सरकार और मोर्चा कहीं अकबर बीरबल की खिचडी तो नहीं ?– कैलाश महतो

कैलाश महतो, परासी, ११ सेप्टेम्बर, संविधान संसोधन आन्तरिक मामला, विदेशी सहयोग जरुरी नहीं
अपने दरबार में लगी एक सभा में उपस्थित सज्जनों से सम्राट अकबर ने कहा, मेरे दरबार से कुछ दुरी पर अवस्थित पोखरी के ठण्ड पानी में जो रात भर खडे रहेगा, उसको एक बडे थैले में बहुमूल्य आभूषणें उपहार दी जायेगी । अकबर के प्रस्ताव को वहाँ उपस्थित लोगों ने स्वीकार नहीं सका तो उस प्रस्ताव को पूरे राज्य में फैलाया गया । उस समाचार को सुनकर एक गरीब ब्राम्हण अकबर के दरबार में आया और पूरे रात पानी में खडे रहने को स्वीकार किया ।

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राजा के आदेश अनुरुप ही वह ब्राम्हण रात भर दरबार के तरफ मुख करके पोखरी के मध्य में गलेतक के पानी में रातभर खडे रहा । सुबह जब राजा ने उससे पूछा कि उतने ठण्ड पानी में वह दुबला पतला ब्राम्हण कैसे खडा रहकर जीवित रह पाया ? जबाव में ब्राम्हण ने कहा, “महाराज, रातभर आपके दरबार में जलते बल्बों को देखता रहा और वे दिखने में इतने सुन्दर लग रहे थे कि रात कैसे कटी और ठण्ड कैसे टल गयी, पता ही नहीं चला ।” ब्राम्हण का जबाव सुनकर अकबर ने कहा कि वह ब्राम्हण कोई उपहार नहीं ले सकता । क्यूँकि उसने दरबार के जलते बत्तियों के गर्मी को प्राप्त किया था । ब्राम्हण बिना कुछ बोले उदास चला गया ।
इन सब को देख रहे बीरबल ने अकबर को पाठ सिखाने को ठान ली । दुसरे दिन अकबर दरबार में नहीं पहँुचा । अकबर ने सन्देश बाहकों को भेजकर बीरबल का खबर लिया और जबाव मिला कि वो खिचरी पका रहा है । दो प्रहर को फिर खोजबिन हुई तो वही जबाव मिला कि वो खिचडी पका रहा है । शाम को फिरसे अकबर को वही सन्देश मिला कि वो खिचडी ही पका रहा है । अकबर को अब आश्चर्य हुआ कि बीरबल ऐसा कौन और कैसा खिचडी पका रहा है कि सुबह से शामतक खिचडी पक नहीं पाया ? वे खुद जब बीरबल के घर पहुँचा तो देखा कि एक वर्तन को एक लम्बे खम्बे के छोर पर लटकाया था और नीचे आग का एक चुल्हा जला रहा था । अकबर ने पूछा कि वह क्या कर रहा है ? तो जबाव में बीरबल ने कहा, “महाराज, देख नहीं रहे हैं कि मैं खिचडी पका रहा हूँ ?” अकबर ने कहा कि आकाश में उतने उपर टङ्गे वर्तन में इतने नीचे के आग कैसे खिचडी पका सकता है ? तो बीरबल ने तुरन्त जबाव में कहा कि महाराज, “आपके दरबार में जल रहे बत्तियाँ दुर पानी में खडे ब्राम्हण को गर्मी दे सकता है तो यह दुर जलता हुआ आग खिचडी क्यूँ नहीं पका सकता ?”
बीरबल की उस तरकीब ने अकबर की आँखे खोल दी और उन्होंने उस ब्राम्हण को दरबार में बुलाकर क्षमा माँगते हुए उसे आभूषणों की सारी उपहार प्रदान की ।
नेपाल का संविधान भी अकबर बीरवल की वही खिचडी है जो कभी पक ही नहीं सकता और वेचारा प्रचण्ड सरकार और मधेशी मोर्चा में अब तो पता भी लगाना मश्किल हो गया है कि अकबर कौन है और बीरबल कौन ? ऐसा लग रहा है कि दो खेलाडी अकबर और बीरबल तो इस संविधान संसोधन या पूनर्लेखन के रङ्गमञ्च से भी कहीं बाहर तो नहीं है ?
