सरकार की चुनावी चुनौतिया

मुकुन्द आचार्य:आज देश अस्तव्यस्त है। राजनीतिक दलों का हाल बेहाल है। वे सभी के सभी असफल सिद्ध होने पर तुले हैं। अन्ततः बडी बेशर्मी के साथ उन्होंने न्यायपालिका की शरण ली। देश में दण्डहीनता पूरी जवानी पर है। कहाँ चली गई कानूनी राज्य की परिकल्पना – न्यायपालिका कोई आदेश दे तो उसे भी लोग एक कान से सुनकर दूसरे से उड देते है। ऐसी स्थिति में डा. बाबुराम भट्टर्राई प्रधानमन्त्रीत्व से मुक्त होते हैं और सर्वोच्च के प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेग्मी चुनावी अन्तरिम सरकार के प्रधानमन्त्री नियुक्त होते हैं।
महीनों की प्रसववेदना के बाद राजनीति ने जन्म दिया- ‘चुनावी स्वतन्त्र सरकार’ को। सामान्यतया किसी भी देश के इतिहास में संविधान निर्माण के लिए संविधानसभा का निर्वाचन एक बार ही होता है, लेकिन हाय री नेपाल की राजनीति ! जिसने नेपाल को एक विचित्र देश के रुप में चर्चित कर दिया। देश  में पुनः संविधानसभा के लिए चुनाव हो रहा है। क्रमशः देश चुनावमय बनता जा रहा है। और मजे की बात तो यह है कि राजनैतिक दलों ने इस महत्वपर्ूण्ा चुनाव सम्पन्न करने की जिम्मेदारी गैरराजनीतिक लोगों के कंधो पर डाली है। इस कथन का तार्त्पर्य यह न निकाला जाए कि इस चुनावमुखी स्वतन्त्र सरकार में जो मन्त्री और अन्य प्रमुख पदों पर नियुक्त हुए हैं, और होंगे, वे सभी नालायक हैं। नियुक्त लोग अनुभवी सरकारी सेवक रह चुके हैं। लोगों को उनसे ढेÞर सारी आशाएं है, और आशान्वित होना उतना अस्वाभाविक भी नहीं कहा जा सकता।
मार्गशर्ीष्ा तक निर्वाचन करने के लिए गठित सर्वोच्च अदालत के प्रधानन्यायाधीश खिलराज रेग्मी के नेतृत्ववाली सरकार अभी तक र्सवस्वीकार्य चुनावी माहौल बनाने में असफल रही है, हालांकि यह कहना कुछ जल्दबाजी ही होगी। फिर भी यह तो कहा जा सकता है कि वर्तमान चुनावी मन्त्रिपरिषद् ने अभी तक निर्वाचन की मिति निश्चित कर घोषित कर पाने में सफलता नहीं पाई है।udyog_sangathan
इस सर्न्दर्भ में स्मरणीय है, विघटित संविधानसभा की तकरीबन एक तिहाई शक्ति वर्तमान नवगठित सरकार के विरोध में सडÞक में उतरी है। दो बडÞी शक्तियां नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले भी अभी खुलकर चुनावी मैदान में नहीं कूद पाये हैं। इसका बहुत बडÞा कारण है- उन दलों की आन्तरिक मत भिन्नता। दोनों दलों का नेतृत्व वर्ग अपनी पार्टर्ीीो पर्ूण्ा रुप से चुनाव के लिए तैयार नहीं कर पा रहा है। खुद चुनाव र्समर्थक दल, खुलकर चुनावी मैदान में न कूदने से र्सवसाधाधराण जनता अनिश्चितता के वातावरण में झूलती रहेगी। देशव्यापी रुप में चुनावी माहौल खडÞा करना बच्चों का खेल नहीं है।
