सरकार चाहे तो औद्योगिक विकास सम्भव
कृष्णप्रसाद घिमिरे, युवाव्यवसायी

-आज के युवा उद्योगी कृष्णप्रसाद घिमिरे का जन्म वि.सं. २०१७ साल में पिता हर्रि्रसाद घिमिरे और माता टीकादेवी के कनिष्ठ पुत्र के रुप में सीतापुर, जनकपुर में हुआ था। औरही महोत्तरी से ०३५-३६ साल में एसएलसी उत्तर्ीण्ा होने के बाद जनकपुर के आर.आर क्याम्पस में उच्च शिक्षा प्राप्त करते समय जनमोर्चा पार्टर्ीीी ओर से राजनीति में सक्रिय होने पर इन्हें ६ महिने जेल सजाय भी भुगतनी पडÞी। बाद में मीनभवन काठमांडू से वाणिज्यशास्त्र में स्नातक।
एसएलसी के बाद से ही उद्योग व्यापार के सपने सजोनेवाले घिमिरे ने नौकरी की ओर नहीं अपितु व्यापार और उद्योग की तरफ कदम बढÞाया। रियल स्टेट में दो-चार हाथ आजमा कर इन्होंने जनकपुर में मैक प्लाष्टिक फैक्टरी की स्थापना की। तर्राई आन्दोलन और साझेदारी की समस्या से पीडिÞत हो कर युवा उद्योगी कृष्णप्रसाद घिमिरे ने वि.संं. २०४६ साल में “पेट प्रोडक्ट और क्लोजर म्यानुफ्याक्चर” काठमांडू के सतुंगल गाविस वडा नं. ६ में १० करोडÞ की लागत पूँजी से स्वयं का उद्योग शुरु किया। प्रस्तुत है, उनसे हर्ुइ बातचीतः-
हिमालिनी- आप उद्योग-व्यापार की ओर कैसे आकषिर्त हुए, जब कि सामान्यतया युवा वर्ग नौकरी के लिए हाथ-पाँव मारते है –
कृष्ण प्र.- मैंने शुरु से ही नौकरी के बदले व्यापार और उद्योग को प्राथमिकता दी। इसका खास कारण तो मैं बता नहीं सकता। मुझे लगता है, इसका मनोवैज्ञानिक कारण है। मेरा बचपन और किशोरावस्था बहुत ही गरीबी में बीता। पिता का साया बचपन में ही मेरे सर से उठ गया। मैं अमीर पिता का गरीब पुत्र था। सम्भवतः इसी कारण से व्यापार और उद्योग की ओर मेरा झुकाव हुआ हो।
हिमालिनी- अभी आप तिरुमाला प्लाष्टिक इण्डष्ट्रिज प्रा.लि. के चेयर मैन हैं और पेट प्रोडक्ट एण्ड क्लोजर म्यानुफैक्चर एसोसिएसन नेपाल के महासचिव हैं। इससे पहले क्या करते थे –
कृष्ण प्र.- इससे पहले मैं लिकर -शराब) का नेशनल डिस्ट्रीव्युटर था।
हिमालिनी- जन जन के तन मन को झुमाने वाला उस पेशे में पैंसा तो अच्छा बनता रहा होगा, फिर आपने छोड क्यो –
कृष्ण प्र.- पैसा तो बहुत अच्छा था, इस में कोई शक नहीं। मगर मेरे दिल ने और नैतिकता ने इसे चलाते रहना मुनासिब नहीं समझा। इसीलिए मैंने लोगों को विगाडÞने वाला व्यापार छोडÞ दिया। और वि.सं. २०६४ में १० करोड की पूँजी लगाकर पेट प्रोडक्ट एण्ड क्लोजर म्यानुफैक्चर की स्थापना की।
हिमालिनीः आप युवा और ऊर्जावान उद्योगपति हैं। उद्योग के विकास में कौन-कौन सी कठिनाइयाँ आप महसूस करते हैं –
कृष्णप्र.- वैसे इस क्षेत्र में समस्या तो अनेक हैं। फिर भी कुछ मुख्य समस्याओं पर मैं आता हूँ। पहली बडÞी समस्या है- श्रमिकों की। देश में अनेक मजदूर संगठन हैं। मजदूर उनके बहकावे में सहज ही आ जाते हैं। उद्योगपपति का पक्षधर कोई नहीं होता। सरकार भी कुछ नहीं कर पाती।
