सरकार ही नहीं, प्रतिपक्ष भी असफल

लीलानाथ गौतम
ओली नेतृत्व के वर्तमान सरकार का दावा है कि आगामी मंसीर (दिसम्बर) में स्थानीय निकायों का निर्वाचन होगा । प्रधानमन्त्री सहित सत्ता पक्षीय नेता और मन्त्रियों का मानना है कि वे लोग निर्धारित समय में ही निर्वाचन कर पाएंगे । लेकिन प्रमुख प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस कहता है– ‘वर्तमान अवस्था निर्वाचन के लिए उपयुक्त नहीं है और उस समय में निर्वाचन नहीं हो पाएगा ।’ उसी तरह लम्बे समय से आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा एवं संघीय गठबन्धन के नेता लोग कहते हैं– ‘ओली नेतृत्व की वर्तमान सरकार को कोई भी निर्वाचन हम लोग करने नहीं देंगे ।’ ऐसी अवस्था को देखते हुए सहज ही कहा जा सकता है– सत्ताधारी लोग जो कुछ भी कहे, लेकिन निर्वाचन का माहौल नहीं बन पा रहा है । क्यों ? कारण क्या है ? प्रतिपक्ष में रहे सभी का मनना है कि इसके भागीदार सिर्फ प्रधानमन्त्री ओली ही है । और, सत्ता पक्ष कहते हैं– नहीं, इसकी जिम्मेदारी तो प्रतिपक्ष को लेनी होगी । सत्ता और प्रतिपक्ष बीच चल रहे इस सवाल–जवाब के प्रति आम–जनता में कोई भी बड़ा दिलचस्पी नहीं है ।
नेताओं के भाषणों के प्रति सर्वसाधारण में उत्सुकता तो नहीं है, लेकिन संवैधानिक जटिलता के कारण संविधान जारी होने के बाद, तीन साल के अन्दर ही तीन–निर्वाचन (स्थानीय, प्रान्तीय र केन्द्रीय) कराना ही है । लेकिन निर्धारित तीन साल में से एक साल तो कुछ करने से पहले ही गुजरने लगा है । सत्ता के नेतृत्व करनेवाले व्यक्ति तथा राजनीतिक पार्टी सम–सामयिक विषयों में सम्वेदनशील न होने के कारण ही राजनीतिक परिस्थिति जटिल बन रही है, इसका अनुमान सहज ही लगा सकते हैं । लेकिन इसमें प्रतिपक्ष में रहे राजनीतिक दलों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है । रास्ता से भटकनेवाले और असफल–सिद्ध सरकार को सही रास्ता पर लाना प्रतिपक्ष का भी दायित्व है । अगर ऐसा नहीं किया जा सकता तो सरकार को परिवर्तन करना होता है, संसदीय प्रजातन्त्र यही सीखता हैं । लेकिन हमारे प्रतिपक्षी दल इस में असफल ही दिख रहे हैं । केपी ओली नेतृत्व की सरकार, जनता की समस्या और देश की आवश्यकता प्रति सम्वेदनशील नहीं हैं, तो भी सत्ता उसी की है । तब तो यहाँ प्रतिपक्षी दल असफल नहीं हैं तो कौन असफल है ?
