सरकार और आन्दोलनकारी दोनों से ब्यापारियों का शोषण होता है : बिजय सरावगी

वीरगंज ,१० सेप्टेम्बर | देश की आर्थिक नगरी बिरगंज, मधेश आंदोलन से पहले तक रौनक की चकाचोंध में डूबी थी। हर दुकान, फैक्ट्री में चहल-पहल दिखती थी, आज दुकानें ख़ाली पड़ी है, अब ग्राहकों का नामोनिशान तक नहीं है, दुकानदारों को किराया देना मुश्किल पड़ रहा है। पहले बिरगंज से रक्सौल जाने में घंटो लगते थे, आज सड़के भी ख़ाली पड़ी है। आख़िर इस मंदी का  कारण क्या है ? क्यो अचानक उपभोक्ता की क्रयशक्ति क्षीण हो गई ? इसके गर्भ में कई सवाल और भविष्य की कई आशंकाओ की खोज जरूरी है । इस सम्बन्ध मे प्रस्तुत है, बिरगंज के प्रभावशाली ब्यवसायी ‘बिजय कुमार सरावगी’ से ‘हिमालनी’ संवाददाता  धनजिव मिश्रा से बातचीप के मुख्य अंश।

बिजयकुमार सरावगी

१.ब्यापार कैसा चल रहा है ?
ब्यापार कि तो बात ही मत किजीए, बहुत ज्यादा बुरा हाल है, बस यु समझीए की बैठकर दिन बिता रहे है । अब तो सारे ब्यापारी सोचने पर मजबूर हो गए है की अब क्या करे ?

२.बिरगंज तो ब्यापार का गढ़ है, फिर ऐसा क्यों हुआ ?
देखीए, बिरगंज आर्थिक नगरी होने के कारण ही, कोई भी बात होती है, तो लोग मन मे बैठा लेते है, की चलो बिरगंज बन्द कर देंगे अपना काम बन जाएगा, लेकिन यहा के ब्यापार अथवा ब्यापारी पर क्या असर पडेगा ? ब्यापारीयो से कुछ राय मसौदा करे इस बारे मे यहां के राजनितिक दल तनिक भी नहीं सोचते है, जिसके कारण ब्यापारी के मन मे डर पैदा हो गया है ।

३.क्या दुसरें मूल्क से आनेवाले माल समान के रूट मे भी परिवर्तन हुआ है ?
देखिए क्या है, कि जब ट्रेड सिफ्ट होता है तो रूट भी अपने आप बदल जाता है, अब यहा पर ६ महीना नाकाबन्दी हुआ, लेकिन बाकी जगहो पर तो नहीं हुआ, जिसके कारण ब्यापारी यहा के बजाए जगह बदल दिया, अब वहा पर परमानेन्ट डिपो, गोदाम और आफिस बना चुके है, और इतना लगानी लगाने के बाद फिर सिफ्ट होना तो मुश्किल है । अब देखिए बिरगंज भन्सार का पुराना राजस्व अभी तक वापस नहीं आया है ।

४.मधेश आन्दोलन तो आप लोगों के लिए ही हुआ था, फिर अब हाय-तौबा क्यो मचा रहे है ?
सबसे बडी बात तो ये है, कि लोग समझते है की आन्दोलन हमारे लिए हो रहा है और वे सहयोग भी करते है, लेकिन ६ महिना बन्दी के बाद भी मधेश को क्या मिला ? अभी तक मधेश के नेतालोग ये जानकारी कराने की कोशिश भी नहीं किए की  इतने बडे़ आन्दोलन के बाद भी हमारी मांग क्यों पुरी नहीं हुई ? अथवा ५ मे से २ दो मिल गई बाकी के लिए फिर लडना पडेगा या क्या करना पडेगा इसके बारे मे छलफल तक नहीं किया, जिसके कारण मधेशी दल से जनता का भरोसा हटने लगा है । लोग यह समझने लगे है की पता नहीं इन लोग का झगड़ा कबतक चलेगा, इसी कारण यहाँ के ६०% ब्यवसायी पलायन हो चुके है ।

५.वीरगंज का समान दूसरे रूट से आने सेे लागत खर्च ज्यादा नहीं होता है ?
यहा के मूकाबले दुसरे रूट से मालसमान लाने पर डेढ़ गुणा खर्च बढ जाता है, लेकिन यहाँ से ज्यादा सुरक्षा के अनुभूती वहा पर होता है और ब्यापारी खर्च से ज्यादा सुरक्षित रहना पसन्द करता है । आज बिरगंज मे इतना बडा आन्दोलन हुआ जिसके कारण लोग दुसरे शहर मे गए वहाँ पर भी ऐसा ही रहा तो कहीं और जाएंगे ब्यपारी के लिए तो पुरा दूनिया खुली हुई है ।

६.सरकार और आन्दोलनकारी दोनो में से आप लोग को सहयोग कौन करता है ?
मत पूछिए, सरकार वाले समझते है की बिरगंज के ब्यापारी आन्दोलन कराते है और आन्दोलन करने वाले समझते है कि हमलोग सहयोग नहीं करते है । ब्यापारी तो इसमे बली का बकरा बन चुका है, दोनों का तलवार हमेशा हमारे ही गर्दन पर रहता है । इसलिए सहयोग की बात छोड़ दिजिए, उल्टे सरकार और आन्दोलनकारी से हमलोगों का शोषण होता है ।

७. आन्दोलन तो संक्रमणकाल के कारण है, पर प्रशासनिक तौर पर क्या अवस्था है ?
प्रशासन का मुख्य कार्य है, कानुन व्यवस्था संभालना, अब देखिए दिन दहाडे़ केडिया का अपहरण हुआ, हरेक पार्टी को अपना कार्यक्रम बिरगंज मे करना है, जिससे चन्दा आतंक का खतरा रहता है, फैक्ट्री मे राजनीतीक दबाव रहता है, इन सब के बिच स्वस्थ व्यापार कैसे मुमकीन है ? अपराधी के भय से खुलेआम निकल नहीं सकते, धमकी के भय से फोन पर बात नही कर सकते, हमारी जिंदगी पिंजडे मे कैद सी हो गई है। इतिहास गवाह है, दुनि़या में किसी भी मुल्क की तरक्की में ब्यापारी का मुख्य योगदान रहा है, और इनकी अनदेखी पतन का कारण रहा है, ये बात बिरगंज और नेपाल दोनो पर लागु होती है ।

 

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