सरकार नाटक कररही है,मधेश आंदोलन जारी रहेगी : वृखेशचन्द लाल

काठमांडू, 2 जनवरी

FB_IMG_1451719816586हरेक क्षेत्र में बराबरी, राज्य के हरेक अंग में जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्त्व व हिस्सा तथा समानता एवं सभी के पहचान के आधार पर नेपाल की राष्ट्रीयता को परिभाषित कर नये नेपाल के निर्माण के लिए अभियान संचालन करने के उद्येश्य से जारी मधेश आन्दोलन के सन्दर्भ में सरकार, तीन दल तथा मधेश बिरोधी शक्तियाँ मधेश में, देश में तथा दुनियाँ भर में भ्रम फैलाने के काम को प्रायोजित कर रहे हैं । हमें इस पर सूक्ष्मता से ध्यान देते हुए सचेष्ट रहना होगा ।
सरकार और तीन दल वार्ता और संवाद की बात सिर्फ संचार में करती है । लोगों को भ्रमित करने के लिए और खास कर काठमाण्डू घाटी के लोगों का सब्र का बाँध न टूट जाए इस डर से उन्हें वास्तविक स्थिति से दूर अंधकार में रखने के लिए नाटक-नौटंकी कर रही है । अफवाह फैलाया जा रहा है कि अब जल्द ही नाका खुल जाएगी, आपूर्ति सहज हो जाएगी, भारत से सहमति बन गई है ,आदि-इत्यादि । वास्तविकता यह है कि ऐसा कुछ नहीं है । सरकार और विपक्ष ( तीन दल) वार्ता और संवाद में तनिक भी गम्भीर नहीं हैं । वार्ता और संवाद का गंभीर दौर अभी तक शुरु भी नहीं हुआ है ।
सरकार और तीन दल द्वारा प्रयोजित भ्रमपूर्ण अफवाह के ३ मकसद हैं –
१. आन्दोलकारी भ्रमित हो जाये और आन्दोलन टूट जाए । उनका मानना है कि एक बार आन्दोलन टूट गई और लादी गई संविधान कार्यान्वयन में आ गया तो फिर संशोधन\पुनर्लेखन\परिमार्जन कुछ भी सम्भव नहीं हो सकेगा । थोपी गई संविधान के प्रावधान कभी इसे संभव ही नहीं होने देगी । न राधाके नौ मन घी होइहैं न राधा नचिहैं ।
२. सरकार और तीन दल को चिन्ता सिर्फ काठमान्डू से है । तस्करी और यदाकदा हो रही आपूर्ति को सिर्फ काठमाण्डू में केन्द्रित की जा रही है । मगर लोग चाहते हैं कि जल्दी मधेश आन्दोलन सहमति से समाप्त हो । स्थायित्त्व और शान्ति का आधार खडा हो ।
भीआईपी और उच्चपदस्थ को खास मतलब नहीं लेकिन आम लोग मूल्यवध्दि एवं आभाव से परेशान हैं । विद्रोह कभी भी भडक सकता है । और ऐसा विद्रोह अराजक हो सकती है । सरकार के साथ-साथ सत्ताधारी सभी दलों का जड समाप्त कर सकती है । इसे थामने के लिए अफवाहें प्रायोजित की जा रहीं हैं । काठमाण्डू के लोग न भडकें इसके लिए अन्तिम प्रयास की जा रही है ।
३. मधेशीयों के खिलाप जो उग्रराष्ट्रवाद का जहर फैलाया गया था अब उसका असर कम होता जा रहा है । लोग वास्तविकता समझने लगे हैं । प्रायोजित अफवाह से इस नशे को कायम रखने का कोशिश की जा रही है ।
सरकार और तीन दल वार्ता और संवाद में गंभीर नहीं हैं मगर नाटक–नौटंकी में जरुर हैं । अनौपचारिक बातें करते हैं मगर सत्य के विरुध्द तर्क तो है नहीं तो झेंप कर दोष दूसरे पर लगाते हुए फिर मिलने का वादा करते हुए निकल जाते हैं । मेडिया में तीसमार खाँ जैसा कुछ बोल देते हैं । नाटक-नौटन्की का दूसरा कारण भी है – भारत और दुनियाँ को दिखाना कि वे कोशिश कर रहे हैं ।
ध्यान देने योग्य बातें-
१. गंभीर संवाद से सहमति निर्माण हो सकता है और सहमति का अर्थ है सत्ताधारीयों का पकड कमजोर होना जो वे नहीं चाहते ।
२. नाटक-नौटन्की इस लिए कर रहे हैं कि भारत और दुनियाँ को दिखाया जा सके कि वे कोशिश कर रहे हैं ।
३. सरकार और तीन दल सभी का मकसद एक ही है – मधेशी नेताओं तानकर फँसानेका काम करो, समाधान तरफ मत जाओ ।
४. भारत को मधेशीयों के बिरुध्द भडकाने का प्रयास जारी है । अभी तक २० से अधिक प्रतिनिधि-मण्डल दिल्ली का चक्कर लगाकर आये हैं । वे चाहते हैं, भारत उनको सहयोग और समर्थन करे और उनकी स्वार्थ को देख दें । सत्ता में बने रहने का गारन्टी दे । सिर्फ मधेशी को दबाने का छूट दे दें । बाँकी सब कुछ …… !

