समायोजन पर सेना का नया प्रयास
राजकुमार यादव

चार वर्षों के लम्बे विवाद के बाद आखिरकार एकीकृत नेकपा माओवादी ने अंतत नेपाली सेना के द्वारा प्रस्तुत लडाकू समायोजन के अवधारणा पर सहमति जताई है । शांति प्रक्रिया की शुरुआत के साथ ही अस्थाई शिविरों में रह रहे माओवादी लडाकुओं के व्यवस्थापन, पुनर्स्थापना व समायोजन के कई मोडल पेश किया और अस्वीकृत हुआ । प्रारम्भ में तो किसी भी कीमत पर माओवादी लडाकुओं को सेना में प्रवेश ही ना देने के विचार को क्रमशः बदलते हुए नेपाली सेना राजनीतिक दलों के मनसाय को समझते हुए अब इस प्रति काफी उदारता बरत रही है । और सेना द्वारा पेश की गई अवधारणा का माओवादी द्वारा र्समर्थन किए जाने के बाद सेना समायोजन का काम पहले जितना असंभव दिख रहा था वह अब संभव में बदलता जा रहा है ।     माधव कुमार नेपाल की सरकार के दौरान नेपाली कांग्रेस व एमाले के नेताओं के समक्ष जब नेपाली सेना के तरफ से लिखित अवधारणा पेश की गई थी, उसी समय माओवादी ने इस पर सकरात्मक रुख अख्तियार कर शुभ संकेत दिया था । यद्यपि कुछ दलों ने सेना के प्रस्ताव को माओवादी के प्रति अधिक ही लचकता अपनाने की बात कहते हुए इसका विरोध किया था । लेकिन इसके बावजूद नेपाली सेना ने लडÞाकुओं के समायोजन पुनर्स्थापना व व्यवस्थापन संबंधी एक नयाँ प्रस्ताव सरकार के मातहत रहे सेना समायोजन विशेष समिति को विचार विमर्श करने के लिए उपलब्ध कराया है ।      नेपाली सेना द्वारा पेश किए गए इस दस्तावेज में माओवादी लडाकुओं के हाल रहे संरचना को अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक बताया है । माओवादी जनमुक्ति सेना के सात डिवीजन कमाण्डरों को विशिष्ट श्रेणी बराबर कहा हैं । यानि कि जनमुक्ति सेना के सात डिवीजन कमाण्डर लेफ्टिनेट जेनरल के बराबर है । नेपाली सेना का तर्क है कि ९५ हजार की सेना की जनशक्ति में सिर्फ२७ विशिष्ट श्रेणी के अधिकारी है तो फिर १९ हजार की जनशक्ति वाले जनमुक्ति सेना को ७ विशिष्ट श्रेणी के दर्जा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है ।     सेना समायोजन पर माओवादी के तरफ से १० हजार लडÞाकुओं के समायोजन की बात की गई है तो नेपाली कांग्रेस चार हजार लडाकुओं से अधिक को समायोजन करने के पक्ष में नहीं है। एमाले ने अपने प्रस्ताव में अधिकतम ५ हजार लडÞाकुओं के समायोजन की बात उल्लेख की है ।      इन सब को देखते हुए नेपाली सेना ने अपने दस्तावेज में कहा है कि राजनीतिक सहमति के आधार पर सरकार द्वारा किए गए संख्या निर्धारण को नेपाली सेना मानेगी । लेकिन इसके साथ ही सेना ने शर्त भी रखी है । अपने प्रस्ताव में सेना ने कहा है कि सरकार द्वारा निर्ण्र्ााकिए गए संख्या में सेना द्वारा स्थापित मापदण्ड के अनुसार ही योग्यता पहुँचे और स्वेच्छा से समायोजन होने वाले लडÞाकुओं को सिर्फव्यक्तिगत आधार पर सुरक्षा अंगों में समायोजित किया जा सकता है ।      सेना के द्वारा दिए गए दस्तावेज में कहा गया है किस्थापित मापदण्ड पहुँचे और स्वेच्छा से समायोजन की इच्छा रखने वालों की संख्या यदि सरकार के द्वारा निर्धारित संख्या से अधिक होती है तो एक मोडालिटी, मर्यादाक्रम, उम्र की समय सीमा, सभी दर्जे में समानुपातिक जैसे आधार बनाकर बढÞने वाले संख्या की कटौती की जा सकती है ।     नेपाली सेना के इस नए प्रस्ताव में आधारभूत मापदण्डों में लचकता अपनाई गई है । लेकिन स्थापित मापदण्ड में किसी भी प्रकार के समझौते की गुंजाइश काफी कम होगी ।      