सरकार नहीं अधिकार चाहिए: शर्बदेब ओझा

madhesh andolan

मधेश

लम्बे संर्घष् के बाद २०६४ साल में संविधानसभा के हुए निर्वाचन से बनी संविधानसभा को २०६९ जेठ १४ गते तीन प्रमुख दल तथा संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा द्वारा योजनावद्ध रुप में भंग किया गया। इस कार्य में किस की कितनी भूमिका रही, यह आनेवाला समय ही बताएगा। इसी राजनीतिक नेतृत्व के कारण ही संविधानसभा अनिणिर्त तथा औचित्यहीन करवाने से लेकर अन्त में समाप्त कर दिया गया। विघटित संविधानसभा मधेश के आधारभूत समस्या के समाधान तो नहीं दे सकी, परन्तु उस समय तक मधेश के आधारभूत सवाल के लिए गठित संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा एवं बाद में बने बृहत मधेशी मोर्चा उन सवालों को छोडकर सत्ता प्राप्ति के लज्जाजनक एवं अनुत्तरदायी यन्त्र हो चुके थे। सभी मधेशी पक्ष सत्तालोलुप दिखाई पडÞते थे।
मधेश का आन्दोलन राज्य के स्थायी सत्ता के रुप में रहे हुए एकात्मवादी राज्य व्यवस्था में आमूल परिवर्तन चाहता है। नेपाल के सर्न्दर्भ में एक ही प्रकार के स्वार्थ को ही सम्मिश्रति रुप से नेपाली राज्य व्यवस्था को स्थायी सत्ता कहा है। यथार्थ में इसी समान स्वार्थ को नेपाल के स्थायी सत्ता की संज्ञा दी गई है। साथ ही इसके सञ्चालक चाहते है कि हम लोगों द्वारा खडÞा किया हुआ राज्यतन्त्र अनन्तकाल तक इसी तरह चलता रहना चाहिए। इसके ठीक विपरीत मधेशी जनता चाहती है- इन सभी में परिवर्तन होना जरुरी है। साथ ही संघीय गणतन्त्रात्मक लोकतन्त्र में राज्य का यथार्थपरक रुपान्तरण होना चाहिए। आज भी मधेशी जनता की ‘सरकार नहीं अधिकार चाहिए’ की भावना काम कर रही है।
राज्य पुनःसंरचना की अधिकांश पक्षधर शक्तियां कमजोर होती दीख रही हैं। सदियों से कायम एकात्मवादी स्थायी सत्ता को नई राज्य व्यवस्था में रुपान्तरित करने का कार्यभार लिए हुए राजनीतिक पक्षों को या तो मत्थर किया गया या सत्ता के दलाल के रुप में देखा गया। माओवादी, नेपाली कांग्रेस, एमाले इन सभी ने मधेशी एजेण्डा मधेश में केवल चुनावी प्रचार का लाउडस्पिकर के अलावा और कुछ भी नहीं है, ऐसा कहा। आज नेपाल में एक ही जातिका जातीय राज्य सम्भव नहीं है। जनसंख्या के इस बदलते स्वरुप में आज मधेश बहुसामुदायिक भूक्षेत्र में रुपान्तरित हो चुका है। अतः मधेश की परिभाषा निरपेक्ष जातीय वा एकल सामुदायिक रुप में नहीं, अपितु मधेशी, पर्वते, थारु, दलित और मुसलमान लगायत के सामूहिक निवास के क्षेत्र के रुप में करना होगा। यह समस्या मुलुक में विद्यमान एकात्मवादी राज्य व्यवस्था के द्वारा जन्माया गया है। तर्सथ राज्य के इस विद्यमान स्वरुप को बदलने और संघीय नेपाल के अन्दर समावेशी मधेश प्रदेश का निर्माण करना और मधेश के अन्दर सामुदायिक शोषण का अन्त्य करते हुए अन्ततः मधेश को एक समुन्नत प्रदेश में रुपान्तर करने का दायित्व भी हम सभी का है। इसके लिए अब पुनः मधेश से उठनेवाला भावी आन्दोलन को तर्राई-मधेश के मधेशी, पर्वते, थारु, दलित और मुसलमान से सहकार्य करना आवश्यक है।
