समायोजन की संख्या में कमी बाध्यता या गहरी चाल !

हिमालिनी डेस्क
गोरखा के पालुंगटार में माओवादी की विस्तारित बैठक के दौरान पार्टीध्यक्ष प्रचण्ड ने कहा था कि यदि सेना समायोजन के काम को जल्द ही पूरा नहीं किया जाएगा तो सबसे अधिक खतरा पार्टी शर्ीष्ा नेताओं को ही होगा। प्रचण्ड का कहना था कि आक्रोश में भरे लडाकू उनपर हमला भी कर सकते हैं और यदि उन्हें कुछ हुआ तो पार्टी कोई भी दूसरे नेता नहीं बचेंगे। सेना समायोजन को लेकर चल रहे अन्तरविरोध के बीच पार्टीध्यक्ष प्रचण्ड की यह चाल थी कि जैसे तैसे समायोजन का काम पूरा कर सत्ता हासिल किया जाए। हालांकि उस समय ही मोहन वैद्य ने प्रचण्ड का विरोध करते हुए कहा था कि आपको डर लगता है तो आप सिंगापुर या चीन में जाकर छिप सकते हैं पार्टी काम वो करेंगे और मरना पडे तो वो ही मरेंगे।
प्रचण्ड ने कई दिनों तक सेना समायोजन की बात को सिर्फसत्ता में जाने के लिए सीढ के रूप में प्रयोग किया था। लेकिन इतना चाल चलने के बावजूद उनके नेतृत्व में सरकार नहीं बनी। हां परिस्थिति बदली तो उनके ही पार्टी उपाध्यक्ष बाबूराम भट्टर्राई के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। सेना समायोजन को लेकर माओवादी और खासकर प्रचण्ड की छवि सिर्फदेश में ही नहीं बल्कि अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर भी खराब होने लगी थी। इसलिए भी माओवादी ने दलों के साथ समझौता कर दस हजार की बजाय सिर्फ६५०० लडÞाकुओं के ही समायोजन पर संतुष्ट होना पडा।
समायोजन की प्रक्रिया के दौरान मोहन वैद्य के विरोध के कारण यह लग रहा था कि उसका असर पडेÞगा और वैद्य के आहृवान पर अधिकांश लडÞाकू स्वेछिक अवकाश ले लेंगे। क्योंकि माओवादी द्वारा मांगे गए अनुसार लडाकुओं को पद नहीं दिया जा रहा था। लडÞाकुओं को स्वेच्छिक अवकाश में जाने, समायोजन का चयन करने या फिर सरकार के पुनर्स्थापना के पैकेज के साथ अपना जीवन चलाने का विकल्प दिया गया। माओवादी नेतृत्व की सरकार थी इसलिए लडÞाकुओं को अच्छी खासी रकम भी देने की बात हर्ुइ। चूंकि माओवादी ने कांग्रेस एमाले के कारण ही दस हजार लडÞाकुओं के समायोजन में जाने की जिद छोडÞकर सिर्फसाढÞे ६ हजार पर ही समझौता किया था।
पहले तो करीब ९ हजार ७०० लडÞाकुओं ने समायोजन में जाने की इच्छा व्यक्त की थी। लेकिन जैसे जैसे सेना और अन्य दल का रूख कडÞा होता गया वैसे वैसे समायोजन में जाने वाले लडÞाकुओं की संख्या में कमी आती गई। सेना समायोजन विशेष समिति की बैठक में जैसे ही लडÞाकू शिविर को नेपाली सेना और सशस्त्र प्रहरी को हवाले किए जाने का फैसला किया गया आधे से अधिक लडÞाकू शिविर छोडÞने पर बाध्य हो गए। पहले तो माओवादी ने सभी लडÞाकुओं को सब्जबाग दिखाया था कि लडÞाकुओं को सेना में ऊँचे ऊँचे ओहदे पर रखा जाएगा और उनका सेना में प्रवेश आसानी से हो जाएगा। सामूहिक प्रवेश के दौरान लडÞाकुओं को सेना के कठिन परिश्रम और प्रशिक्षण से भी नहीं गुजरना पडेगा। लेकिन जैसे माओवादी नेताओं ने लडÞाकुओं को गलतफहमी में रखा था दर असल व्यवहार में वैसा कुछ भी नहीं हुआ।
एक तरफ प्रचण्ड और भट्टर्राई पक्ष समायोजन के काम को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए हर तरह के समझौते करने को आतुर दिखाई दे रही थी तो दूसरी ओर मोहन वैद्य समूह लडÞाकुओं की असंतुष्टि को भुनाने में लगी थी। वैद्य समूह के आहृवान पर कई जगहों पर लडÞाकुओं ने विरोध पर््रदर्शन भी किया। समायोजन में जाने वाले लडÞाकुओं को धमकाया। स्वेच्छिक अवकाश में जाने वाले लडÞाकुओं का चेक छीना गया। उनसे रंगदारी तक वसूली गई। कई जगहों पर तो यह भी सुनने को आया कि सीनियर लडÞाकू कमाण्डरों ने स्वेच्छिक अवकाश में जाने वाले लडÞाकुओं से कमीशन तक की मांग की और ऐसा नहीं करने पर जान से मारने की धमकी भी दी थी।
