सर्वशक्ति दायिनी माँ भवानी, १६ वर्ष बाद विशेष संयोग : डा. मुकेश झा

durga-mata

डा. मुकेश झा, जनकपुर, २२ अक्टूबर |
‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।’
‘वह देवी जो समस्त प्राणियों, हरेक पदार्थ में शक्ति रूप में विराजमान हैं उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है ।’
मार्कण्डेय पुराण अन्तर्गत दुर्गा सप्तशती का यह श्लोक माँ जगदम्बा के शक्ति स्वरूप को अर्पित है । यह समस्त भूत जगत, जड़ या चेतन जो भी अस्तित्व में या भविष्य में स्वरूप में आने वाला है, वह सब कुछ शक्ति का ही स्वरूप है । इस सृष्टि में जो भी दृश्य अदृश्य, जड़ चेतन, ज्ञानगम्य या अगम्य चराचर जगत शक्ति के ही प्रभाव से अपना अस्तित्व और अवस्था को महसूस करा रहा है ।
हिन्दू शास्त्रों के एक एक श्लोक अपने आप में गूढ़तम रहस्य और ज्ञान का भण्डार छिपाए हुए हैं । छोटा सा जान पड़ने वाले किसी भी मन्त्र या सूत्र को हम अगर उद्घघाटित करें या उसके विस्तार पर दृष्टि डालने की क्षमता हो तो एक श्लोक या मन्त्र से ही ज्ञान विज्ञानं की प्राप्ति हो सकती है ।
हिन्दुओं का महान् पर्व दशहरा जो दुर्गा पूजा, विजया दशमी के नाम से विख्यात है उसको हमारे ऋषियों ने माँ दुर्गा को समर्पित करते हुए उस समय माता शक्ति की उपासना करने का विधान बनाया है । इन दस दिनों में शक्ति को नौ रूपों, नौ विभागों को नौ माताओं के उपासना, साधना करने के कारण इसे नवरात्र भी कहा जाता है ।
शास्त्रों में कहा जाता है की माँ दुर्गा के रूपो का विश्लेषण करना बड़े–बड़े ऋषि मुनि तपस्वी की तो बात ही क्या स्वयं ब्रह्मा विष्णु महेश से भी सम्भव नहीं है । इस तथ्य पर विचार करें तो वास्तव में शक्ति की पार पाना किसके वश की बात है ? एक शक्ति ही अपने आप में पूर्ण है, वही हर जगह व्याप्त है, हर कार्य का कारण है, वही इस सृष्टि के कण–कण में व्याप्त है, इस ब्रह्माण्ड में कहीं एक भी स्थान नहीं जो शक्ति से रहित हो । इस बात को आज के भौतिक विज्ञानं ने भी स्वीकार किया है । हमारे ऋषियों ने दशहरा को उसी शक्ति की उपासना करने का विशेष अवसर निर्धारण किया है । नवरात्र में हम उसी शक्ति को जो कण–कण में व्याप्त है और सब को धारण करती है उसी की मातृ रूप में सद्भाव पूर्वक नौ रूपों में पूजते हैं ।
वास्तव में अगर देखा जाय तो शक्ति का कोई रूप नही होता परन्तु जितने भी रूप हैं वह सब शक्ति के कारण ही हैं, अगर उन रूपों के वीच से शक्ति को हटा दिया जाय तो रूप अदृश्य हो जाएगा । ऋषियों ने शक्ति को माता के रूप में ही उपासना करने का विधान बनाया क्योंकि जैसे माता अपने संतान के लिए ममतामयी हो कर उसका पालन पोषण करती है उसी तरह समस्त ब्रह्माण्ड के लिए शक्ति ममतामयी होकर धारण कर रही है । शक्ति की महिमा उतनी ही है, उपकार उतना ही है, जितना हमारे जीवन में माता का । जैसे हम माता के बिना जीवन की कल्पना भी नही कर सकते वैसे ही शक्ति के बिना इस ब्रह्माण्ड की कल्पना ही नहीं हो सकती, कोई अस्तित्व ही नही हो सकता । इसी तथ्य को जानकर हमारे ऋषियों ने उद्घोष किया कि शक्ति के बिना शिव भी ‘शव‘ हैं, जब शव में शक्ति का संचार होता है तभी वह शिव रूप में परिणत होते हैं । इस तथ्य को हम किसी तरह झुठला नहीं सकते । इस संसार में जो कुछ भी सृष्टि, स्थिति और लय हो रहा है, जो भी दृश्य अदृश्य परिवर्तन हो रहा है वह सब शक्ति के कारण ही है । वह परिवर्तन आध्यात्मिक, आधिदैविक अथवा आधिभौतिक ही क्यों न हो । उसी शक्ति को ऋषियों ने समयानुसार विभिन्न नामों से पुकारा है ।
मानव शरीर में शक्ति तीन स्तर पर कार्य करती है । आधिभौतिक अर्थात शारीरिक शक्ति, आधिदैविक अर्थात मानसिक या बौद्धिकशक्ति, आध्यत्मिक अर्थात श्रद्धा, विश्वास या भावना शक्ति । इन तीनों शक्तियों को पूर्ण शक्ति के रूप में लिया जा सकता है जो सिर्फ और सिर्फ मानव शरीर में ही स्थित है अर्थात माँ शक्ति अपनी पूर्ण रूप से मानव शरीर में अवस्थित हैं । वैसे तो शक्ति संसार के कण–कण में व्याप्त है परन्तु शक्ति के परिवर्तन या रूपान्तरण की जो अवस्था जीवों में देखी जाती है वह अन्य पदार्थों में नहीं और जो रूपांतरण मनुष्य में देखा जा जाता है वह अन्य जीवों में नहीं । भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति तीन गुण–सत्व, रज और तम, से प्रभावित होती है । इस तरह तीन शक्ति तीन गुणों से प्रभावित हो कर नौ रूप धारण करती है । नवरात्र के नौ दिनों में साधक, उपासक हर दिन एक एक शक्ति की उपासना साधना करते हुए माँ शक्ति की उन लौकिक, अलौकिक और पारलौकिक क्षमता को आत्मसात् करने, उनके साथ एक रूपता प्राप्त करने का अभ्यास करता है ।
