सर्बोच्च अदालत के फैसले से उठे कई सवाल:-

राजकिशोर यादव

सर्वोच्च अदालत ने दौरा सुरूवाल को राष्ट्रीय पोशाक के रूप में मान्यता देने के फैसले के बाद परिवर्तन की अपेक्षा कर रही नेपाली जनता को काफी आहत हर्इ है। उनकी भावना को ठेस भी पहुंचा है। कल जिस पद्धति, सोच और मानसिकता के विरूद्ध हमने लर्डाई लडी आज वही पद्धति और सोच फिर से हावी होने की कोशिश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुरानी और अस्वीकृत हो चुकी मान्यता और मनोविज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। अन्तरिम संविधान  से देश के भीतर बोली जाने वाली हर भाषा हर जाति या जनजाति के द्वारा अवलम्बन की गई संस्कृति सभी को राष्ट्रीय संस्कृति और भाषा के रूप में स्वीकार करने और इसे आत्मसात नहीं कर पाना अत्यन्त ही दुखदायी है।
तत्कालीन राजा महेन्द्र द्वारा एकदलीय पंचायती व्यवस्था को स्थापित करने के लिए अवलम्बन की गई मान्यता जिसके अनुसार राष्ट्रीयता की परिभाषा गढी गई थी, उसी परिभाषा को आज तक किसी ना किसी रूप में बनाए रखने की साजिश के तहत परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। महेन्द्र द्वारा निर्माण की गई राष्ट्रीयता की परिभाषा अपने स्वार्थ पर्ूर्ति के तरफ निर्दिष्ट था। जिसकी वजह से राष्ट्र में कई बडी असमानता और समस्या देखने को मिली। इसी कारण एक पूरी पीढी महेन्द्र के द्वारा थोपी गयी मान्यता को ही राष्ट्रीयता के रूप में समझने को बाध्य है। इस समय न्यायालय सहित राज्य के कई अंगों में उसी कालखण्ड में उत्पादित व्यक्तियों के महत्वपर्ूण्ा ओहदे पर रहने के कारण राष्ट्रीयता संबंधी उसकी सोच काफी संकुचित है। यह संभव है कि फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश का उद्देश्य किसी को आघात पहुंचाना नहीं हो सकता है लेकिन यह भी सच है कि इस फैसले से एक भाषा एक भेष में परिभाषित राष्ट्रीयता की सोच से अभी भी वो मुक्त नहीं हो पाए हैं।
ये उनकी दोष से भी अधिक लम्बे समय तक हावी रही प्रवृति की निरन्तरता और एक बडी दृष्टि दोष है। क्योंकि विगत दो दशकों का इतिहास देखा जाए तो नेपाल में कई बडी राजनीतिक परिवर्तन हर्ुइ है और इस परिवर्तन को आत्मसात नहीं करने से देश फिर से दर्ुभाग्यपर्ूण्ा स्थिति में फंस सकता है। मधेश आन्दोलन से पहले हमारे शासक वर्ग द्वारा बहुभाषा और बहुसंस्कृति को स्वीकार नहीं करने की वजह से ही इनको राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए मधेश आन्दोलन हुआ था। इसी तरह यह फैसला या ऐसी ही मान्यता को स्थापित बनाने के लिए फिर से दुष्प्रयास किया गया तो और अधिक असंतोष का बीजारोपण हो सकता है। जिससे देश को गंभीर जटिलता का सामना करना पड सकता है।
मधेश आन्दोलन के कई आयाम हो सकते हैं। बहुत कारण से वहां आन्दोलन हुआ होगा। लेकिन मधेशी जनता जिस कारण से विद्रोह करने पर बाध्य हर्ुइ थी वह थी उसकी पहचान और अस्तित्व की रक्षा करना। देश के भीतर आत्मसम्मान के साथ अपनी पहचान को जीवन्त बनाने के लिए ही मधेश में इतना व्यापक विद्रोह हुआ था। मधेश आन्दोलन किसी दूसरे के अधिकार हनन के लिए नहीं था। बल्कि हम तो सिर्फइतना ही चाहते थे कि दौरा सुरूवाल के सम्मान के साथ धोती कर्ुता पायजामा गमछा को भी वही सम्मान मिले।