संविधानसभा के अवसान के पश्चात् नई नई समस्याएं और चुनौतियां सामने आ रही हैं। मधेश की जनसंख्या आज ५०.२७ प्रतिशत हो गई है, और इस जनसंख्या को अभी की संरचना से संविधान सभा में तर्राई-मधेश के क्षेत्रीय प्रतिनिधि के सवाल से नये रुप में उठाना होगा। साथ ही निर्वाचन आयोग ने मधेशी समुदाय के इतने बडÞे विरोध के बावजूद भी नागरिकता प्रमाणपत्र के आधार पर ही मतदाता नामावली संकलन कार्य अभी तक पूरा किया जा रहा है, इससे नेपाल के परिवेश में एक अलग भयावह तस्वीर प्रकट हो रही है। मधेश के बीस जिलों में राष्ट्रिय जनगणना ने जो काम किया है, उसकी कूल जनसंख्या में १८ वर्षसे ऊपर की जनसंख्या जो आकार कायम है, वह स्वभावतः मतदाता होना चाहिए। लेकिन सरदर में २९ प्रतिशत लोगों का नाम मतदाता सूची में नहीं है। यह क्यों मतदाता नहीं हो सकते – हाल में ही संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी उच्चआयोग -यूएनएचसीआर) के एक रिपोर्ट में कहा गया है- ‘नेपाल में आठ लाख लोग राज्यविहीन अवस्था में है।’ मधेश नेपाल के विभिन्न भूखण्ड में सबसे बडी विविधता का क्षेत्र माना गया है। अतः पुनः होने जा रहे संविधानसभा निर्वाचन में समानुपातिक प्रतिनिधित्व को कैसे व्यवस्था किया जाए – इन सब ज्वलन्त बातों का समाधान किए बिना नयाँ संविधानसभा का निर्वाचन क्या किया जा सकेगा – इसी प्रकार आनेवाले दिनों में और नयी-नयी चुनौतियां भी आती रहेगी।
नयाँ संविधान के लिए पुनः एकबार आम सहमति तथा जनदवाव बनाना आवश्यक होगा। यह कार्यभार संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा तथा कथित वृहत मधेशी मोर्चा से विल्कुल भी सम्भव दिखाई नहीं दे रहा है। और इसकी अग्रसरता के लिए मधेश में कार्यरत क्रान्तिकारी शक्तियों को ही पहल करना होगा। तत्काल इस पहल के लिए सभी को सहकार्य करके भविष्य में एक सवल राजनीतिक पार्टर्ीीे गठन के तहत सहमति लेकर आगे बढने के लिए हम सभी नये शिरे से इस कार्य योजना को दृढता के साथ सशक्त शान्तिपर्ूण्ा आन्दोलन के द्वारा ही एक साथ पथ में बने रहने की आवश्यकता है। आज हम समस्त तर्राई-मधेश सहित के सम्पर्ूण्ा नेपाली जनता के समक्ष स्पष्ट करना चाहते है कि हम सब मुल्क में अखण्डता के पक्षधर हैं और सशस्त्र संर्घष्ा में हमरा कोई विश्वास भी नहीं है। हम सशक्त शान्तिपर्ूण्ा लोकतान्त्रिक आन्दोलन के ही रास्ते में चलनेवाले हैं। और इस तर्राई-मधेश आन्दोलन के लक्ष्य पथ का पवर्ते समूह के साथ हमरा कोई विरोध नहीं। अपितु मधेश तथा पहाड के सभी समुदायों को सम्मानपर्ूण्ा निवास तथा सामाजिक राजनीतिक सहअस्तित्व कायम रखना आवश्यक है। अतः मधेश से जन्म लेनेवाले अब के भावी आन्दोलन में तर्राई-मधेश के मधेशी, पर्वते, थारु, दलित और मुसलमान लगायत सभी के साथ सहकार्य होना आवश्यक है। और इसी में ही नेपाल के समुन्नति, विकास तथा तर्राई-मधेश का विकास निहित है।
विगत में मधेशी पार्टियों के मधेश व्रि्रोह के पीछे ‘सडÞक, सदन और सरकार में रहकर संर्घष्ा करना’ शर्त के रुप में था। मगर इससे कुछ उपलब्धि नहीं हर्ुइ। और विघटित संविधानसभा में रहे मधेश के सभी आधारभूत विचारणीय सवाल को तिरस्कृत कर दिया गया। जिससे संविधानसभा में मधेशी पक्ष की उपस्थिति निरुद्देश्य साबित हो गई और दो मधेश आन्दोलन के बाद भी राज्य द्वारा किया गया सम्झौता पूरा करने के लिए राज्य पक्ष द्वारा ही अस्वीकार कर दिया गया। अब पुनः गठन होनेवाली संविधानसभा के लिए राज्य की ओर से कोई भी प्रतिवद्धता अभी नहीं है। साथ ही भावी संविधान की आधारभूत मान्यता क्या होगी, उस में भी किसी प्रकार की वचनवद्धता नहीं दिखाई दे रही है।
