सरकारी नस्लवाद का शिकार नेपालगन्ज

नेपालगन्ज मध्यपश्चिम का केन्द्र है । इसे केन्द्र के रूप में विकास करते रहना चाहिए भौगोलिक हिसाब से भी नेपालगन्ज उच्च अदालत और राजधानी के लिए सक्षम है ।

विनय दीक्षित
नेपाल का संविधान २०७२ जारी होने से पहले देश में संघीयता को लेकर जनता में बडी आशंका रही है । थरुहट, मधेश, सुर्खेत जैसे आन्दोलन इसी संघीयता के विभाजन और विवाद के स्वरूप के रुप में लिए गए हैं । जनता ने संघीयता के ढाँचा को शुरु से ही स्वीकार नहीं किया । सबसे लम्बे आन्दोलन के रूप रहे मधेश आन्दोलन की माँग इन्हीं कड़ियों में उलझ गयी थी । संविधान ने ७ प्रादेशिक ढाँचा को स्वीकार किया, लेकिन जनता ने नहीं । अभी तक असन्तोष, आक्रोश और आलोचना लगातार चल रही है ।

इसी बीच सरकारी नस्लवाद अर्थात सत्ता केन्द्रित एक खास समुदाय को खुश रखने के लिए संसद ने प्रदेश नं.५ की राजधानी और उच्च अदालत दांग जिले के तुलसीपुर में रखने का निर्णय किया ।
इस निर्णय ने नेपालगन्ज के साथ बाँकेवासियों को भी सरकारी नस्लवाद पर विचार करने पर बाध्य कर दिया । जो सरकार के प्रति पहले आशंका थी अब वह विश्वास में तब्दील हो गए । मधेश आन्दोलन और नाकाबन्दी के दौरान भी यह बात चर्चा में रही कि राजधानी और उच्च अदालत के लिए नेपालगन्ज पूर्ण रूप से, भौगोलिक, भौतिक और सुविधाओं के हिसाब से सक्षम है । लेकिन पिछले हपm्ते सरकार के निर्णय ने बाँके वासियों को एकबार फिर सरकारी षड्यन्त्र का शिकार बनाया । सरकार ने पुनरावेदन अदालत को खारिज करते हुए ७ प्रादेशिक ढाँचा में उच्च अदालत और राजधानी स्थापना करने का निर्णय लिया ।
इस निर्णय ने बाँके में फिर आन्दोलन का रुख मोड़ दिया । इस बार सिर्फ मधेशी समुदाय ही नहीं, अन्य पार्टी कार्यकर्ता और जनता भी नेपालगन्ज की गरिमा को बचाने के लिए सड़क पर उतरने की तयारी की है । नेपालगन्ज में राजनीतिक दलों संयुक्त रूप से पत्रकार सम्मेलन कर आन्दोलन के स्वरूप की जानकारी दी, और प्रशासन के मार्फत सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए कहा है कि सरकारी निर्णय उचित नहीं है, इसे बदला नहीं गया तो बाँके के लोग चुप नहीं बैठेगें ।
लोगों में अक्रोश और निराशा साथ–साथ है । कितना आन्दोलन करें ? अब लोगों का सवाल यह उठने लगा है । नेपालगन्ज को प्रादेशिक राजधानी बनाने के लिए इससे पहले भी विभिन्न आन्दोलनों मे मुहिम चली, केन्द्र तक चर्चा हुई, लेकिन प्रतिफल के समय पर फिर नेपालगन्ज के लोगों को धोखा ही मिला ।
नेपालगन्ज में अभी तक पुनरावेदन अदालत था । उसे खारिज कर सरकार ने उच्च अदालत भी दांग स्थित तुलसीपुर में स्थापना करने का निर्णय लिया । इस निर्णय से तरंगित लोग अब फिर एकबार अपने जिले के अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष की तयारी में है ।
संसद ने देश की १४ पुनरावेदन अदालत विघटन कर सात उच्च अदालत गठन करने का विधेयक पिछले हपm्ते पारित किया । नेपाल के संविधान में सभी ७ प्रदेशों में उच्च अदालत रखने का प्रावधान है । सरकार ने प्रदेश नं.१ का उच्च अदालत विराटनगर में, २ का जनकपुर में, ३ का ललितपुर में, ४ का पोखरा में, ५ का दाङ तुलसीपुर में, ६ का सुर्खेत में और ७ नं.प्रदेश की उच्च अदालत दिपायल में रखने का निर्णय किया है । इस निर्णय के बाद नेपालगन्ज के हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं ।
क्या कहते हैं लोग ?
पिछले दिनों की राजनीतिक अस्थिरता और जातीय जिम्मेवारी निर्वाह करने की कवायद को देखें तो इस देश में कुछ भी असम्भव नहीं है, अधिवक्ता विश्वजीत तिवारी ने कहा, सरकार का षडयन्त्र नेपालगन्ज में बार बार देखने को मिलता है । नेपालगन्ज से कई सरकारी कार्यालय सुर्खेत में स्थानान्तरण किए गए हैं । जिले में लोग कितना आन्दोलन करें और कितनी आवाज उठाएँ ? सभी लोग परेशान हैं सरकारी रवैया से । पहली बात तो जनता सचेत नहीं है, तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के नेता ललित रौनियार ने कहा, मधेशियों को जातीय विभाजन में रखकर एमाले, माओवादी और काँग्रेस पार्टी नेपालगन्ज का विकास करना ही नहीं चाहती ।

उन्होंने कहा, अभी तक जितना भी विकास हुआ है वह स्वतः ही हुआ । नेपालगन्ज के साथ विभेद होना कोई नई बात नहीं है, यहाँ सड़क से लेकर साधन तक हर जगह विभेद देखने को मिलता है । कभी नेपालगन्ज भी अच्छे शहरों के रूप में गिना जाता था लेकिन अब इतिहास मात्र बाकी बचेगा ।
युवा अधिकारकर्मी विशाल राना कहते हैं, नेपालगन्ज के वासियों को कोई मतलब नहीं है इस निर्णय से इसी लिए राजधानी और उच्च अदालत अन्य जगह स्थापित करने का निर्णय लिया । राना ने कहा, उद्योग वाणिज्य संघ, गैरसरकार निकाय, राजनीतिक प्रतिनिधी और स्थानीय लोगों को कसकर सरकार के निर्णय के विरुद्ध काम करना चाहिए । उन्होंने कहा, भौगोलिक और बाकी सभी सुविधाओं के हिसाब से नेपालगन्ज उचित है ।
गाँवपालिका गठन से लेकर राजधानी और उच्च अदालत ही नहीं, पहली बात तो हम संविधान ही स्वीकार नहीं किए हैं सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण वर्मा ने कहा, जब हम संविधान ही नहीं मानते तो सरकार की विभेदकारी निर्णय भी हमें स्वीकार नहीं है । हम विरोध की तैयारी में हैं, सरकार को जल्द पता चलेगा कि बाँके के लोगों ने सरकारी निर्णय को किस हिसाब से लिया हैै ।
स्थानीय शान्ति समिति बाँके के अध्यक्ष तेजबिक्रम शाह ने कहा, सरकार का निर्णय बिल्कुल अव्यवहारिक है । नेपालगन्ज मध्यपश्चिम का केन्द्र है । इसे केन्द्र के रूप में विकास करते रहना चाहिए भौगोलिक हिसाब से भी नेपालगन्ज उच्च अदालत और राजधानी के लिए सक्षम है ।

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz