समस्या रामायण नहीं मानसिकता की है : सुशील झा

एके रामानुजन के रामायण से जुड़े लेख को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटाने की कोई ठोस वजह समझ से बाहर है.लेख का शीर्षक है तीन सौ रामायण: पाँच उदाहरण और अनुवादों पर तीन विचार. अगर लेख न भी पढ़ा गया हो तो भी इस लेख पर आश्चर्य करने या आपत्ति करना उचित नहीं प्रतीत होता.

अगर आपत्ति इस बात को लेकर है कि रामायण तीन सौ कैसे हो सकते हैं. रामायण तो केवल एक हो सकता है तो ऐसे लोगों को इतिहास और मिथकों के बारे में अपनी जानकारी और दुरस्त करने की ज़रुरत है.अपने अपने घरों में या थोड़ा सा अपनी मातृभाषाओं के समृद्ध साहित्य के बारे में बात करें तो पता चलेगा कि रामायण का अनुवाद देश की कई भाषाओं में हुआ है और अनुवाद करने वालों ने उसमें अपनी कहानियां भी जोड़ी हैं जैसा किसी भी मिथक के साथ होता ही है.

अलग-अलग भाषाओं के रामों का चरित्र और चेहरा भी अलग अलग होता है हां मूल बात वही रहती है.

हिंदी, अवधी से लेकर दक्षिण भारतीय भाषाओं, मराठी, मैथिली और असमिया भाषाओं में रामायण उपलब्ध हैं और अपने अपने हिसाब से कहानी को बढ़ाया घटाया गया है.

अगर रामानुजम के लेख पर प्रतिबंध लगा भी दिया जाए तो ये सच्चाई बदल नहीं जाएगी कि रामायण एक नहीं अनेक हैं. इंडोनेशिया से लेकर फिजी और सूरीनाम में.समस्या यही है कि हमारे स्कूलों कॉलेजों में हमारे मिथकों का पढ़ाया जाना या तो बंद कर दिया गया है या रामायण-महाभारत-वेद-उपनिषद पढ़ने वालों को दकियानूसी करार दिया गया है.

जो इसके लिए पश्चिमी संस्कृति को दोष देते हैं उनके लिए यह जानना ज़रुरी है कि अमरीका और यूरोप के विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति, लेखों और दर्शन पर जितना काम हो रहा है उतना भारतीय विश्वविद्यालयों में शायद ही हो रहा है.

थोड़ा अपने आसपास नज़र डालिए. भारत के विश्वविद्यालयों में धर्म, भारतीय दर्शन और भारतीय संस्कृति की पढ़ाई या तो कम होती है और अगर होती है तो इन विभागों में पढ़ने वालों को गंभीरता से नहीं लिया जाता.

इतिहास की पढ़ाई में यदा कदा इन विषयों पर ध्यान दिया जाता है लेकिन इन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों को भी पिछड़ा माना जाता है. ये और बात है कि जब अमरीकी विश्वविद्यालयों के शिक्षक रामायण-महाभारत पढ़ाने भारत आते हैं लोग खुशी खुशी उनका स्वागत करते हैं.

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम से भारतीय दर्शन का विभाग है. जर्मनी के हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में हेनरिख़ हाइमर चेयर ऑफ इंडियन फिलॉसफी एंड इंटलेक्चुअल हिस्ट्री का चेयर गठित हुआ है.

शिकागो विश्वविद्यालय की वेंडी डॉनिजर की पुस्तक ‘ द हिंदू’ मील का पत्थर मानी जाती है. थोड़ा और सोचें तो याद आएगा कि कुछ समय पहले शेल्डन पॉलक नाम के एक व्यक्ति को संस्कृत में योगदान के लिए पद्मश्री मिला था. शेल्डन पॉलक कोलंबिया में संस्कृत पढ़ाते हैं और भारतीय भाषाओं में लिखी कालजयी रचनाओं के अनुवाद की देख रेख के लिए नारायण मूर्ति की मदद से उन्होंने एक बड़ी परियोजना शुरु की है.

अगर भारत के लोग अपने ही इतिहास को दक्षिणपंथी और वामपंथी भावनाओं से निकल कर पढ़ें और देखें तो पता चलेगा कि विचारों की सहिष्णुता की जो परंपरा भारत में रही है वो कम ही देशों में मिल सकती है.विडंबना यही है कि बहस करने के लिए जाने जाने वाले इस देश में अब बहस की बजाय प्रतिबंध को हथियार बनाया जा रहा है. BBC

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