सरकार के लिए मधुमास का समय नहीं हैः शोभाकर पराजुली

नेपाली कांग्रेस के भीतर बौद्धिक और तार्किक नेता के रूप में परिचित हैं– शोभाकर पराजुली । राजनीतिक विश्लेषक एवं लेखक के रूप में भी परिचित पराजुली नेपाली कांग्रेस के पूर्वसभासद् भी हैं । उन्हीं पराजुली के साथ वर्तमान राजनीतिक गतिविधि के प्रति केन्द्रित रहकर हिमालिनी प्रतिनिधि लिलानाथ गौतम ने बातचीत की हैं । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–
० नेपाली कांग्रेस और माओवादी केन्द्र के बीच जो सत्ता–गठबन्धन हुआ है, उसको अस्वाभाविक कहनेवाले भी हैं, क्या यह गठबन्धन अस्वभाविक है ?
– जब केपी ओली नेतृत्व में सरकार बनी, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय रूप में राजनीतिक वातावरण बिगड़ गया, कूटनीतिक रूप में सरकार असफल रही । यहाँ तक की सत्ता साझेदार माओवादी भी केन्द्र तक उसको साथ नहीं दे सका । उसके बाद ही नेपाली कांग्रेस और एमाओवादी

Shovakar Parajuli

शोभाकर पराजुली

केन्द्र के बीच नया समीकरण निर्माण हुआ है । जिसके चलते कुछ लोग बहस करते हैं– यह तो अस्वाभाविक है । ऐसी प्रतिक्रिया स्वभाविक भी है ।
० कहते हैं कि एजेण्डा बिना ही सरकार परिवर्तन हुआ है, क्या ऐसा ही है ?
– एजेण्डा विहीन होकर सरकार परिवर्तन नहीं हुआ है । ओली सरकार प्रायः सभी समस्या के प्रति उदासीन थी । बात बड़ी–बड़ी होती थी, लेकिन काम कुछ भी नहीं । इसीलिए ओली सरकार का औचित्य समाप्त हो चुका था । समसामयिक और अत्यावश्यक काम भी उनके द्वारा नहीं हो पा रहा था । ओली सरकार की गैरजिम्मेदारी के कारण ही राजनीति में नया ध्रुवीकरण निर्माण हो गया और वर्तमान समीकरण बन गया । दूसरी बात, प्रजातान्त्रिक अभ्यास और संसदीय व्यवस्था में नया समीकरण निर्माण होना, अस्वाभाविक भी नहीं है ।
० प्रचण्ड नेतृत्व की वर्तमान सरकार के द्वारा आगामी चैत्र महीने में स्थानीय निकायों का निर्वाचन होने की बात है, क्या यह निर्वाचन सम्भव है ?
– निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट कहा है – आवश्यक ऐन÷नियम प्राप्त होने के १२० दिन बाद निर्वाचन किया जा सकता है । हाल जो संवैधानिक प्रावधान है, उसके अनुसार भी करीब १८ महीने के भीतर स्थानीय, प्रान्तीय और केन्द्रीय निर्वाचन सम्पन्न करवाना है । इसीलिए चैत्र में स्थानीय निर्वाचन करना हैं तो निर्वाचन के लिए आवश्यक सम्पूर्ण वातावरण निर्माण करना होगा । सबसे पहले तो राजनीतिक दलों की बीच समझदारी होनी चाहिए । उसके लिए मधेश केन्द्रित राजनीतिक दलों की मांग सम्बोधन होना जरुरी है । संविधान संशोधन किए बगैर राजनीतिक समझदारी असम्भव है । काम बहुत है, लेकिन समय कम । इसीलिए चैत्र में निर्वाचन करना है तो राजनीतिक इच्छा शक्ति दृढ होनी चाहिए ।
० इसका मतलब चैत्र में निर्वाचन सम्भव नहीं है ?
– राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो असम्भव भी नहीं है । राजनीतिक दलों की सुस्ती और उदासीनता देखी जाए तो जनता की तरफ से आशंका की जा सकती है । निर्वाचन कराने के लिए सबसे पहले तो विवाद रहित ढंग से संविधान संशोधन होना चाहिए । उसके बाद निर्वाचन सम्बन्धी आवश्यक ऐन÷नियम निर्माण और संशोधन करना चाहिए । स्थानीय निकायों की पुनर्सरचना करके उसी के अनुसार नया निर्वाचन करने की बात हो रही है । स्थानीय निकाय पुनर्संरचना के लिए जो आयोग बना है, उसको भी समय से पहले ही प्रतिवेदन तैयार करना होगा । यह तब सम्भव होगा, जब राजनीतिक दलों के बीच समझदारी बनेगी ।
० निर्वाचन नहीं हो पाएगा तो प्रचण्ड नेतृत्व की वर्तमान सरकार कायम रहेगी या नहीं ?
– निर्वाचन हो या नहीं, कोई न कोई सरकार तो रहेगी ही, नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है । शान्तिपूर्ण रूप में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से सरकार परिवर्तन होना अस्वाभाविक भी नहीं है । लेकिन जिस एजेण्डा और प्रतिवद्धता के साथ वर्तमान सरकार बनी है, वह पूरी होनी चाहिए, मैं यही मान्यता रखता हूँ । हम सभी की इच्छा भी यही है, लेकिन हमारी राजनीतिक संस्कार, नेतृत्व तह में व्याप्त अदूरदर्शिता और निष्क्रियता, आदि के कारण अपेक्षा और मान्यता मुश्किल में पड़ सकती है ।
० वर्तमान सरकार के लिए प्रमुख एजेण्डा क्या हो सकता है ?
– प्रमुख एजेण्डा तो मधेश केन्द्रीत राजनीतिक दलों की मांग सम्बोधन करने के लिए संविधान संशोधन का वातावरण निर्माण करना ही है । उसके बाद ही अन्य काम कारवाही आगे बढ़ सकती है । दूसरी बात, १८ महीने के भीतर स्थानीय, प्रान्तीय और केन्द्रीय निर्वाचन करना है, उसके लिए आवश्यक ऐन÷कानुन निर्माण कर निर्वाचन आयोग को देना होगा । इसके अलावा भूकम्प और अन्य प्राकृतिक प्रकोप से पीड़ित जनता का उद्धार और उन लोगों के लिए समय में ही राहत देना है । इसी तरह मानवीयता से जुड़े हुए मंहगी और कालाबाजारी नियन्त्रण तथा शान्ति और सुशासन की प्रत्याभूति देना भी प्रमुख प्राथमिकता ही है । इसीलिए प्रचण्ड नेतृत्व का वर्तमान सरकार के लिए कोई भी ‘मधुमास’ का समय नहीं है । विगत में सरकार गठन का तीन महिना, ‘मधुमास’ का समय माना जाता था । अब ऐसा समय नहीं है । सरकार गठन होते ही प्रभावकारी ढंग से काम नहीं हो पाएगा तो सरकार असफल रहेगी ।
० कहा जाता है कि सत्ता में रहे केपी ओली से ज्यादा खतरनाक सत्ता बाहर के केपी ओली हो जाएंगें, आप की नजर में क्या खयाल है ?
– हम लोग देखते हैं कि जिसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि कम्युनिजम् से जुड़ी होती है, वह हरवक्त ध्वंसात्मक क्रियाकलाप ही करते हैं । सत्ता में रहते वक्त जबरदस्ती करते हैं और सत्ता से बाहर होने के बाद अपने को क्रान्तिकारी दिखाने के लिए अराजक हरकत करते हैं । क्यों ? क्योेंकि यह उनकी राजनीतिक ‘स्कुलिङ’ से जुड़ा होता है । उदाहरण के लिए हम केपी ओली सरकार को ही ले सकते हैं, जिसने इस्तीफा देने के बाद भी कई महत्वपूर्ण निर्णय किया है । विगत में गिरिजाप्रसाद कोइराला की नेतृत्ववाली सरकार को ‘३० दिन के अन्दर गिरा देंगे’ कहकर एमाले ही सड़क में रेलिङ तोड़ने में उतार हो आए थे । इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो कल एमाले की तरफ से कोई जबरदस्ती हरकत नहीं होगी, यह नहीं कहा जा सकता । इसीलिए मैं आप के मार्फत ही एमाले को एक सुझाव देना चाहता हूँ– जो कुछ करना है, विधिसम्मत तरीके से संसद् के भीतर ही किया जाए । हम लोग प्रजातान्त्रिक गणतन्त्र में हैं । जहाँ संसद् से हल न होनेवाला कोई भी विषय नहीं है । इस तथ्य को नहीं भूला जाए । इसीलिए संसद् से सम्बोधन होनेवाले विषयों को लेकर सड़काें में टायर जलाने की आवश्यकता नहीं है । हर मांग के लिए तोड़फोड़ में उतर आने की जो संस्कृति हैं, उसका अन्त होना चाहिए । यह बात सिर्फ एमाले के लिए ही नहीं, हर राजनीतिक दलों के लिए लागू होती है ।
० सरकार में सहभागिता सम्बन्धी विषयों को लेकर नेपाली कांग्रेस के भीतर भी विवाद दिखाई दिया । ४० और ६० की बात निकल गयी, हरदम ऐसा क्यों होता है ?
