सम्पादकीय

पीडा  अपनों की
प्रकृति का प्रकोप हर वर्षहमें पीडा का वह दंश दे जाता है जिससे उबरने की कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है । प्रत्येक वर्षदेश को इन हालातों के साथ जूझना पडÞ रहा है, किन्तु समय रहते इस ओर कोई सावधानी नहीं बरती जाती है । हर रोज अपनों के बिछडÞने, बेघर होने, भूख और बीमारी से मरने की पीडा मस्तिष्क को उद्वेलित कर रही है । हर तंत्र नाकाम है । सहायता राशि है, किन्तु इसका उपयोग नहीं हो पा रहा । भूख, बीमारी और खुले आकाश के नीचे बसेरा डाले लोग निरीह अवस्था मेर्ंर् इश्वर के सहारे जी रहे हैं । किन्तु लगता हर्ैर् इश्वर ने भी न सुनने की ठान ली है । राहत और पुनर्निमाण की गति इतनी सुस्त है कि तब तक न जाने और कितने कालकवलित हो जाएँगे । अभी की आवश्यकता बाढÞ प्रभावित क्षेत्रों में राहत शिविर, उद्धार व्यवस्था, स्वास्थ्य शिविर, विस्थापितों के लिए पुनःस्थापना, उनके रहने की व्यवस्था पर तीव्रता के साथ कदम उठाने की है । बाढÞ के पश्चात् महामारी की जो मार पडÞने वाली है और कई जगहों पर जो इससे जूझ रहे हैं उनके लिए आवश्यक दवा, डाक्टर, पीने का पानी आदि को तत्काल प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाने की ओर सरकार को ध्यान देना चाहिए और राहत कार्य में गतिशीलता लानी चाहिए । मध्य तथा सुदूर पश्चिम में राहत सामग्री पहुँचाने में जो समस्या सामने आ रही है उसे तत्काल दूर करना होगा । सडÞकें टूटी हर्ुइ हंै, आवागमन ठप है, राहत सामग्री जगह तक पहँुच नहीं पा रही इसके लिए अधिक से अधिक वायुमार्ग की सुविधा लेनी होगी । सरकार को अपना पूरा ध्यान इस विषय पर केन्द्रीत करना होगा ।
इबोला वायरस का डर मस्तिष्क में व्याप्त है, इसके लिए पर्ूव तैयारी की आवश्यकता है । हर सीमा क्षेत्र में स्वास्थ्य संस्था और सुरक्षा के व्यापक प्रबन्ध होने चाहिए र्।र् इश्वर न करे, इबोला संक्रमित अगर एक व्यक्ति ने भी देश की धरती पर पैर रख दिया तो स्थिति की भयावहता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता । एक पुख्ता व्यवस्था की ओर यथाशीघ्र सरकार को कदम उठाना होगा ।
देश ने एक और क्षति को झेला है, जो अपूरणीय है । नेपाली सिने जगत के चहेते नायक श्रीकृष्ण श्रेष्ठ को हमने असमय खो दिया । हिमालिनी परिवार उनकी आत्मा की शांति और उनके परिवार के प्रति संवेदना प्रगट करता है ।
अंत में, आपके सुझाव और सराहना की उम्मीद के साथ हिमालिनी का सितम्बर अंक आपके समक्ष है ।

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