अबतक तो यह भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि संविधान की संसोधन होगी या पूनर्लेखन ? मधेशी मोर्चा को सबसे पहले यह स्पष्ट करना होगा कि उसका बटम लाइन क्या है ? मधेश आज भी अन्योलता का शिकार होता नजर आ रहा है कि उसके नेतृत्व आखिर चाहता क्या है ? वह एक तरफ यह कहता सुना जा रहा है कि सरकार में वह तबतक नहीं जायेगा जबतक उसकी माँगो का सम्बोधन नहीं हो जाता है । उनके ही बातों को मानें तो यह तो निश्चित ही है कि मोर्चा सरकार में जाने को बेताब दिख रही है, मगर वर्तमान सरकार ही उसके रास्ते का बाधक बना बैठा है । वहीं दुसरी तरफ मधेश इस इन्तजार में है कि देखें उसके नेतृत्व अब कौन सा रणनीति अख्तियार करती है ? खैर जो भी हो, एक बात तो तय है कि सरकार या मोर्चा जो भी रणनीति तय करें, इस हालात में हार दोनों की है । सरकार मधेशी मोर्चा के अडान के स्तर पर न तो कोई निर्णय कर सकती है न मोर्चा उसके लिए सक्षम हो पाने की अवस्था है । क्यूँकि सरकार के पास संविधान संसोधन या पूनर्लेखन करने करबाने की दो तिहाई बहुमत की औकात नहीं दिखती है । ये बात मधेशी मोर्चा और सरकार दोनें जानती है । फिरभी आश्वासन सरकार भी देने से पिछे नहीं है कि मधेशी मोर्चा के जायज माँगों को सम्बोधन करके उसे सरकार में लाना है तो दुसरी तरफ मोर्चा भी इस धाक धम्की के साथ मधेश में अपना विश्वास कायम करना चाहता है कि वह सरकार से समर्थन फिर्ता ले सकती हैं अगर उनकी माँगों को सम्बोधन संविधान में नहीं होता है ।
इस और उस दोनों अवस्थाओं में राष्ट्रिय और अन्तरर्राष्ट्रिय रुप से घाटे अगर होना है तो वह केवल मधेश को ही है । मोर्चा के अनुसार संविधान संसोधन न तो सरकार करना चाहेगी न उसके विपक्षी । और यह आन्तरिक झगडों को दिखाकर राष्ट्रिय तथा अन्तरर्राष्ट्रिय शक्तियाँ यह कहने को बाध्य हो जायेगी कि नेपाल अपने आन्तरिक समस्याओं को पहले सुलझाये और वे शक्तियाँ दोनों तरफ से वाहवाही बटोर कर दोनों तरफ से अपनी रणनीतिक फायदे उठाने में सफल रहेंगे ।
मधेशी मोर्चा के मुखिया स्तर के नेतृत्व अब राष्ट्रभक्ति का एक नयाँ पैजामा सिलाने का नाटक कर रहे हैं । उनका कहना अब यह शुरु हआ है कि प्रचण्ड के दो उपप्रधानमन्त्री दो पडोसी मूल्कों में नेपाली संविधान के बातों को लेकर जाना राष्ट्रियता को कमजोर करने जैसा है । वे संविधान को नेपाल में अपने ही बलबूता पर संसोधन और लागू करना चाहते हैं । लेकिन इस बात को वे भूल जाते हैं कि उनके नेपाल के आन्तरिक आन्दोलन के मामलों में ही अनुशासित और सहमें हुए नर्सरी क्लास के बच्चों जैसे पोज में वही भारतीय नेताओं के सामने बैठते हैं और भारतीय नेता उन्हें कमजोर विद्यार्थियों के जैसे फटकारने जैसा व्यवहार करते हैं । तब राष्ट्रियता कमजोर नहीं होती है ।
जो भी हो, विश्लेषण करने बाले यही विश्लेषण कर सकते हैं कि मधेशी मोर्चा के नेतृत्व इस बात से परेशान दिखने लगे हैं कि जो काम उनके द्वारा होना चाहिए था, वह विमलेन्द्र निधी और  महरा ने कर ली और बेचारे वे पिछे क्यूँ छुट गये ?

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