सरकार के 100 दिन

khilraj regmi
राजनीतिक दलों की नालायकी, एक दूसरे पर अविश्वास की भावना, जनता के बीच विश्वास का संकट और चुनाव कराने का अन्तर्रर्ाा्रीय दबाब की ऊपज है- प्रधान न्यायाधीश खिलराज रेग्मी के नेतृत्व की सरकार। संविधान सभा चुनाव कराने के एक मात्र प्रयोजन से चार दलों की आपसी मजबूरी -जिसे समझदारी का नाम दिया गया) से बनी यह सरकार पहले तीन महीने तक चुनाव की घोषणा के अलावा बांकी सारा काम करती रही। बिल्कुल उसी तरह जैसे कोई आम सरकारों के द्वारा किया जाता है। और उन तीन महीनों में सरकार का नेतृत्व कर रहे खिलराज रेग्मी हों या उनके सभी मंत्री, बस एक ही रट लगाते रहे समय पर चुनाव कराना सरकार की प्राथमिकता है और सरकार हर हाल में समय पर चुनाव कराकर ही दम लेगी। वैसे तो जिस समय इस सरकार का जन्म हुआ, उसी समय जनता को भ्रम में डालने के लिए राजनीतिक दलों के इशारे पर श्रावण में चुनाव कराने के लिए जोर शोर से ढिंढोरा पीटा गया। यह जानते हुए भी कि यह असंभव है। लेकिन न्यायालय में बैठकर सत्य और न्याय का काम करने वाले न्यायमर्ूर्ति भी राजनीति के जंजाल में इस कदर मोहित हो गए थे कि उन्हें भी राजनीति की तिकडÞमबाजी भा गई। और दलों के साथ सुर में सुर मिलाते हुए जेठ में ही चुनाव के लिए शपथ खाई। लेकिन जनता इतनी मर्ूख तो थी नहीं। जब उसे इस देश की न्याय व्यवस्था से ही भरोसा उठने लगा हो तो भला उसके न्यायमर्ूर्ति के राजनीतिक आवरण पर कैसे भरोसा कर लेती। यही कारण है कि श्रावण में चुनाव टाले जाने पर जनता की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आई। इसमें बडेÞ राजनीतिक दलों की भूमिका काफी अहम रही जिन्होंने शुरू से ही ऐसा माहौल बना दिया था कि श्रावण में तो चुनाव असंभव है।
इसी बीच चुनाव को लेकर दलों के बीच जिस तरह से उठापटक जारी थी, उसका फायदा उठाते हुए सरकार ने अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया। प्रशासनिक फेरबदल से लेकर आने वाले बजट में लोकलुभावन भाषण का दौर शुरू हुआ। कामचलाऊ सरकार के द्वारा वह सभी फैसले किए गए जिसे करना शायद अन्तरिम चुनावी सरकार के लिए अवांछनीय माना जाता रहा है। कई बार सरकार के फैसले और सरकार के बयान उन्ही राजनीतिक दलों के खिलाफ हुआ करती है जिन्होंने इस सरकार का गठन किया था। कहने के लिए राजनीतिक दलों की एक उच्च स्तरीय समिति भी है, जिसका काम सरकार के कामकाजों पर नियंत्रण भी है। लेकिन लगता है कि कुछ मामलों को छोडÞकर सरकार दलों के नियंत्रण से बाहर हो गई है। सरकार के सौ दिन पूरे होने से कुछ दिन पहले ही अपनी लाज बचाने और सौ दिन में अपनी उपलब्धि गिनाने के लिए सरकार की तरफ से चुनाव की घोषणा कर दी गई। इसी चुनाव की घोषणा को सरकार ने अपने १०० दिन पूरे होने के उपलक्ष्य में सबसे बडÞी उपलब्धि के रूप में बखान किया था। लेकिन सरकार भी यह अच्छी तरह से समझती है कि अभी चुनाव के तारीख की सिर्फघोषणा की गई है। चुनाव की घोषणा करना और चुनाव कराना दो अलग अलग बातें है। नेपाल में चुनाव की घोषणा कई बार होती है लेकिन चुनाव कई बार की घोषणाओं के बाद ही हो पाता है। वैसे भी सरकार के लिए वर्तमान हालात में चुनाव कराना काफी मुश्किल दिख रहा है।
इसके अलावा सरकार ने निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण आयोग के गठन को भी अपनी उपलब्धि बताई है। वैसे इस आयोग का गठन सरकार ने अपनी मर्जी या खुशी या संवैधानिक व्यवस्था में होने के कारण नहीं किया है। बल्कि सरकार को ना चाहते हुए भी इसकी घोषणा करनी पडÞी। क्योंकि ऐसा आदेश र्सवाेच्च अदालत का है। वह भी अदालत के फैसले के महिनों बीत जाने के बाद। सौ दिन पूरे होने पर सरकार ने दावा किया कि देश की शान्ति व्यवस्था काफी अच्छी है और सभी सरकारी महकमे ठीक से काम कर रहे हैं। लेकिन कई ऐसे उदाहरण हैं जिससे लगता है कि सबकुछ अब सरकार के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। नौकरशाहों की सरकार को यह अच्छी तरह से मालूम है कि नौकरशाह इस देश की तरक्की के लिए कितने बाधक बन जाते हैं। इस समय सरकार में मंत्री सभी पर्ूव नौकरशाह ही हैं, जिन्हें अब उनके मातहत के नौकरशाह नियम और कानून के शब्दों व वाक्यों में फंसाते रहते हैं। नेपाली सेना तो पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण से बाहर जाती हर्ुइ दिखाई देती है। सेना अपनी मनमानी करने लगी है। पुलिस प्रशासन अपनी मर्जी चला रहे हैं।
कहने के लिए तो वर्तमान सरकार किसी दलीय सरकार की ही तरह नहीं है लेकिन इसके क्रियाकलाप और आचरण को देखने पर यही लगता है कि यह किसी भी दलीय सरकार से कम भी नहीं है। इसके सौ दिनों की उपलब्धि चाहे जितनी भी हो, लेकिन असल में जब तक चुनाव संपन्न नहीं हो जाता तब तक इसे सफल नहीं माना जा सकता है। चुनाव की सफलता के लिए देश में चुनावी माहौल का बनाना और आम जनता में यह विश्वास दिलाना कि वाकई में सरकार ने जो तारीख तय की है उसी तारीख में चुनाव किसी भी हालत में होगा। लेकिन विवाद इतने अधिक है और सभी की इच्छा और आकांक्षा तथा दलों के बीच का वातावरण ऐसा है कि चुनाव होने के बारे में शंका कायम ही है।

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