शीघ्रता में खिलराज रेग्मी की सरकार गठन होते समय चार राजनीतिक पक्ष के बीच ११ सूत्रीय समझदारी हर्ुइ। इस समझदारी के उदारहण के रुप में ८ नम्वर बुँदा मे कहा गया है कि ‘संविधानसभा में राजनीतिक दलों के बीच हर्ुइ सहमति का स्वामित्व लिया जाएगा।’ और यह बात भी र्सवविदित है कि विघटित संविधानसभा में संघीयता, इसके स्वरुप, प्रदेश के गठन का आधार तथा चरित्र और प्रदेश की संख्या जैसे अह्म विषयों में कोई भी सहमति नहीं बन पाई थी। तर्सथ स्वाभाविक रुप में यह राजनीतिक सहमति से विघटित संविधान सभा की राज्य पुनर्संरचना समिति को और राज्य पुनसंरचना आयोग के १४ वा ११ प्रदेश का प्रस्ताव को भी स्वामित्व नहीं मिल पाया था। इस प्रकार के प्रतिगामी दस्तावेज में मधेशी मोर्चा ने हस्ताक्षर करके संघीयता तथा मधेश के साथ अन्तरघात करने का भरपूर प्रयास को साबित कर देखाया। अतः संविधानसभा का अब होने वाले निर्वाचन को परिणाममुखी बनाने के लिए र्सवप्रथम नयी जनगणना के आधार में निर्वाचन क्षेत्र का पुनर्निर्धारण होना अनिवार्य है। साथ ही निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचन समान जनसंख्या के आधार पर ही होना चाहिए। इसी के साथ ही संविधान सभा के आकार और समानुपातिक निर्वाचन प्रक्रिया के बारे में भी राष्ट्रिय सहमति होनी चाहिए। ऐसे कितने ही विषयों को पूरी तरह सत्ता पक्ष के द्वारा उपेक्षा करके जबरजस्ती अपना निर्ण्र्ाालादने वा अँधेरे में रखने का प्रयास किया गया है। यह जनता को मान्य नहीं होगा। अभी तक राज्य के इस स्वेच्छाचारिता में मधेशी मोर्चा सहयोगी और मतियार रहा है। जिसे सभी ने देखा है। आज मधेशी जनता की नजर में स्वयं मधेशी पार्टियाँ धोकेबाज दिखाई देती जा रही है। इसका प्रमुख कारण वास्तव में उपयोगितावाद, अवसरवाद और फगत सामाजिक सुधार के अपने आप में सपना देखनेवाले मधेश के विगत के नेतृत्व से अनाहक कमाए हुए अथाह सम्पत्ति के बल पर टिके खम्बो पर मधेश की लडाइँ से डÞरने वाले सडÞक, सदन और सरकार कही भी रह कर परिवर्तन का नेतृत्व करने में पर्ूण्ारूपेण अर्समर्थ है। अतः आज समय के इस सन्देश को आत्मसात करके एक नयाँ लोकतान्त्रिक क्रान्तिकारी अभियान का कोई विकल्प नहीं है।
विघटित संविधानसभा से आजतक मधेश में विकसित हुआ नवआत्मबोध नयी व्रि्रोही चेतना को संगठित करना अब हम सभी का दायित्व और कर्तव्य है। साथ ही यदि विद्यमान राज्यसत्ता से विभेद, उत्पीडन, अन्याय को अभी समाप्त नहीं कर सके तो परिवर्तन के लिए आन्दोलन करने में बहुत देर हो जाएगी। सरकारें यदि परिवर्तन के सम्वाहक नहीं हो सकती हंै तो फिर ऐसी सरकार में जनता के हिमायती को सहभागी होना औचित्यपर्ूण्ा नहीं माना जा सकता है। यह र्सवथा सत्य है। मधेशी जनता को अब ‘सरकार नहीं अधिकार चाहिए’ इसी सत्य के दिशा बोध में एक नयाँ संगठनात्मक स्वरुप ग्रहण करने की तैयार चल रही है।
अतः अब समय आ गया है, हम सबों को जनता की भावना अनुसार ही अपनी गतिविधियों को नयाँं संगठनात्मक ढंग से आगे बढÞावें। इसके लिए हमें इन सभी बातों को लेकर जनता के बीच में अवश्य जाना होगा। और जनता की मनोंभाव को समझने बाद अपनी कार्ययोजना का निर्धारण करना होगा।
-लेखक निवर्तमान संविधानसभा सदस्य हैं)

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