समीक्षा की जल्दवाजी

श्रीमन नारायण
नेपाल एवं भारत के बीच अब तक हुए संधि एवं सम्झौतों की समीक्षा के लिए दोनों देशों ने एक समिति बनाने का निश्चय किया है । ‘प्रबुद्ध व्यक्ति समूह’ नामक इस समिति मे दोनों देश से चार–चार प्रतिनिधि होंगे । इनका मुख्य काम होगा सन् १९५० से लेकर अब तक हुए संधियों का अध्ययन मनन्, अनुसन्धान विश्लेषण तथा अन्तरक्रिया कर अपनी–अपनी सरकारों को सुझाव देना । समूह का कार्यकाल दो वर्षों का होगा । हालांकि यह विषय काफी गम्भीर एवं दूरगामी प्रभाव का है लिहाजा इस पर पर्याप्त बहस एवं समीक्षा की आवश्यक्ता हैं । भावावेश में, आक्रोश में या जल्दीवाजी में उठाया गया कोई भी कदम रिश्तो के मिठास में खटाई ला सकता हैं लिहाजा दोनों देशों के विद्धानों से सूझबूझ भरे कदमों की अपेक्षा हैं ।
नेपाल की बामपन्थी पार्टिया, बामपन्थी, विचारक एवं राजावादी विद्धानों की शुरु से यह मान्यता रही हैं कि भारत के साथ हुए संधियों में नेपाल के हितों की उपेक्षा की गई हैं तथा दोनों देशों के बीच का सम्बन्ध बराबरी पर आधारित नही हैं लिहाजा इसकी समीक्षा होनी चाहिए । सक्रिय राजतन्त्र के तीस साल में इसकी आवश्यक्ता नही महसूस की गई लिहाजा यह निर्वाध रुप में जारी रहा । नेपाल की राजनीति में जब से बामपन्थी दलों का प्रभाव बढ़ा है तभी से यह विषय अधिक चर्चा मे आया हैं । नेपाल की बामपन्थी दलो कें लिए यह एक अहम चुनावी मुद्दा भी रहा हैं । भारत विरोध पर आधारित राष्ट्रवाद की राजनीति को अपना प्रमुख राजनीतिक हथियार बना चुके नेपाल के बामपन्थी नेताओं के इस सियासी हथियार के धार कों कुंध करने कें लिए भारत ने भी अपनी रजामन्दी दे दी हैं । नेपाल सरकार द्वारा नामित सदस्यों में अगर एक भी मधेशी चेहरा इसमें होता तो संधियों के बारे में समीक्षा करने में और अधिक मदद मिलती क्योकि मधेशियों कों शायद इसकी अच्छी समझ हो सकती है ।
भारत नें अपनी ओर से जिन नामों की घोषणा की है उनमें एक तो उत्तरान्चल के पूर्व मुख्यमन्त्री हैं वहीं दूसरे महानुभाव भी कुछ ही पहले तक नेपाल में भारत के राजदूत के तौर पर अपनी सेवा दे चुके हैं । दो नाम भारतीय गोरखा का हैं ।
सवार्धिक चर्चा है, सन् १९५० में नेपाल एवं भारत के बीच हुए शान्ति एवं मैत्री की संधि का । इस सम्बन्ध में नेपाल में ही अलग–अलग धारणाएं हैं । बहुत लोगो का मानना हैं कि इसके साथ छेड़छाड़ न किए जाए“ अन्यथा दोनों देशों कें रिश्ताें पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा । कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसमें समय सापेक्ष संशोधन किए जाने की जरुरत है तो कुछ लोग इसको निरस्त होते देखना चाहते हैं ।कुछ लोगों का यह भी मानना है कि सन्धि के निरस्त होते ही नेपाल का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, क्योंकि संधि के निरस्त होते ही दोनों देशों का सम्बन्ध शून्यता में तब्दील हो जाएगा । अपने–अपने हिसाब से लोग इसका विश्लेषण कर रहे हैं । बात आगे बढ़ी है तो चर्चा होना भी स्वाभाविक है ।