तीन दलों का वास्तविकता –
क. काँग्रेस चाहती है, महाधिवेशन तक यही सरकार चले मगर ओली की मुश्किलातें बढती ही चली जाए ताकि बाद में सरकार पर जबर्दस्त दावा ठोकी जा सके । काँग्रेस के नेता आन्तरिक लडाईं में हैं । सब सोचते हैं, महाधिवेशन तक रुको ताकि महाधिवेशन में जीत के बाद सत्ता हाथ लगे । कुछ लोग मधेश में डूबी खटिया के कारण परेशान हैं मगर अपने नेता से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहते । मन मसोस कर उनकी ही ढोल बजा रहे हैं ।
ख. एमाले अपने ही द्वारा सृजित उग्रराष्ट्रवाद के कारण परेशान है । समस्या का समाधान यथार्थ पर होते ही सत्ता भी चली जाएगी और अपने ही द्वारा जन्मे उग्रराष्ट्रवादीयों का आक्रोश का मार भी पडेगा । वे भारत से स्वरक्षा का वर चाहते हैं ।
ग. एमाओवादी अस्तित्त्व की लडाई लड रही है । राजनैतिक परिदृश्य पर महत्त्वपूर्ण दिखने के प्रयास में है । उसे मालूम है कि दिनानुदिन उसका पोल खुलता जा रहा है और भविष्य बहुत ही निराशापूर्ण है । अपनी एजेण्डा से विमुख हो चुकी एमाओवादी सत्ता से अलग भी नहीं हो सकती इसिलिए समस्या को और बढा कर चाहती है कि ओली और बदनाम हो जाये तो काँग्रेस के महाधिवेशन से पहले ही सरकार के विकल्प के रुप में उभरने का मौका मिल जाएगा ।

मधेशी दल इन सभी बातों को समझ रही है । वार्ता गंभीरता से हो तो ठीक नहीं तो वार्ता का तार जोडते हुए जाडे की समाप्ति की प्रतिक्षा में है । शक्ति संचय का अभियान भी चल रहा है, चलेगा । सरकार परिवर्तन से उसे कोई लेना-देना नहीं है । संविधान परिमार्जन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के लिए सरकार परिवर्तन न होना ही ठीक है ।
अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय सूक्ष्मता से देख रही है । भारत को मालूम है कि मधेश का समस्या का टिकाऊ समाधान नहीं हुआ तो मधेश अशान्त रहेगा । सीमा पर सुरक्षा समस्यायें बढेंगी ।

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