सम्पादक की कलम से …

“कालो  न जातः वयमे व जातः” समय नहीं खत्म हो ता हम लोंग कालकवलित हो ते  जा र हे  हो ते  हैं । इसी सत्याधार  पर  हर े क प्राणी के  जन्म के  साथ ही मृत्यु की तिथि भी निश्चित कर  दी जाती है । गीता मे  भगवान कृष्ण ने  कहा है - “जातस् य ध्रुवो  मृत्युः” अर्थात जो  जन्मा ओ  मरे गा । इसी कडी के  रुप में भार तीय आध्यात्मिक गुरु सत्य र्साई बाबा भी २५ अप्रिल सुबह ७:४० बजे  जीवन लीला समाप्त कर  ब्रह्मलीन हो  गए । के वल प्राणी ही नहीं समय अनुसार  चलने  को  बाध्य है , अपितु ने पाल के संविधान सभा के  ६०१ सदस् य सबहिं नचावत राम गोंर्साई के  आधार  पर  बिना संविधान बनाए भत्ता प्राप्त के  लिए सत्ता में बंदर  बाँट कर ते  हुए, जनता को  बे वकूफ बनाते  हुए दे श को  अराजकता के  दल दल में फँसाते  जा र हे  हैं । ०६२/६३ के  जनआन्दो लन के  बाद जनता ने  ने पाल की र ाजनीतिक पार्टियो ं को  अन्तरि म संविधान के  अनुसार  पर्ूण्ा संविधान बनाने  के  लिए दो  वर्षकी अवधि दिया किन्तु ६०१ सदस् य ने  के वल सत्ता हथियाने  औ र  पार्टीी आन्तरि क द्वन्द्वों में बिता दिया । १४ जे ष्ठ भी आ गया, दे श भर  मे ं स् तब्धता छा गई, अब क्या हो गा – ऐ सी विषम स्िथति में खास कर  तीन बडÞी पार्टियाँ औ र  उनके  बडे -बडे  ने ता संविधान निर्माणार्थ सत्ता-भत्ता दो नों पाने  के  लिए आनन-फानन में १२ बजे  निष्प्राण हो ने  जा र ही संविधान सभा को  संजीवनी पिलाकर  १ वर्षका अभयदान दे  दिया । अभयदान के  रुप मे ं मिले  अधिक १ वर्षमे ं भी संविधान न बनना निश्चित है  । इस स्िथति मे ं पुनः एक बार  समय सीमा बढे गी, यह भी तय है , पर  इसबार  समय सीमा न बढाने  के  लिए चार ो ं ओ र  से  जनदबाव आने  के  कार ण समय सीमा बढाना टे ढÞी खीर  साबित हो गी । पर  सवोर् च्च का यह निर्ण्र्ााकि जब तक संविधान नहीं बनता है , तब तक संविधान सभा जीवित र हे गी । सवोर् च्च का यह निर्ण्र्ाार ाजनीतिक पार्टियों एवं ने ताओ ं को  गै र जिम्मे वार  बनाने , र ाजकीय को ष ध्वस् त कर ने  की मानसिकता को  बढÞावा दे ने  जै सी आलो चना की जा र ही है  । सवोर् च्च का यह निर्ण्र्ाात्रूटिपर्ूण्ा लगता है  । संविधान लिखने  के  लिए अभी तक डे ढÞ दो  अर ब रुपये  भत्ता के  रुप मे ं खर्च हो  चुके  है ं पर  संविधान निर्माण के  प्रयास ही निष्त्रिmय है  । मुख्य पार्टियाँ अभी तक र ाज्य पुनर्सर्ंंर चना, शासकीय स् वरुप, निर्वाचन प्रणाली, शान्ति प्रक्रिया तथा न्याय प्रणाली के  बार े  मे ं मतै क्यता स् थापित नहीं कर  पाई है ं । ऐ सी स् िथति मे ं समयसीमा के  भीतर  संविधान का बनना बालू पर  महल बनाने  जै सा है  । संविधान न बनने  की आशंका, भार तीय कूटनीतिज्ञो ं की सुर क्षा, ने पाल-भार त के  ऐ तिहासिक सम्बधो ं मे ं पडÞे  दर ार , माओ वादियो ं द्वार ा भार त के  प्रति ने पाली जनता को  आक्रो सित कर ने , भार तीय जाली नो टो ं को  ने पाल के  र ास् ते  से  भार त मे ं प्रवे श कर ाने  जै सी मूलभूत समस् याओ ं के  सम्बन्ध मे ं सर कार  को  अवगत कर ाने  के  लिए भार तीय विदे श मंत्री एस.एम. कृष्णा के  ने पाल आने  पर  ने पाली र ाजनीति मे ं कंपन आ गया । कंपन आना अस् वाभाविक नहीं है , कार ण विदे श मंत्री कृष्णा ने  सहज शब्दो ं मे ं ने पाल सर कार , र ाष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, से नापति तथा अन्य पाटीं ने ताओ ं को  भार त की चिन्ता औ ंर  चे तवानी दो नो ं से  अवगत कर ा दिया है  । विदशे  मंत्री कृष्णा द्वार ा यह कहा जाना कि माओ वादियो ं द्वार ा भार त के  प्रति ने पाली जनता मे ं आक्रो स पै दा किया जाता है  । क्या इसे  आप की सर कार  की नीति मानी जाए – या इन कार वाहियो ं को  खनाल सर कार  द्वार ा भार त पर  प्रायो जित हमला माना जाए – इन प्रश्नो ं को  सुनते  ही अर्थमंत्री एवं सार ा ने पाली प्रतिनिधि मंडल सबके  सब अबाक र ह गए । अपनी ही पार्टर्ीीे  ने तृत्व को  गिर ाकर  औ र  माओ वादी के  कंधे  को  वै शाखी बना कर  प्रधानमंत्री बनने  मे ं सफल झलनाथ खनाल अबतक के  सबसे  लाचार , बे बस औ र  असफल प्रधानमंत्री साबित हो  चुके  है ं । खनाल द्वार ा नियुक्त शिक्षा र ाज्यमंत्री द्वार ा विर ो ध स् वरुप शपथ ग्रहण इस कार ण नहीं लिया गया कि कनिष्ठ को  के विने ट मंत्री बनाया औ र  मुझे  र ाज्यमंत्री क्यो ं – प्रधानमंत्री खनाल की धज्जियाँ तब उडÞ गई जब उनके  द्वार ा नियुक्त अर्थर ाज्यमंत्री डा. ल्हार क्याल लामा द्वार ा तीन दे शो ं की नागरि कता र खने , ने पाल मे ं ही दो  नामो ं से  नागरि कता तथा पासपोर् ट र खने , कई दे शो ं के  लिए जासूसी कर ने , सूचना आदान-प्रदान कर ने  औ र  प|mी तिब्बत मूबमे ण्ट मे ं सक्रियता दिखाने  के  कार ण लामा को  मंत्री पद से  हटाना पडÞा । लामा को  नियुक्त कर ने  औ र  बर्खास् त कर ने  से  स् वयं खनाल संदे ह के  कटघर े ं मे ं खडÞे  दिखाई दे ते  है ं । ने पाल की कुछ र ाजनीतिज्ञो ं की घिनौ नी एवं काली कर तूत को  पढÞकर  तब शर्मसार  हो ना पडÞा जब संचार  माध्यम मे ं सभासदो ं के  द्वार ा रेड पासपोर् ट बे चने  के  बार े  मे ं समाचार  पढÞने  को  मिला ।

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