विकल्प नहीं समाधान

न तुम बदले न मौसम बदला, दिलों के जज्बात जरूर बदल गए ।घर को ना देख पड़ोस पर निगाहें अधिक टिकी हुई हैं

न तुम बदले न मौसम बदला, दिलों के जज्बात जरूर बदल गए । भाईचारा, सद्भाव, बंधुत्व ये सारे शब्दों के मायने और अर्थ आज के परिप्रेक्ष्य में बदलते नजर आ रहे हैं और न चाहते हुए भी यह कहना गैरमुनासिब नहीं होगा कि इस बदले हुए जज्बात के पीछे हमारे जिम्मेदार नेताओं की नीति ही काम कर रही है । जो बोल रहे हैं वो भी कड़वा और जो चुप हैं उनके अन्दर भी कड़वाहट ही है । आखिर देश किस दिशा की ओर जा रहा है ? देश की अपनी ही जनता को विदेशी कहकर उनके अन्दर वैमनस्यता की भावना को बढ़ावा दिया जा रहा है । समस्या के समाधान से अधिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश की जा रही है । घर को ना देख पड़ोस पर निगाहें अधिक टिकी हुई हैं । माना कि राजनीति भावनाओं से खेलती है, साजिश करती है, षड्यंत्र रचती है, निर्दोषों की हत्या करवाती है, दोस्तों को दुश्मन बनाती है किन्तु जनता और देश हित के लिए उनकी जिम्मेदारियों का क्या ? इस यक्ष प्रश्न से जूझते हमारे देश ने राजनीतिक पटल पर एक नया इतिहास रचा है, देश के सर्वोच्च पद पर देश को एक महिला राष्ट्रपति और महिला सभामुख देकर । बधाई है सत्तापक्ष को उनकी उदारता के लिए ।
अभाव और तनाव, वैमनस्यता और विखण्डन, प्राकृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता देश, उस पर विडम्बना यह कि इन सारी समस्याओं को ताक पर रखकर सत्ता अपना वक्त गुजार रही है । विकास की कोई नीति नहीं, योजना नहीं, सिर्फ पद निर्माण और स्वार्थ की राजनीति में व्यस्त हमारी सरकार आखिर कब गम्भीर होगी ? सड़कों पर गाडि़यों की दूर तक लगी लम्बी पंक्तियाँ फिर भी यह उम्मीद नहीं कि पेट्रोल या डीजल मिल ही जाएगा । बन्द होती संस्थाएँ, विद्यालय, औषधिविहीन अस्पताल, राशनविहीन दुकानें पर और इन सबसे जुदा दृष्टिविहीन हमारी सरकार । समाधान से अधिक विकल्प ढूँढती हमारी सरकार अपनी अदूरदर्शिता का पूरा परिचय दे रही है । विकल्प ढूँढना गलत नहीं है किन्तु यह समय उचित नहीं है । भूखी और बदहाल जनता को तत्काल कैसे राहत प्राप्त हो, देश की वर्तमान अवस्था को कैसे व्यवस्थित किया जाय फिलहाल इसकी आवश्यकता है । देश के सुलगते पक्ष को सम्बोधन की आवश्यकता है ।
देश की बागडोर नई सरकार की हाथों में है । राहें कठिन हैं किन्तु उनका कार्यकाल दीर्घ और सफल हो इन्हीं शुभकामनाओं के साथ–
विधाता के नियमों की विडम्बना है
चाहे न चाहे किन्तु
शासक की भूलों का उत्तरदायित्व
प्रजा को वहन करना पड़ता है
उसे गलित मूल्यों का दण्ड भरना पड़ता है ।
– दुष्यन्त कुमार

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