यहां क्या समझना जरूरी है कि जब तक देश में हर नागरिक को अपनत्व के साथ आलिंगन नहीं किया जाएगा तब तक राष्ट्रीयता समृद्ध नहीं हो सकती है। कल मधेशी, जनजाति, अल्पसंख्यक या दलित को दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में देखा जाता था जिस कारण से तथाकथित पहले दर्जे के नागरिक, समुदाय, जाति या एक निश्चित समुदाय, इसकी संस्कृति इसकी पहचान, इसकी बोली, इसकी भाषा, इसका भेष को ही  राष्ट्रीयता और इस देश की पहचान के  रूप में मान्यता मिली। यही वजह है कि विभिन्न जाति, संस्कृति और भाषा को देश के भीतर ही विराना बना दिया। जब किसी वर्ग, जाति, संस्कृति और भाषा को अपने ही देश में पराया माना जाता है तो वह देश कभी भी प्रगति की राह में आगे नहीं बढ सकता है।
आज हमें सोचना ही पडेगा कि मधेश के देहाती इलाके में रहने वाला एक मधेशी को यह देश मेरा है कि नहीं यह सोचने की अवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए कि नहीं – राष्ट्र निर्माण में उसको सहभागी बनाने का वातावरण तैयार किया जाना चाहिए कि नहीं -जब तक हम ऐसे वातावरण का निर्माण नहीं कर सकते हैं तब तक नए नेपाल की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। मधेश की अस्मिता को आत्मसात किए बिना, मधेश की समग्रता स्वीकार किए बिना, शताब्दियों से अपमानित और अपहेलित हुए मधेशी को अग्राधिकार दिए बिना नेपाल की राष्ट्रीयता सबल नहीं बन सकती है। देश के भीतर किसी भी क्षेत्र या समुदाय को यदि हीनताबोध के साथ जीने पर मजबूर किया गया तो उस देश की राष्ट्रीयता नहीं टिक सकती।
आज हम राष्ट्रीयता को भाषा और भेष में ढूंढने का प्रयास किया जा रहा है। क्या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा कपडाँ और बोली में ही सीमित है -जब तक राष्ट्रीयता देश के भीतर रहने वाले प्रत्येक नागरिक की धडकन में खोजने का प्रयास का प्रयास नहीं किया जाएगा  तब तक वह राष्ट्रीयता सबल और मजबूत नहीं हो सकती है। जब तक राष्ट्रीयता को मन के संबंध से दूर रखा जाएगा, एक सीमित घेरा में कैद करने का प्रयत्न किया जाएगा तो यह देश में एक बडी दर्ुघटना को ही जन्म देगा।
आज हम राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हैं। इतिहास में पहली बार हम भावनात्मक एकता निर्माण के प्रयत्न में हैं। इस समय हमें सहअस्तित्व, सहबोध को आत्मसात करना ही पडेगा। अपने उन्नति या अपने प्रगति की बात सोचते समय दूसरों की भावना और अस्तित्व का भी ख्याल नहीं करने पर परिस्थिति और भी जटिल हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किसी जाति वर्ग या समुदाय का विरोध नहीं है। किसी की भावना और संवेदन को ठेस पहुंचाने की हमारी नियति भी नहीं है। दौरा सुरूवाल के प्रति हमारी वितृष्णा और विरोध भी नहीं है। हमारा प्रश्न तो बस इतना है कि धोती कर्ुता या पायजामा पहनने वाले लोग भी नेपाली हैं या नहीं – यदि हैं तो उनके द्वारा पहने जाने वाले पोशाक को भी राष्ट्रीय पोशाक की मान्यता क्यों नहीं दी गई – क्या इस बारे में माननीय न्यायाधीशों को आत्मसमीक्षा  करने की जरूरत नहीं है – र्सवाेच्च अदालत संपर्ूण्ा नेपाली जनता के विश्वास का केन्द्र है। अपमान अन्याय और तिरस्कार से प्रताडित किसी भी नेपाली को अदालत का दरवाजा खटखटाने पर उससे आत्मसम्मान और न्याय पाने की आशा कर सकता है। लेकिन वो न्याय किसी वर्ग, क्षेत्र, जाति और समुदाय पर ही आघात करने वाला न्याय मिलेगा तो प्रश्न तो उठना लाजिमी है ना कि हम आखिर किस लोकतांत्रिक पद्धति में जी रहे हैं –
-लेखक मधेशी जनअधिकार फोरम गणतांत्रिक के सहअध्यक्ष हैं)

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