– एक जीवन्त राजनीतिक पार्टी के अन्दर इस तरह की बात होनी स्वाभाविक है । पार्टी में रहे ईमानदार, निष्ठावान, क्षमतावान और नैतिकवान नेता÷कार्यकर्ता इस विषय को इंकार करते हैं और वे चाहते हैं कि ऐसी हरकत न हो । लेकिन इस तरह सोचनेवाले व्यक्ति पार्टी में अल्पमत में हैं । कतिपय राजनीतिक दल और नेता की मानसिकता ही है– राजनीति करने का मतलब सत्ता प्राप्त करना है और मन्त्री बनना है । ऐसी मानसिकता वाले व्यक्ति मन्त्री बनने के लिए कुछ भी हरकत करते हैं । हमारे अधिकांश राजनीतिक दल और नेताओं में यही चरित्र व्याप्त है ।
० मधेशी मोर्चा की जो मांग है, वर्तमान सरकार उस को सही सम्बोधन कर पाएगा ?
– करना चाहिए । आज की आवश्यकता भी यही है । विगत में जो सरकार थी, वह इस मुद्दा में बेखबर रही, जिसके चलते लम्बे समय तक राजनीतिक अस्थिरता कायम रही । इसलिए अब भी इसका सम्बोधन नहीं करेंगे तो समस्या वैसा ही रहेगी, जैसी पहले थी । समस्या समाधान के लिए ही मोर्चा के साथ पिछली बार तीन सूत्रीय सहमति हुई है । तीन सूत्रीय सहमति के साथ–साथ यह सन्देश भी प्रभावित हो रहा है कि संविधान सर्वस्वीकार्य हो गई है । इस तरह सर्वस्वीकार्य संविधान को अब कार्यान्वयन में ले जाना है ।
० ऐसा है तो अब मधेशी केन्द्रित दलों की चाहना अनुसार संघीय राज्य का सीमांकान हो जाएगा ?
– स्थानीय निकाय पुनर्संरचना आयोग अपना काम कर रहा है । जल्द ही वह अपना प्रतिवेदन देनेवाला है । उसी में आधारित रह कर संघीय राज्य का सीमांकन में कुछ अदल–बदल कर सकते हैं । लेकिन जिस तरह सीमांकन हो जाएगा, उस के प्रति दूसरे व्यक्ति और समुदाय असन्तुष्ट नहीं होना चाहिए । एक व्यक्ति की मांग सम्बोधन करने के बाद दूसरा व्यक्ति विद्रोह करेगा तो वह स्वीकार्य नहीं हो सकता ।
० मधेश में सिर्फ दो ही प्रदेश होना चाहिए, ऐसी मांग मधेशी मोर्चा का है, यह पूरा हो सकता है कि नहीं ?
– पहले ही कह चुका हूँ, एक व्यक्ति का मांग सम्बोधन करते वक्त दूसरा विद्रोह न करें । अपने को मधेशवादी कहनेवाले नेता लोगों को इसमें सोचना ही होगा । अगर उन लोगों की मांग के अनुसार सीमांकन करेंगे और परिस्थिति असहज हो जाती है तो उसका जिम्मेदार मधेश केन्द्रित राजनीतिक दल भी होते हैं । इसमें अधिक बहस कर सकते हैं । किसी भी एक पक्ष की मांग को शतप्रतिशत पूरा नहीं किया जा सकेगा । इसीलिए इसमें सभी को लचकता अपनाना आवश्यक है । सभी समस्या का शान्तिपूर्ण समाधान संसद् ही है । जितना बहस और वादविवाद करना है, वहीं हो सकता है । मधेशवादी दलों की हर मांग के बारें में संसद् में बहस हो सकती है और उपयुक्त मांग पूरी की जाएगी ।
० शासन व्यवस्था के कारण मधेशी सामुदाय विभेद में हैं और आर्थिक रूप में कमजोर भी है, इस तरह का आरोप भी है । यह कितना हद तक सत्य है ?