नेपाली सेना ने माओवादी लडÞाकुओं के समायोजन हेतु सात अलग-अलग रास्ते तय किए हैं, जिसे पार करने के बाद ही किसी लडÞाकु को नेपाली सेना के अन्दर रहे महानिर्देशनालय में समायोजन किया जा सकेगा । इन सभी रास्तों में शिक्षा, उम्र, सैनिक ज्ञान में थोडÞी बहुत लचकता अपनाई जा सकती है । लेकिन मानवाधिकार हनन के दोषी पाए जाने पर उन्हें आयोग्इ ठहराया जा सकता है चाहे वो बाकी सभी में योग्य क्यों न निकले ।  पहला पडÞावः- मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी नहीं- समायोजन के लिए यह सबसे कठोर पडÞाव है । यदि कोई लडÞाकु अन्य शर्तों पर खडÞा उतरता है और वो किसी राष्ट्रिय अथवा अंतर्रर्ााट्रय स्तर के मानव अधिकार उल्लंघन का मामलों में दोषी पाया जाता है तो उसे अयोग्य ठहराया जाएगा । इसके लिए नेपाली सेना ने राष्ट्रिय मानवाधिकार आयोग की नजर में दोषी नहीं होना चाहिए । राष्ट्रसंघीय मानवाधिकार उच्चायोग द्वारा दोषी प्रमाणित नहीं हो । सेना के मानव अधिकार सेल और नेपाल प्रहरी के रिकार्ड में आपराधिक घटना का दोषी ना हो । आम जनता की हत्या या छिपकर किसी की हत्या करने के मामले में दोषी रहे किसी भी लडÞाकू को समावेश नहीं किया जा सकता है ।  दूसरा पडÞावः शारीरिक मापदण्ड समायोजन की इच्छा रखने वाले सभी लडÞाकुओं को नेपाली सेना द्वारा भर्ती के लिए स्थापित सामान्य मापदण्ड पर खडÞा उतरना जरुरी ।  तीसरा पडÞावः स्वास्थ्य- प्रत्येक लडÞाकू की मेडिकल परीक्षण के बाद ही समायोजन की प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा । किसी रोग से ग्रसित या स्वास्थ्य में कमजोर दिखने वाले लडÞाकुओं की छंर्टाई हो जाएगी ।  चौथा पडÞावः सेवा का आधार- लडाकुओं द्वारा ली गई औपचारिक शिक्षा के हिसाब से उनके पद का निर्धारण होगा । सेना के दस्तावेज में कहा गया है कि लेफ्टिनेण्ट के पद पर रहे लडाकुओं को कम से कम नौवीं कक्षा पास होने पर समायोजन के लिए योग्य माना जाएगा । पा“चवा पडÞाव ः उम्र की समय सीमा- समायोजित होने वाले लडÞाकुओं के लिए उम्र की समय सीमा अलग से तय की गई है । २०५२ साल में माओवादी जनयुद्ध के साथ ही इसमें शामिल होने वाले लडÞाकुओं की सेवा अवधि फाल्गुन १, २०६८ को १६ वर्षगणना की जाएगी । इस समय यदि कोई ब्रिगेड कमाण्डर है और उसने एम ए उत्तर्ीण्ा कर लिया है तो सेवा अवधि के कारण अधिकतम मेजर पद तक जा सकता है । अनमिन द्वारा प्रमाणित के समय बनाई गई लडÞाकुओं के परिचय पत्र में भर्ती की तिथि लिखे होने की वजह से उसी आधार पर सेवा अवधि निर्धारण की जाएगी । और इसी आधार पर सेना ने अधिकतम मेजर के पद तक पहुँचने की बात निर्धारित की है ।  छठा पडÞाव ः उम्र- २५ वर्षतक के लडÞाकुओं को सिपाही, प्युठ के लिए २३ वर्षसे ३० वर्ष अमलदार के लिए २५ से ३३ वर्ष हुद्दा में २८ से ३७ वर्ष जमदार के लिए ३० से ४० वर्ष सुबेदार के लिए ३२ से ४३ वर्षआयु निर्धारित की गई है ।      इसी तरह सेकेन्ड लेफ्टिनेट के लिए २१ से ३१ वर्ष लेफ्टिनेण्ट में २३ से ३६, कैप्टन में २६ से ४० और मेजर पद के लिए २८ से ४३ वर्षतक होने का मापदण्ड तय किया गया है ।  सातवा पडÞाव ः आधारभूत सैन्य ज्ञान- प्रत्येक लडÞाकू को आधारभूत सैन्य ज्ञान संबंधी परीक्षा उत्तर्ीण्ा करना आवश्यक होगा । इसमें फिल्डक्राफ्ट युद्ध कौशल, हथियार चलाने की जानकारी ।      यदि सेना द्वारा तय किए गए सभी मापदण्डों को पूरा किया गया तो एक हजार लडÞाकुओं के समायोजन में मेजर के रुप में १० लडÞाकुओं को जगह मिल सकती है । यदि ५ हजार लडÞाकुओं का समायोजन किया जाता है तो माओवादी लडÞाकुओं को ५० मेजर, सेकेण्ड लेफ्टिनेण्ट तक १ सौ ७० पद, १९० जमादार, सुवेदार, १२३५ विल्लादार अमलदार और तीन हजार ६५ लडÞाकुओं को सिपाही दर्जा में समायोजित किया जा सकता है ।   िि ि

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