Wed. Sep 19th, 2018

सरकारी षडयंत्र के चक्रव्यूह में फ़सें अस्थाई शिक्षक : अजयकुमार झा

अजयकुमार झा, जलेश्वर |विगत चार दिनों से अपनी सम्मान और अधिकार प्राप्ति के लिए आमरण अनसन पर बैठे अनसन कारियों की अवस्था गंभीर होती जा रही है। परन्तु अस्थाई शिक्षक को विस्थापन करने को अमादा सरकार को इनकी सूझ तक लेने की फुर्सद नहीं है। दो दो महिला शिक्षक आमरण अनसन पर बैठी हैं नाम है सरस्वती आचार्य और अमृता के सी तथा पुरुष में धर्मेन्द्र ठाकुर अनसन पर बैठे हैं।
नेपाल में विगत के 30 वर्षो में हजारों राजनीतिक परिवर्तन हुए, संबिधान परिवर्तन हुआ, शासन व्यवस्थाएं परिवर्तन हुए, सरकार परिवर्तन किए गए परन्तु विद्यालय कि शिक्षा मार्गनिर्देश करने वाली शिक्षा ऐन में समय सापेक्ष संसोधन नहीं हो सका। विगत के एक भी सरकार और सरकार संचालन की बागडोर सम्हाल्ने बाली पार्टी नेतृत्व वा शिक्षा मंत्रि तक संशोधन के लिए भीतर से तयार नहीं दिखे। वास्तव में वो लोग विद्यालय और शिक्षा क्षेत्र को अपनी राजनीतिक स्वार्थ पूर्ति का क्रिडा स्थल बनाने में उद्धत मात्र देखे गए। तो उधर शिक्षकों को ईमान्दार, लगनशिल और पेशागत शिक्षक बनने की उत्प्रेरणा जगाने के बदले अपनी चुनावी कार्यकर्ता वनाने में प्रयासरत रहे। शिक्षकों के साथ divide and rule की रणनीति अपनाकर षडयंत्र पूर्ण कूटनीति में फसा अपने अपने पार्टी के भात्रृ शिक्षक संघ, संगठन, मंच, परिषद इत्यादि स्थापना कर शिक्षकों को आपस में ही लड़ाकर कमजोर और दीनहीन बना दिया गया। शिक्षक के अधिकार हेतु लड़ने बाले अगुआ शिक्षक के रुपमे प्राथमिक शिक्षकों का बहुमत रहा। जिनकी दूरदर्शिता के बारे में सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। लेकिन यह तो लोकतंत्र का कमाल है जिसका परिणाम आज हजारों शिक्षक भुगत रहे हैं। मूढो के हाथ में सत्ता सौपना आत्मघात के साथ साथ सामूहिक हत्या का भी कारक होता है।

एक हीं विद्यालय में शिक्षण करने बाले शिक्षकों में भी कितना भेदभाव है यह आपको आश्चर्य से भर देगा।स्थायी, अस्थायी, करार, राहत, सैलरी पिसिएफ, नन सैलरी पिसिएफ, महिलाकोटा, निजीस्रोत, सट्टा, लियन, प्रथम श्रेणी, द्वित्तीय श्रेणी, तृतीय श्रेणी, प्राशि, निमाशि, माशि र उमाशि जैसे विविध नामों में बिभाजन कर तीसों बर्ष से शिक्षण करते आ रहे शिक्षक लोग आज भी अस्थायी ही हैं। हजारों तो अस्थाई की अवस्था में ही रिटायर्ड भी हो गए। और खाली हाथ घर लौटा दिए गए। एक गुरु के सम्मान और संतान के साथ राज्य के द्वारा किया जा रहा यह सबसे क्रूर प्रहार है।क्योंकि आज हजारों शिक्षकों को फिर से षडयंत्रपूर्वक खाली हाथ लौटाने का योजना बनाया जा रहा है गोल्डेन हेंड सेक के नाम पर।

शिक्षा ऐन में गोल्डेन हेण्डसेक की बात उल्लेख न कर सिर्फ अस्थायी शिक्षकों को सुविधा देने की बात की गई है। जिस में षडयंत्र ही षडयंत्र है। अस्थायी शिक्षकों को मुहैया कराई जाने बाली सुविधा के बारे में कार्यविधि निर्माण के क्रममे चार प्रकार के विज्ञापन की परिकल्पना कर प्रत्यक्षा विभेद और षडयंत्र की गई है। २०४९ साल तक के समूह, ०४९ से ०६१ तक के दूसरा समूह, और ०६१ से ०६३ तक के दरबन्दी में २०७२ आश्विन २ गते तक को आन्तरिक और खुला रुपमें आयोग लड्ने की सुविधा उल्लेख कर ४ समूह की कानून विपरीत परिकल्पना की गई है। एक ही राज्य में एक ही संविधान के तहत नियुक्त किए गए शिक्षकों के बिच विभेद पूर्ण व्यवहार को कानून विपरीत कार्य सावित कर सर्वोच्च ने सभी अस्थाई शिक्षकों के साथ समान व्यवहार करने को हिदायत सरकार और शिक्षक सेवा आयोग को दे चूका है। परन्तु आततायी सरकार और उसके चमचे अपनी कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने की षडयंत्र में हजारों शिक्षकों के जीवन और बालबच्चे के भविष्य के साथ खिलबाड़ करने जा रही है। जिस माओवादी ने देस को लुटा,आगजनी की,सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट किया,हजारो नेपालियों को मौत के घाट उतार दिए। शिक्षकों को मारा,लुटा, दस वर्ष तक देस को बंधक बनाकर रखा,विकास के गति को 100 वर्ष पीछे धकेल दिया! सिर्फ सत्ता के लिए। उसके गुंडे को आज से 8 वर्ष पहले 10- 10 लाख इनाम दिया गया था। लेकिन राष्ट्र सेवक,समाज के नेत्र ,इमानदार और समाज से लेकर सरकार तक के दवाव में काम करने बाले निरीह प्राणी शिक्षकों के साथ जो आज दरिद्रों जैसा व्यवहार किया जा रहा है उसका एक ही कारण है की शिक्षक माओवादी की तरह बन्दुक नहीं उठा सकता यह सरकार को भलीभांति पता है। यह तो जिसकी लाठी उसकी भैंस बाली बात हो गई। शिक्षक को नेपाल सरकार के किसी श्रेणी में नहीं रखा जाना शिक्षक के गरिमा की क्षुद्रता को इंगित करता है।
आज अपनी अधिकार और सम्मान के लिए अनसन कर रहें शिक्षकों के समूह को नेपाल रा ज पा के संयोजक श्री महंथ ठाकुर जी द्वारा किया गया समर्थन प्रशंसनीय कदम है। यह प्रजातांत्रिक राजनीतिक संस्कार का प्रामाण भी है।

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