इन्हीं सब स्थिति परिस्थिति का आकलन करते हुए समय से दो दिन पहले ही सेना को शिविर में घुसने की इजाजत दे दी गई थी। यदि दो दिन की और देरी होती तो माहौल और अधिक खराब और खुनी भी हो सकता था। सरकार और सेना दोनों को ही यह सूचना मिली कि स्वेच्छिक अवकाश में जाने वाले लडÞाकू और वैद्य समूह के लडÞाकू जो कि अयोग्य ठहराए जा चुके हैं या फिर शिविर छोडÞकर जा चुके हैं उनके द्वारा शिविर में रखा हथियार लूटने की योजना बनाई गई है। इसी आशंका के मध्येनजर प्रचण्ड और भट्टर्राई ने तत्काल ही शिविर और लडÞाकुओं को सेना के हवाले किए जाने का फैसला कर लिया। उधर सेना की टुकडी हर शिविर के पास पिछली रात से ही घेरा बनाकर रखी हर्ुइ थी। सरकार के आदेश के साथ ही सेना ने शिविरों को अपने कब्जे में ले लिया।
एक तरफ जिस सेना के खिलाफ १० वषर्ाें तक माओवादी लडÞाकुओं को युद्ध लडना पडा था आज उसी के मातहत में रहना पड रहा था और दूसरी तरफ अब लडÞाकुओं को भी लगने लगा कि सेना के कडे नियम और कानून के बंदिश में वो फिट नहीं बैठने वाले हैं। इससे लडÞाकुओं का मनोबल काफी गिर गया। इसके बाद जो सबसे बडा कारण बना वह यह कि लडÞाकुओं को अब व्यक्तिगत क्षमता के आधार पर ही समायोजन की प्रक्रिया में हिस्सा लेने का निर्ण्र्ााकर लिया गया था। सेना समायोजन विशेष समिति की बैठक ने यह प्रस्ताव भी पारित किया कि जिस तरीके से सेना में जवानों को भर्ती के लिए कडे नियमों का पालना करना पडता है ठीक उसी तरह लडÞाकुओं को भी करना होगा। साथ ही जो लडÞाकू ऊपरी ओहदा में रहना चाहते हैं उनके लिए अलग से तीन महीणे की ट्रेनिंग लेना अनिवार्य होगा। कुल मिलाकर लडÞाकुओं को देश के किसी भी सुरक्षा निकाय में हिस्सा लेने के लिए करीब एक साल का प्रशिक्षण लेना ही होगा। हां लडÞाकुओं को उम्र, और वैवाहिक स्थिति में थोडी छूट अवश्य दी गई। बावजूद इसके जब से सेना ने शिविरों को अपने मातहत लिया है समायोजन में जाने वाले ९ हजार ७०० लडÞाकुओं में से अब सिर्फ३ हजार १०० लडÞाकू ही बच गए हैं। जानकारों का मानना है कि यही स्थिति रही और सेना के कडे नियम कानून में रहना पडे तो प्रशिक्षण से पहले १ हजार लडÞाकू ही बच जाएंगे। और बांकी बचे लडÞाकू सेना के कडे प्रशिक्षण में कितना टिक पाते हैं यह तो देखना अभी बांकी ही है।
कभी ३२ हजार लडÞाकुओं का दावा करने वाले माओवादी को अब महज तीन हजार पर ही संतोष करना पडा है। लडÞाकुओं को लग रहा है कि सत्ता की बार्गेनिंग और समझौते के नाम पर उनकी पार्टर्ीीे शर्ीष्ा नेताओं ने उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड किया है। इसलिए अधिकांश लडÞाकू माओवादी और उसके विचारधारा से अब विक्षुब्ध हो गए हैं। तथा अपने शर्ीष्ा नेताओं के लिए उनके मन में अब कोई भी इज्जत नहीं रह गई है। पार्टर्ीींस्थापन पक्ष से विद्रोह करने वाले मोहन वैद्य ने ऐसे सभी असंतुष्ट लडÞाकुओं को संगठित करने का काम शुरू कर दिया है। उधर प्रचण्ड पक्षधर नेताओं ने भी अपने पक्ष के लडÞाकुओं को अपने साथ जोडÞने का शुरू कर दिया है।
माओवादी की इस चालबाजी पर टिप्पणी करने वाले यह भी कह रहे हैं कि जिस लडÞाकुओं के दम पर और जिस लडÞाकुओं का डर दिखाकर माओवादी आज तक इस देश की राजनीति पर हावी होते रहे हैं अब उनकी संख्या कम जरूर हो गई है। लेकिन सिर्फतीन हजार लडÞाकुओं के समायोजन में जाने और बांकी लडÞाकुओं के घर वापसी को इतनी सहज तरीके से नहीं लेना चाहिए। ऊपर से अनमिन द्वारा अयोग्य ठहराए गए लडाकुओं की भी संख्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। माओवादी नेताओं से यह डर हमेशा ही बना रहेगा कि कहीं वो इन लडÞाकुओं को फिर से भटकाने की कोशिश ना करे और आने वाले चुनाव में या किसी आन्दोलन में वो इनका इस्तेमाल ना करे।

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