पिछली बार प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार के विरुद्ध संसद अवरुद्ध किया । उसकी मांग थी– भूकम्प पीड़ितों को एकमुष्ट २ लाख रुपया दे दिया जाए । सरकार विरुद्ध कुछ करने का बहाना ढूढ रहे कांग्रेस के लिए यह बहाना भी अब खत्म हो चुका है । संसद अवरोध का हफ्ता न होते हुए सरकार के साथ चार सूत्रीय सम्झौता करके कांग्रेस ने संसद–अवरोध हटाया । अर्थात् कांग्रेस द्वारा सिर्जित इस अवरोध को परास्त करने में भी ओली सफल ही रहे । इससे पहले सरकार परिवर्तन के लिए किया गया प्रयास को भी ओली ने सहज ही असफल बनाया था । यह सब देखने के बाद लगता है कि ओली सरकार सफल हो रहे हैं । सरकार, सत्तारुढ दल और प्रतिपक्ष बीच का सम्बन्ध उत्तर–चढ़ावपूर्ण ही क्यों न हो ।
वैशाख महीना के तीसरे हफ्ता माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ ने सरकार परिवर्तन के लिए जो प्रयास किया था, वह अन्तिम समय में आ कर असफल सिद्ध हो गया । इसके पीछे भी ओली का ही हाथ था । उस समय ओली ने बजट अधिवेशन के बाद प्रचण्ड को प्रधानमन्त्री बनाने का सपना दिखाया था । लेकिन अभी तक प्रचण्ड को सत्ता हस्तान्तरण के लिए ओली तैयार नहीं दिख रहे हैं, शायद हो भी नहीं सकते हैं ।
अषाढ के पहले हफ्ते में नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबहादुर देउवा ने पुनः प्रचण्ड को सत्ता–नेतृत्व के लिए प्रस्ताव किया, लेकिन प्रचण्ड ने उसको गम्भीर रूप में नहीं लिया । और अभी भी प्रचण्ड इस सम्बन्ध में बहस में ही हैं । इसको देख कर यह भी कह सकते हैं कि अभी प्रचण्ड ओली के साथ में ही रहना चाहते हैं, लेकिन इस में भी विश्वास करने का कोई आधार नहीं है । एक समय पार्टी से औपचारिक निर्णय कराते हुए सरकार परिवर्तन में लगने–वाले प्रचण्ड चुपचाप तो नहीं हैं, लेकिन फिर सरकार गिराने का निर्णय भी नहीं लिया है उन्होंने । उस समय उन्होंने नेपाली कांग्रेस को धोखा दिया था । अब किस को धोखा देंगे, कहा नहीं जा सकता । लेकिन आज प्रचण्ड के ऊपर न तो कांग्रेस विश्वस्त हैं न केपी ओली ।
विशेषतः द्वन्द्वकालीन मुद्दा को लेकर माओवादी नेताओं की विरुद्ध जो क्रियाकलाप हो रहा था, उसके कारण प्रचण्ड कभी इधर तो कभी उधर हो रहे हैं । प्रचण्ड विश्वस्त थे कि उक्त मुद्दा सत्य निरुपण तथा मेलमिलाप आयोग के माध्यम से खत्म हो जाएगा । लेकिन अपने उपेक्षा के विपरित अदालत एवं सम्बन्धित अन्य निकायों ने ऐसा फैसला किया, जिसके चलते प्रचण्ड लगायत माओवादी नेताओं को जेल–सजा भी हो सकती थी । यह सब जानने के वाद ही प्रचण्ड चैन से नहीं बैठ पाए हैं । एमाले और कांग्रेस दोनों की सहयोग बिना प्रचण्ड इस मुद्दा से बाहर नहीं निकल सकते हैं । दोनों को विश्वास में लेना उनकी बाध्यता है, लेकिन दोनों में प्रचण्ड के प्रति विश्वास नहीं है, यह उनकी विवशता है ।
प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली ने प्रचण्ड की समस्या समाधान करने के लिए वचनबद्ध हैं लेकिन उसके अनुसार सरकार की तरफ से कोई भी काम नहीं हो रहा है । इसके कारण आषाढ़ ८ गते का अस्ट्रेलिया–भ्रमण रोकने के लिए वह बाध्य हो गए थे । सत्यनिरुपण और मेलमिलाप आयोग से द्वन्द्वकालीन मुद्दा का निराकरण नहीं होने के कारण उनका विदेश भ्रमण खतरापूर्ण हो सकता था, बहुतों का मनना है कि प्रचण्ड ने भी यही महसूस किया है ।
