गवाया अथवा ईष्ट ईन्डिया कम्पनी सरकार ने जो पाया वो अपनी जगह पर है पर सबसे पीड़ित उस मैदानी भुभाग मे रहने बाले हुए । मैथिल, भोजपुरी और अवध का वो अखण्ड भुभाग जो नेपाल में था वो खण्डित हो गया और उस भुभाग का कुछ भाग भारत में चला गया और बांकी नेपाल में रह गया जिसकी वजह से उसमें बसोवास करने वालाें के खेत खलिहान से लेकर अपने परिजनो से भी देशबासियों का सम्बन्ध बन गया । भुभाग खण्डन मे हुए इस पीडा पर मलहम पट्टी करने के लिये उसी सन्धि में दोनो देशाें के बीच में खुला आवागमन का छूट दिया गया जो आज तक कायम है । यह बात स्मरणीय रहे कि उस सम्पूर्ण मैदानी तराई भुभाग को नेपाल में पहाड़ी शासक के द्वारा मधेश कहकर मधेश शब्द का जन्म और अस्तित्व कायम हुवा । और इस तरह आधा से ज्यादा भाग भारत में पड़ा और बाकी भाग नेपाल में रह गया । उस लडाई के बाद मधेशी जो भारतीय भुभाग मे चले गये वो बिहारी होते हुये स्वतंत्र भारत के प्रथम श्रेणीके नागरिक होकर स्वतंत्रता की अनुभूित लेते रहे । जो मधेशी नेपाली भुभाग में रह गये उसको नेपाल के पहाड़ी शासक रंगरुप के आधार पर शोषण दमन कर शासन करते रहे । जो उनकी आदत बन गई और आज भी नेपाल के मधेशी एक स्वतंत्र नेपाल में रहकर भी स्वतंत्रता की अनुभूति नही कर पायी । और अपने को अवहेलित महसुस कर रही है । इतिहास साक्षी है कि नेपाल के तराई मधेश में विधमान मैथिली, भोजपुरी और मगध सभ्यता हजारो बर्ष पुराना है । जिसका वर्णन रामायण और महाभारत मे भी उल्लेख है । उस समय मे नेपाल और नेपाली सभ्यता का उदगम और विकास ही नहीं हो पाया था । अत ः ये कहना अतिशयोत्ति नही. होगी कि मधेश की सभ्यता और मधेशी लोग आदीकाल से इस भूमि के भूमि पुत्र बनकर रह रहे है । करीब २५० बर्ष पहले गोरखा मे पृथ्वी नारायण शाह के उदय के बाद उत्तरमें हिमालय पर्वतमाला से लेकर गंगा के मैदानी भाग तक जो छोटे छोटे राज्य थे उसको एकीकरण के अभियान मे दक्षिण गंगा तक का मधेश का भुभाग जो उस समय सिम्रौनगढ में पड़ता था वो भी गोरखा साम्राज्य में समाहित होकर नया नेपाल का अंग वना और राजधानी काठमाडौं हुई । उसके वाद काठमाडौं के शासन मे पहाड़ी ब्राहम्ण और क्षेत्री का दवदवा हो गया । उनलोगो ने पहाडी ब्राह्मण और क्षत्रीमुखी शासन पद्घति कायम किया जिसमें दक्षिण के मैदानी भाग में हजारो बर्षौ से रहनेवाले भुमि पुत्र मधेशियाें के लिये कोई स्थान नहीं था । मधेशी पूर्ण रूप से दूसरे श्रेणी के रैती हो गये और सिलसिला आज तक चल रहा है ।

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अब समय परिवर्तन हो गया है । मधेशीयो मे भी चेतना आई है और वो अपना पहचान, अंश, समृद्घि और स्थायित्व माग रही है तो उसे पहाडी शासक लोग समय सापेक्ष माग के रूप में लेना चाहिये । आज तीसरा मधेश आन्दोलन को तीन महीने होने को है ।…आन्दोलन चरम पर है । तराई मधेश की जनता के साथ सारा देश त्राहिमाम मचा हुवा है । सरकार सत्ता सुख का आननद ले रही है । अभी तक ये आन्दोलन देश भक्त और राष्ट्र्वादी के हाथ में है पर अंदेशा है कि यह इसी तरह लंबा चलता रहा तो कही इस की चाभी विखण्डनकारी के हाथो में ना चला जाये और वेैसा हुवा तो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा इसलिये आज आवश्यता है कि विधमान मधेश आन्दोलन के माग को उचित सम्बोधन कर मधेश और मधेशियो को राष्ट्र के मुख्य धारा में लाया जाय और देश में खुशहाली हो और देश समृद्घि की ओर बढे ।

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