मधेशी दलों की अवस्था भी किर्ंकर्तव्यविमूढता की ओर झुकी हर्ुइ है। सारे मधेशी दल पर्ूण्ा रुप से स्वार्थलोलुप, सत्तालोलुप हो गए हैं। उन्हें मधेशी जनता के हकहित का कोई ध्यान नहीं है- ऐसा आरोप आज मधेश में हर बुद्धिजीवी और सचेत नागरिक का है। इसीलिए आगामी निर्वाचन में सिर्फमधेश का नारा दे कर नेता अपनी नैया को चुनावी-वैतरणी पार नहीं लगा पाएंगे, यह तो निश्चित है। बार-बार जनता को आप बेवकूफ नहीं बना सकते हैं। ये जनता है, जब जानती है।
जिन दलों ने जनता के लिए कुछ भी नहीं किया, सिर्फसत्ता साझेदारी में सहभागी हो कर देश को खूब लूटा, वैसे ही दल चुनाव में जाने से तो कतराएंगे ही। निर्वाचन मार्गशर्ीष्ा तक हो तो बहुत बेहतर, अर्थात् वही ‘शुभस्य शीघ्रम्’ वाली बात। लेकिन सरकार के विरोध में सडक आन्दोलन में उतर आए दो दर्जन से ज्यादा विरोधी दल के कारण मार्गशर्ीष्ा तक भी निर्वाचन हो पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है। वर्तमान सरकार के लिए सबसे बडÞी चुनौती यही है।
साथ ही निर्वाचन आयोग में अनुभवी पदाधिकारी की नियुक्ति होगी तो छोटी अवधि के अन्दर चुनाव कराने में सफलता मिल सकती है। निर्वाचन स्वयं में एक प्राविधिक विषय है। पहले जो चुनावी अनुभव ले चुके हैं, वैसे पदाधिकारियों को इस निर्वाचन में दायित्व देना बहुत बडÞी बुद्धिमानी होगी। नए रंगरुट लेने पर उनको चुनावी तालीम देनी होगी और ये नए लोग स्वार्थवश पक्षपाती भूमिका भी निर्वाह कर सकते हैं। इसका परिणाम बहुत भयावह भी हो सकता है। इसके लिए रेग्मी सरकार को बहुत ही र्सतर्क रहना है। निश्चित समय में निष्पक्ष निर्वाचन कराना रेग्मी सरकार के लिए स्वयं में एक बडÞी चुनौती है। न्यायपाकिला के सर्वोच्च व्यक्ति को कार्यपालिका का सर्वोच्च व्यक्ति बनकर चुनाव सम्पन्न कराना है, वह भी निष्पक्ष और शान्तिपर्ूण्ा। देश की अवस्था और यात्रा की कठिनाई दोनों अपनी चरम सीमा पर हैं।
यह तो मानना ही होगा कि नए संविधान का निर्माण न हो पाने से देश अभी गंभीर राजनीतिक गतिरोध में फंस हुआ है। इस गतिरोध से बाहर निकलने का सबसे बढिÞया लोकतान्त्रिक निकास तो निर्वाचन ही हो सकता है। निर्धारित समय के अन्दर निष्पक्ष निर्वाचन हो जाए तो पटरी से उतरी हर्ुइ संविधान निर्माण प्रक्रिया पुनः पटरी पर आ सकती है। इस सपने को साकार करने की सबसे बडÞी जिम्मेदारी खिलराज रेग्मी नेतृत्व की चुनावी सरकार की है।
सबसे बडÞी चुनौती के रुप में मोहन वैद्य नेतृत्व के नेकपा-माओवादी द्वारा माँग की गई विभिन्न पाँच शर्ताें को लिया जाना चाहिए। माँग पूरी न होने पर निर्वाचन बहिष्कार करेंगे’ ऐसी धमकी नेकपा-माओवादी दल की ओर से दी गई है। हालांकि देश चुनावी माहौल की ओर अग्रसर हो रहा है। ऐसे समय में नेकपा-माओवादी द्वारा रखी गई शतोर्ं का कोई औचित्य भी नहीं दिखता है। और व्यावहारिक रुप से भी इन्हें पूरा करना असम्भव सा लगता है। नेकपा-माओवादी को कैसे चुनावी मूलधार