सरकारी आश्वासन व सहमति मधेसी मोर्चा के लिए कहीं हवा मिठाई ही न बन कर रह जाए

विजेता चौधरी, काठमाण्डू, भाद्र १३

सरकार को समर्थन करने से पूर्व राजनीतिक विश्लेषकों व बुद्धिजीवियों ने बार बार मधेसवादी दल को सरकार में नहीं जाने को चेताया था । विगत का समझौता कार्यान्वयन नहीं किया गया है कहते हुए सतर्क भी किया था । लेकिन सरकार को समर्थन करते हुए अपना मत देने वाला मधेसी दल एक बार फिर मुँह के बल गिरने वाला है ।

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अब फिर से वही राजनीतिक खेल दोहराया जा रहा है । नवगठित सरकार द्वारा तीन बुँदे सहमति कार्यान्वय में ढिलाई किया जा रहा है कहते हुए संयुक्त मधेसी मोर्चा अभी असंतुष्ट दिख रही है और इसी के साथ फिर एक बार सहमति जुटाने के नाम में प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल तथा कांग्रेस सभापति शेरबहादुर देउवा से बहस करने के लिए मधेसी मोर्चा म्याराथन शुरु करने वाली है ।

नेपाली कांग्रेस, नेकपा माओवादी केन्द्र तथा संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेसी मोर्चा के बीच हुई तीन बुँदे सहमति अन्तर्गत का तीसरा बुँदा को कार्यान्वयन करने के लिए व्यवस्थापिका संसद में निर्वाचन के दिन अर्थात सावन के १९ गते ही बात हो गई थी लेकिन नई सरकार गठन को एक महीना पूरा होने पर भी मन्त्रिपरिषद ने कार्यान्वयन नहीं किया है, इस बात पर मोर्चा सरकार के प्रति असंतुष्टि व्यक्त कर रही है ।

अधिवक्ता एवम् राजनीतिक विश्लेषक दीपेन्द्र झा ने मधेस वादी दलों को सरकार में नहीं जाने का सुझाव देते हुए कहा था–सीमांकन, नागरिकता तथा संविधान संशोधन का मुद्दा पूरा नहीं हुआ है । विगत में भी हुए समझौतों को कार्यन्वयन नहीं किया गया इसीलिए मधेसी दल को अभी सरकार में नहीं जाना चाहिये । अभी सरकार में जाने से दबाव शक्ति पूर्णतः घट जाएगी, दबाव नही पडेÞगा । इसीलिए सत्ता से बाहर रह कर ही दबाव सृजना करने का कार्य करना आवश्यक है ।

विश्लेषक एवम् प्राध्यापक सुरेन्द्र लाभ ने कहा था – मधेसवादी दल अभी अगर सरकार में जाती है तो फिर से एकबार बदनामी की राह पर चलेगी । इस से ये साबित हो जाएगा की ये दल अवसरवादी हैं । सवाल सरकार में शामिल होने का नहीं सवाल मधेस मुद्दा का, संवोधन का तथा संविधान संशोधन का है । और ये तभी संभव है जब दो तिहाई बहुमत कायम होगी । जो सरकार में जाने से प्राप्त नहीं किया जा सकता है । इस के लिए बाहर से ही दवाब श्रृजना किया जाना चाहिये । प्रतिपक्ष में रह के भी मुद्दे के लिए कार्य किया जा सकता है ।

इतना ही नहीं सरकार को समर्थन करने पर भी राजनीतिक विश्लेषक सीके लाल ने संसदीय संतुलन कायम रखने का अपील किया था ।

लाल की अपील कहाँ तक कारगर सावित होगी यह तो वक्त ही तय करेगा । बहरहाल सरकार ने संविधान संशोधन सम्बन्धी विधेयक संसद में दर्ता करेगी, कहा गया विषय के उपर ही सहमति जुटाने के लिए मोर्चा के शीर्ष नेताओं ने प्रधानमन्त्री दाहाल एवम् देउवा के साथ विचार विमर्श करने का निर्णय लिया है । इस विषय में मोर्चा के शीर्ष नेताओं की बैठक पिछले सप्ताह बैठी थी । वहीं इसी मामले को लेकर तराइ मधेस लोकतान्त्रिक पार्टी के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर एवम् संघीय समाजवादी फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने शुक्रबार को भी भेंट की ।

घायलों के इलाज तथा क्षतिपूपर्ति में सरकार द्वारा हो रही देर होने के कारण गत बुधबार को हुए मोर्चा की एक बैठक में मन्त्रीपरिषद ने संघीय समाजवादी फोरम के उपाध्यक्ष लालबाबु राउत के संयोजकत्व में कार्यदल बनाया है ।

उक्त कार्यदल ने गृहमन्त्री विमलेन्द्र निधि के साथ कल रविवार को भेंट की । राउत ने शहीद घोषणा के बाकी लोगों एवम् घायलों को सरकारी इलाज खर्च तथा राजनीतिक बंदी की रिहाई के विषय में गृहमन्त्री से सवाल किए जाने के विषय में बताते हुए कहा कि गृहमन्त्री निधि ने कुछ सहमति कार्यान्वयन हुई है और कुछ जल्द ही किए जाने का आश्वास दिया है ।

अगर सरकार मधेसी मुद्दा को संबोधन नहीं करेगी तो फिर आन्दोलन गति लेगी कहने वाले अध्यक्ष ठाकुर के अलावा मोर्चा भी सरकार द्वारा घोषित स्थानीय निकाय के निर्वाचन को ले कर असंतुष्ट हैं । मोर्चा की धारणा है कि स्थानीय तह के सीमा एवम् संख्या का विषय समाप्त करने पर ही निर्वाचन किया जाए ।

यद्यपि सरकार का अभी का रुख बदला हुआ सा स्वयम मोर्चा को भी प्रतीत हो रहा है । बहरहाल अब देखना यह है कि सरकार का आश्वासन व सहमति कार्यान्वयन होता है या ये सिर्फ मधेसी दलों के लिए हवा मिठाई ही सावित होकर रह जाएगी ।

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