संधि के धारा १ में इस बात का जिक्र है कि दोनों देश एक दुसरे के प्रभुसत्ता, क्षेत्रीय अखण्डता एवं स्वतन्त्रता का आदर करेंगे । बहुधा यह पाया जाता है कि दो देशों के बीच होने वाले सम्झौतों में यह विषय रहता ही है । नेपाल का मानना हैं कि धारा २ का पालन भारत के द्वारा नही हुआ । तर्क यह कि सन् १९६२ में चीन के साथ हुए युद्ध के समय तथा सन् १९६५ में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के समय भारत ने इसकी जानकारी नेपाल की सरकारों को नही दी थी । हालांकि नेपाल ने भी संधि के अनुसार भारत से जानकारी मांगने का प्रयास नही हुआ । धारा ३ एवं ४ कूटनीतिक सम्बन्ध का स्वाभाविक विषय होता हैं । विश्लेषकों के अनुसार धारा ५ का उल्लंघन नेपाल के द्वारा हुआ हैं । पंचायती शासन के उतरार्ध में नेपाल की मरिचमान सिंह सरकार ने चीन से तथा बाद के दिनों में शेर बहादुर देउवा की सरकार ने बेल्जियम से हथियारों का आयात करते वक्त भारत को इसकी जानकारी नही दी थी ।
धारा ६ में लिखा गया हैं कि औद्योगिक एवं विकास के मामलों मे एक दूसरे देशों के नागरिक कों सहभागी कराते वक्त राष्ट्रीय व्यवहार किया जाएगा । इसी धारा से सम्बन्धित पत्राचार के दफा ४ में नेपाल के द्वारा औद्योगिक परियोजना के लिए विदेश सहयोग लेने का अगर निर्णय होता है तो भारत सरकार या उसके नागरिको को पहली प्राथमिकता दी जाएगी परन्तु बाद के दिनों मे वैसा हुआ नही ।
धारा ७ मे इस बात का जिक्र हैं कि एक दूसरे देश के नागरिकों को अपने–अपने भु–भाग मे बसोबास तथा सम्पति के उपभोग, उद्योग एवं व्यापार के कारोबार में भाग लेने चलफिर करने के विषयों में समान रुप से विशेषाधिकार प्रदान किया जाएगा परन्तु नेपाल ने इसपर रोक लगा दिया । भारतीय नागरिक नेपाल में जमीन की खरीददारी नही कर सकते हैं क्योंकि इसके लिए नेपाल में नागरिकता का प्रावधान होने के कारण भारतीयो के लिए यह सब असम्भव है । धारा १० में लिखा गया हैं कि कोई भी एक देश १ वर्ष की अग्रिम सूचना देकर इस सन्धि को निरस्त करा सकता है । इस संधि में संशोधन की कोई गुन्जाईस ही नही हैं ।
भारत की ओर से प्रबुद्ध समुह के एक सदस्य महेन्द्र पी. लामा का एक साक्षात्कार काठमाण्डु से प्रकाशित एक नेपाली दैनिक में पिछले दिनों छपा हैं जिसमे उन्होंने कहा हैं कि सन् १९५० के संधि के धारा ६,७,८ के भारतीय गोरखाओं को दिक्कत हो रही हैं क्योकि भाषा संस्कृति, चेहरा नेपाली गोरखाओं से मिलते–जुलते होने के कारण भारत के लोग यही समझ बैठते हैं कि ये लोग भी नेपाल से ही आए होंगे तथा पैसा कमाने के वाद वापस अपने देश कों लौट जाऐंगे । उनका यहा“ तक मानना है कि नेपाली गोरखाओं के कारण ही भारतीय गोरखाओं को भी लोग कान्छा, चौकीदार एवं बहादुर के नाम से ही पुकारते हैं लिहाजा दोनों देशों के नागरिकों का स्पष्ट पहचान का होना उन्होंने जरुरी माना हैं । पिछले कई वर्षो से तो भारतीय गोरखाओं की यह भी मांग रही हैं की गोरखा भर्ती मे सिर्फ उन्हें ही लिया जाए न की नेपाल के गोरखाओं को । सन् १९५० के संधि को अपने–अपने ढंग से विश्लेषण करने वाले की कमी नही हैं परन्तु समूह के सदस्य गम्भीरता पूर्वक एवं सोच विचार कर अपना सुझाव देंगे ऐसी अपेक्षा हैं । सन् १९५० की संधि का महत्व आज भी हैं । भारत के साथ नेपाल का सम्बन्ध यथार्थ है ।

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