सरकारी आतंक और माओवादी जनयुद्ध, कौन खतरनाक ? श्याम सुन्दर मण्डल

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श्याम सुन्दर मण्डल,  भारदह,सप्तरी, २८ पुस |  १ वर्ष ३६५ दिन का होता है | २०५२ से लेकर ०६१ तक नेपाल में १० वर्ष माओवादी जनयुद्ध चला | माना जाता है, इस जनयुद्ध में १३ हजार लोगों (मानव) की हत्या हुई | हिसाब करके देखें तो माओवादी जनयुद्ध के दौरान दैनिक औसत [१३०००÷(१०×३६५)] = ३.५६२ मानव की मौत हुई |

श्यामसुन्दर मंडल

श्यामसुन्दर मंडल

माओवादी युद्ध नियन्त्रण के नामपर नेपाली सरकार हथियार में खरबों खर्च किए | * ३० हजार स-शस्त्र पुलिस रखना पड़ा | औसतन रू १० हजार प्रति माह वेतन के दरसे ७ वर्ष का ही खर्च जोड़े तो केवल वेतन में ३ अरब से अधिक राजकोष खर्च होती है | * १ लाख सैनिक में से यदि हम ६०% सैनिक ही माओवादी नियन्त्रण में खटनपटन का खर्च जोड़े तो ५ वर्ष में ४ अरब से अधिक खर्च आता है | * जनपद पुलिस में सैनिक खर्च का आधा ही जोड़े तो २ अरब से अधिक खर्च होती है | * सुरक्षा भत्ता, लजस्टीक, अतिरिक्त भत्ता, क्षतिपूर्ति, सैनिक समायोजन खर्च आदि में कितना अरब गया होगा ? * युद्ध सामग्री के खरिद, कमिसन, भ्रष्टाचार आदि में ? अर्थात, रोजाना ४ से कम मानव की मौत हो रहे माओवादी युद्ध को नियन्त्रण करने के लिए दिनरात एक कर दिया था | लोगों में युद्ध का भयावहता को इतना जोड़तोड़ के साथ प्रचारित किया था मानो…(आप ही सोचिए) ? सरकार प्रायोजित आतंक : “वैदेशिक रोजगार और मानव मौत ! ?” सरकार लोगों को उत्साहित करके, प्रोत्साहित करके विदेश भेजता रहा है अर्थात बेच रहा है ताकि देश में रेमिटान्ष आए | उल्लू बनाने की सरकारी जाल में लोग फँसकर रोजाना विदेश जा भी रहे हैं | पैसा/रेमिट पठा रहे हैं | सरकार का नं. १ आय श्रोत बना रहे हैं |

लेकिन क्या कभी आपनें इसे मानवीकरण करके सोचा है ? इसपर कभी गम्भीर होकर विचार किया है ? एकबार जरूर करिए ! ° आज रोजाना ७/८ लाशें विदेश से यहाँ आ रहे हैं | लाश आने की ईस दर को देखें तो १० वर्ष में, जम्मा मानव मौत, [७×३६५×१०] = २५,५५० अर्थात माओवादी जनयुद्ध से दोब्बर !? क्या कहेंगे आप ? माओवादी युद्ध खतरनाक था या अभी का सरकारी आतंक ? मानव जीवन रक्षा की गारन्टी लेनेवाला सरकार योजनाबद्ध लोगों को विदेश भेजता है | विदेश पहुँचे लोगों से रेमिट के नामपर पैसे भी वसूल करता है | परंतु, विदेश में मर जायँ तो सड़ने तक वहीं छोड़ देता है | ईतना ही नहीं, ° बाल बच्चे की भविष्य सँवारने की उद्येश्य लेकर विदेश पहूँचे लोग लौटकर घर पहुँचने तक उलटा रिजल्ट पाता है | ° अभिभावकत्व के अभाव में बच्चे बिगड़ गया रहता है, प्यार के अभाव में बच्चों का दिल कठोर बन गया रहता है | ° वीवी भटक गई रहती है, सामाजिक चरित्र में गिरावट बना चुकी होती है | ( प्रशासन कार्यालयों में ईस सम्बन्धी केश फायल देखें |) ° खुद में सामाजिक लगाव क्षय हो गया रहता है | ° बुढे माता पीता का अन्तिम काल और भी कष्टमय बन जाता है | ° अन्य बहुत सारे… माओवादी जनयुद्ध को समाप्त करने के लिए खरबों खर्च करनेवाला सरकार ईस विकरालता के बारे में क्या कर रहा है ? विदेश जाने के लिए रोक लगाने की योजना ला रहे हैं या विदेश जाने के लिए और ज्यादा प्रोत्साहन भर रहे हैं ? क्या, सरकारी यह आतंक माओवादी आतंक से अधिक खतरनाक नहीं है ?? और सोचने की जिम्मा आपका… जय मधेश !

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