में लाया जाए इस तरफ भी चुनाव कराने के उद्देश्य से ही गठित वर्तमान गैरदलीय अन्तरिम सरकार ने चुनावी तैयारी शुरु कर दी है। लम्बे समय से जो गठन नहीं हो पा रहा था, वो संवैधानिक परिषद् को पर्ूण्ाता मिलने पर निर्वाचन आयोग में भी रिक्त पदों की पर्ूर्ति हो रही है। राजनीतिक दल चुनावी गृहकार्य में जुटने लगे हैं। एमाओवादी ने तो निर्वाचन घोषणापत्र लिखने और नेताओं का चयन करने का काम भी शुरु कर दिया है। कांग्रेस-एमाले भी चुनावी माहौल बनाने के लिए सहर से गाँव की ओर जाने की तैयारी में जुटे हैं। मधेशी नेताओं की तर्राई केन्द्रित गतिविधियों में तेजी आ रही है। लम्बी होती संक्रमणकालीन चुनौतियों को सम्बोधन करने का प्रजातान्त्रिक-लोकतान्त्रिक जो कहें र्सवमान्य निकास यह निर्वाचन ही होना चाहिए।
याद रखें, निर्वाचन का बहिष्कार करनेवाले दलों को जनता किस दृष्टि से मूल्यांकन करने को विवश होगी – जो पार्टर्ीीुनाव का सामना न कर सके, वह कायर कहलाती है और उसके नेता महाकायर। अपना मूल्यांकन, जनता की आँखों से करने का यह सुवर्ण्र्ाावसर पार्टियाँ को नहीं छोडÞना चाहिए। ‘पालिटिकल डेडलक’ भंग करने के लिए यह निर्वाचन वर्तमान पर्रि्रेक्ष में निर्विकल्प उपाय के रुप में सामने आया है। इसलिए नेकपा-माओवादी या अन्य कोई भी दल, खुद को जनता के प्रति उत्तरदायी समझते हैं तो बहिष्कार के बदले चुनावी प्रतिस्पर्धा में उतर कर लोकतन्त्र को संस्थागत करने की जिम्मेवारी पूरी करें तो देश के लिए हितकर होगा और स्वयं नेकपा-माओवादी के लिए भी लाभदायक होगा। र्
नई सरकार के बनते ही चार बडेÞ राजनीतिक दल बार बार राजनीतिक नियुक्तियों के लिए दबाव देते आ रहे हैं। रेग्मी ने अध्यक्ष पद का शपथ लेते ही गृह मन्त्रालय में माधव घिमिरे और कानून तथा श्रम मन्त्रालय में हरि न्यौपाने को नियुक्त कर लिया। लेकिन उसके बाद आवश्यक अन्य विभागों में मन्त्रियों की नियुक्ति राजनीतिक सिफारिस के आधार पर हर्ुइ। यह कितनी लज्जास्पद बात है। अपने-अपने निकट वाले पर्ूव सचिवों को चारो दलों ने २-२ के हिसाब से मन्त्री पद का बंटवारा करते हुए नियुक्त करवाया।
इस तरह नियुक्त हुए मन्त्री अपने हर भाषण में चुनाव कराना अपना र्सवप्रथम उद्देश्य बतलाते तो हैं, मगर राजनीतिक दलों के आशर्ीवाद से जो नियुक्त हुए हैं, उनसे निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद रखना कितनी बडÞी मर्ूखता होगी -! ऐसी चुनौतियां नए प्रधानमन्त्री के सामने आती रहेंगी।
जनमत में जाने से डरनेवाले नेकपा-माओवादी तथा अन्य कुछ राजनीतिक दल, जो जनता का दिल जितने में नाकामयाव हुए हैं, जिनके पास मानवीय अभिरुचिवाला कोई नारा नहीं है- ऐसों को कोई किस कारण से मत देगा – यह भी गम्भीरतापर्ूवक सोचने का विषय है।

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