दूसरी बडी समस्या है, लोडसेडिÞङ। और सबसे बडÞी समस्या है असुरक्षा। देश में कब क्या हो जाय, कुछ नहीं कहा जा सकता। बारम्बार होनेवाली बन्दी से उद्योग की रीढÞ टूट चुकी है। हमारे उत्पादन की माँग तो बहुत है, लेकिन हम माँग के अनुसार सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं।
हिमालिनी- आप का उत्पादन देश में कहाँ-कहाँ जाता है –
कृष्णप्र.- पेट प्रोडक्ट में हम विदेशों से कच्चा पदार्थ मँगाते हैं और प्लाष्टिक के विविध सामान खास कर के जार, बोटल इत्यादि बना कर विराटनगर से धनगढी तक सप्लाई करते हैं। निकट भविष्य में नए-नए उत्पादन करनेवाले हैं।
हिमालिनी- और कौन-कौन सी समस्याएँ आप महसूस करते है –
कृष्णप्र.- अन्तःशुल्क विभाग बिना सोचे समझे कर निर्धारण करता है। जिस वस्तु में कर -टैक्स) नहीं लगना चाहिए, उस में भी कर ठोक देता है। अन्धेर नगरी चौपट राजा इसी को कहते हैं। सबसे बडÞी बात है, सुरक्षा की प्रत्याभूति। खतरे की स्थिति में उद्योगपति पँूजी क्यों लगाएगा – लोडसेडिङ तो बिल्कुल हटाना होगा। एक दूसरी बडÞी बात बैंक का व्याज दर है। महंगा व्याजदर होने पर हम बैंक से कैसे कर्ज ले सकते हैं –
हिमालिनी- क्या इन्ही कारणों से आप उत्पादन नहीं बढÞा पा रहे है –
कृष्णप्र.- बिल्कुल सही कहा आपने। देश भर में ऐसे कारखाने ३२ हैं। मगर हमारे उत्पादन में क्वालिटी होने से व्यापार के बिग हाउस हमारे प्रोडक्ट को पसन्द करते हैं। माँग बहुत है लेकिन देश की राजनैतिक अस्थिरता, असुरक्षा, लोडसेडिङ, बन्द, हडताल, टैक्स सम्बन्धी सरकार की गलत नीतियाँ -सभी औद्योगिक विकास में बाधक बने हुए हैं। सरकार चाहे तो औद्योगिक विकास सम्भव है।
हिमालिनी- आप नेपाल चैम्बर अफ कमर्स के सदस्य हैं, पेट प्रोडक्ट के जेनरल सेक्रेटरी हैं और तिरुमाला प्लास्टिक इण्डस्टि्रज के चेयर मैन हैं। औद्योगिक भ्रमण किस-किस देश का कर चुके हैं –
कृष्णप्र.- अमेरिका, अस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्वीटजरलैण्ड, सिंगापुर, थाइलैण्ड, चाइना आदि देशों का भ्रमण मैंने किया है। और बहुत कुछ देखने सुनने को मिला। हमारी सरकार अपने को कुछ सुधार ले तो देश में उद्योग धन्धे फल-फूल सकते हैं।
हिमालिनी- अब एक अन्तिम प्रश्न। करोडÞो की लागत में स्थापित इस काराखाना की विशेषता क्या है –
कृष्णप्र.- इस में कार्यरत कर्मचारियों में से ७५ प्रतिशत कर्मचारी स्थानीय महिला है। इन्हें जो बेतन मिलता है, उसका पूरा-पूरा प्रयोग इनकी घर गृहस्थी में होता है। मर्द कर्मचारी प्रायः बेतन को नशे में उडÞा देते हैं। वेतन घर तक पहुँच ही नहीं पाता।
दूसरी बात हमारा उत्पादन सीसा -काँच) के बदले में प्लास्टिक को बोतल दवा, शराब और अन्य घरेलू प्रयोजन में काम आनेवाले पानी के जार, ग्लास आदि बनाना है। अर्थात् काँच को विस्थापित करके हम बढिया स्तर का प्लास्टिक दे रहे हैं। इससे उत्पादन लागत कम होता है। दवा-दारु की बोतलें टूट-फूट होती थीं। अब वह समस्या नहीं है। ढुवानी खर्च, ढुवानी चार्ज भी कम पडÞता है।
-हिमालिनी के अतिथि सम्पादक मुकुन्द आचार्य द्वारा ली गई अन्तर्वाता का सार संक्षेप)

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