यात्रा स्थगन होने से पहले माओवादी केन्द्र की पोलिटब्युरो बैठक ने निर्णय किया था कि अब राष्ट्रीय सहमति की सरकार निर्माण होनी चाहिए । उक्त निर्णय–सम्बन्ध में प्रचण्ड ने कांग्रेस सभापति देउवा और प्रधानमन्त्री ओली, दोनों को जानकारी दिया । लेकिन किसके नेतृत्व में राष्ट्रीय सहमति की सरकार ? इसमें प्रचण्ड स्पष्ट नहीं थे, और अभी भी नहीं हैं । लम्बे समय से जारी मधेशी तथा जनजाति–आन्दोलन को सम्बोधन करना, जल्द से जल्द, स्थानीय, प्रान्तीय और केन्द्रित निर्वाचन सम्पन्न करके संविधान कार्यान्वयन में ले जाना, मुल्क के लिए अपरिहार्य आवश्यकता है । इसके लिए ‘राष्ट्रीय सहमति की सरकार’ बनना चाहिए, यह नारा आदर्श और कर्णप्रिय भी हो सकता है । लेकिन किसके नेतृत्व में ऐसी सरकार बनायी जाए ? इस प्रश्न का ठोस जवाब अभी किसी के पास भी नहीं है । इसीलिए तो एमाओवादी नेता कृष्णबहादुर महरा को हवाला देते हुए बजार में एक और अफवाह फैल रही है, जहाँ कहा गया है– ‘कांग्रेस, एमाले और माओवादी केन्द्र तीनों के नेतृत्व में सहमतीय सरकार बनने की सम्भावना अन्त्यन्त न्यून है । अतः किसी भी दिन वर्तमान अख्तियार प्रमुख लोकमान सिंह कार्की प्रधानमन्त्री और मन्त्रिपरिषद् के पूर्वअध्यक्ष खिलराज रेग्मी राष्ट्रपति बन सकते हैं ।’
जो भी हो, एक बात तो साफ है कि सत्ता परिवर्तन का बहस और उँचे स्वरों में भाषणबाजी करनेवाले लोग एक बात नहीं समझ रहे हैं । वह क्या है कि सरकार परिवर्तन भाषणबाजी से नहीं, संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश कर बहुमत साबित करके होता है । इसके लिए प्रतिपक्षी नेपाली कांग्रेस तथा मधेशी मोर्चा में दम नहीं दिखाई देता । प्रतिपक्षी दलों की यही निरीहता देखकर भी हो सकता है एमाले नेता शंकर पोखरेल ने अपने फेशबुक पेज में लिखा है– ‘सरकार परिवर्तन का ढिढोरा पीट कर राज्य को कमजोर नहीं किया जाए । सरकार बदलने की जगह संसद है, रास्ता अविश्वास का प्रस्ताव । सरकार का विकल्प ढूढने वालो को भाषणबाजी नहीं विधि अपनानी चाहिए ।’
नेता पोखरेल ने ठीक ही तो कहा है । जितनी भी भाषणबाजी क्यों न हो, लेकिन जब तक विरोधी ओली के विरुद्ध संसद में बहुमत सिद्ध नहीं कर पाएंगे, तब तक दूसरी सरकार बननेवाली नहीं है । संसद में बहुमत हासिल करने की ताकत कांग्रेस में नहीं दिखाई देती नहीं मधेशी मोर्चा में । राष्ट्रीय सहमति के नाम में तत्काल के लिए नेपाली कांग्रेस और माओवादी केन्द्र के बीच कुछ सहमति बन सकती है । उस समय नेपाली कांग्रेस, माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष प्रचण्ड का नेतृत्व भी स्वीकार कर सकती है । यह उसकी बाध्यता भी है । लेकिन ‘राष्ट्रीय सहमति’ के नाम में एमाले को भी सहमति में लाना ‘तिल का पहाड़ चढ़ना’ है । बस चले तो कांग्रेस चाहती है– अपनी ही पार्टी के नेतृत्व में सभी दल सहमत हो सके, एमाले चाहती है– एमाले का ही नेतृत्व । उसके बाद यह दोनों के बीच खेल कर बाजी मारना चाहते हैं– माओवादी केन्द्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ । लगता है– जारी इस प्रकार के त्रिपक्षीय द्वन्द्व अभी हाल में ही खत्म होनेवाला नहीं है । यही परिस्थिति ओली सरकार को ही दीर्घजीवी बनाता है । जनता के पक्ष में सरकार काम नहीं कर रही है, नहीं सरकार परिवर्तन ही हो सकती, ऐसी अवस्था में पीडा तो जनता और राष्ट्र को ही भुगतना पड़ता है । ऐसी अवस्था सृजित होना, सिर्फ सरकार की ही असफलता नहीं है, प्रतिपक्षी दल भी असफल हैं । प्रतिपक्षी दलों का धर्म है कि सरकार को जनपक्षीय काम के लिए बाध्य किया जाए, नहीं तो सरकार परिवर्तन किया जाए । यह दोनों काम के लिए असफल शक्ति, कैसे सफल और सक्षम प्रतिपक्षी हो सकता है ?

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