– इस को जातीय और क्षेत्रीय रूप में नहीं, मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए । जब आधुनिक नेपाल का जग निर्माण हो रहा था, उसी समय (पृथ्वीनारायण शाह) से ही मधेशी जनता को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह कुछ हद तक नहीं हो पाया । मैं मानवतावाद में विश्वास करता हूँ । इसीलिए मैं ऐसा सोचता हूँ कि कोई भी जात, नश्ल वा क्षेत्रीय मुद्दा प्राथमिक मुद्दा नहीं है, मानवीय सम्वेदना और सामाजिक न्याय का मुद्दा प्रमुख है । लेकिन अभी जो मधेशवाद की बात हो रही है, कहीं वह नश्लीय चिन्तन तो नहीं है, ऐसी आशंका हो रही है । मधेश की समस्या को इस तरह अनावश्यक रूप देना ठीक नहीं है ।
० तब, आप की नजर में मधेश की मुख्य समस्या क्या है ?
– जनता के लिए मुख्य मुद्दा सामाजिक न्याय ही है । दूसरी बात, भाषिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक न्याय के साथ–साथ वे लोग अपनी पहचान भी तलाश रहे हैं । इसीलिए राजनीति में समावेशी और समानुपातिक प्रतिनिधित्व की बात हो रही है, जिस को हमारा संविधान सम्बोधन कर चुका है ।
० जब नेपाल में सरकार परिवर्तन होता है न जाने क्यों, भारत को उसे जोड़ कर देखा जाता है, ऐसा क्यों होता है ?
– यह तो ‘ओपन सेक्रेट’ है । नेपाल में क्या हो रहा है, इस में कोई भी पड़ोसी को किसी भी तरह का मतलव नहीं होना चाहिए, यह बेहतर होगा । लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, यह महसूस होता है । दूसरी तरफ इसमें कौन ज्यादा जम्मेदार है ? इस प्रश्न के ऊपर भी विचार करना चाहिए । नेपाल के नेता लोग अपने देश के हित के खातिर अपने आप को ही क्यों मजबूत नहीं करतें ? क्यों पड़ोसियों का दरवाजा खटखटाते हैं ? इसकी तरफ भी देखना चाहिए । हम अपना निर्णय खुद करते हैं तो कोई भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
० ऐसा है तो नेपाल–भारत सम्बन्ध को लेकर क्यों बारम्बार विवाद उठता है ?
– नेपाल–भारत सम्बन्ध में दोनों देश, अपने हित को सर्वोपरि मान सकता है, यह स्वाभाविक भी है । नेपाल के हक–हित के लिए नेपाली राजनीतिक दल के नेता में जो महत्वकांक्षा होनी चाहिए और उसके अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध विस्तार करना चाहिए, यह खूबी नहीं दिखाई देती । इसका अर्थ है– हमारे यहाँ अभी जो नेता हैं, उनमें से किसी के पास भी राजनेताओं का गुण दिखाई नहीं देता ।
० इसका मतलब नेपाल के राजनीति में भारत का प्रभाव कुछ भी नहीं है ?
– हर व्यक्ति का मानवीय चरित्र एवं मनोविज्ञान होता है– अपने के प्रति हर लोग प्रभावित हो जाए, मेरा ही विचार सही माना जाए और सभी उसकी पालना करें । लेकिन उक्त व्यक्ति के साथ कोई प्रभावित होता है या नहीं, यह बात तो दूसरे व्यक्ति में निर्भर रहता है । यही बात देश–देश के बीच भी लागू होती है । कोई भी एक राष्ट्र अन्य पड़ासी मुल्कों को अपने प्रभाव में रखना चाहता है तो उसकी तरफ से यह ठीक भी हो सकता है । लेकिन उसके प्रति प्रभावित होना है या नहीं, यह तो खुद पर निर्भर होता है ।

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