शक्ति हर जगह व्याप्त होते हुए भी उसके प्रकट होने का एक विशेष माध्यम होती है । जैसे उपकरण अनुसार एक ही विद्युत् शक्ति कहीं गर्मी, तो कहीं ठण्ड उत्पन्न करती है उसी तरह शक्ति मानव के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने पर भी स्थान विशेष पर विशेष रूप से अवस्थित रहती है । स्थान विशेष की शक्ति जाग्रत होने पर विशेष तरह की क्षमता प्राप्त होती है और उस क्षमता के कारण विशेष कार्य सिद्ध होते हैं । जैसे उदहारण के लिए आँख की शक्ति जाग्रत होने पर देखने की शक्ति और कान के शक्ति जाग्रत होने पर सुनने की शक्ति । यह भौतिक उदहारण है फिर भी इस से सिद्ध होता है कि यही प्रक्रिया मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी पड़ती है ।
मानव शरीर में इस तरह की नौ शक्ति केन्द्र हैं, जिसमें सात तो मानव के भौतिक शरीर में है और दो मानव शरीर से बाहर रहकर शरीर को प्रभावित करती है । इन शक्ति केंद्रों को योग के भाषा में ‘चक्र‘ कहा जाता है । इन शक्ति केन्द्रो को जाग्रत करने की प्रकृया को ‘कुण्डलीनी जागरण‘ कहते हैं । इस प्रक्रिया में शरीर के हर एक शक्ति केन्द्र अर्थात चक्र पर माता के एक एक स्वरूप का ध्यान किया जाता है और माँ के उस स्वरूप का जो भी लक्षण, गुण और प्रभाव हैं वह साधक में परिलक्षित होने लगते हैं । पौराणिक कथाओं एवम् दुर्गा सप्तशती के माध्यम से ऋषियों ने वही ज्ञान देने का प्रयत्न किया है । नवरात्र की नौ शक्तियाँ मनुष्य को अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जाती है ।
दुर्गा सप्तशती के अनुसार माता के नौ स्वरूपों का वर्णन श्लोक के माध्यम से किया गया है ।
‘प्रथमं शैल पुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी तृतीयं चन्द्रघण्टेति कुष्मांडेती चतुर्थकम् पञ्चम् स्कन्दमातेति षष्टम् कात्यायनीति च, सप्तम कालरात्रीति, महागौरीति च आष्टकम् नवम् सिद्धिदात्री च नव दुर्गा प्रकीर्तिताः ।’
माँ शक्ति के नौ रूपों में प्रथम शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा, चौथी कुष्मांडा, पांचवीं स्कन्दमाता, छठवीं कात्यायिनी, सातवीं कालरात्री, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री नाम से विख्यात है । इन नौ शक्तियों की उपासना साधना और धारणा करने से जीव ब्रह्म रूप में परिणत हो जाता है अर्थात अपूर्णता से पूर्णता को प्राप्त होता है ।
१) शैलपुत्री
माँ शक्ति के इस रूप के प्रभाव से जड़ वस्तु चेतन में परिवर्तित होता है । जो भी जड़ वस्तु चेतन में परिवर्तन हो रहा है, जैसे जमीन से पौधा बनना, अन्न में प्राण का संचार, जल में प्राण इत्यादि जितने भी जड़ वस्तु जो चेतना का प्रवाह धारण करने में सक्षम है उस शक्ति को शैलपुत्री कहा जाता है । जिस साधक में यह शक्ति जाग्रत होती है उसकी जड़ता समाप्त हो जाती है अर्थात वह अज्ञान से ज्ञान की ओर पहला कदम बढ़ाता है । व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से और तीनों गुणों के आधार पर भी पहले जड़वत् ही रहता है । वह जिस शक्ति के कारण जड़ता को पार कर चेतन के रूप में परिणत होने लगता है उसको ही ऋषियों ने शैलपुत्री कहा है । वह माता शैलपुत्री की ही कृपा है जिससे जीव जड़ता को पार कर चेतना को प्राप्त करता है ।
जैसा पुराणों में वर्णित है माँ पार्वती हिमालय अर्थात पर्वत की पुत्री है । हिमालय को जड़ माना जाता है परंतु पार्वती चेतन हैं । इसी तरह इस शक्ति की उपासना साधना करते समय हम उस विराट शक्ति स्वरूपा माँ भगवती शैलपुत्री से विनती करते हैं कि हे माँ हमारी जड़ता को, मतिहीनता को, अध्यात्म शून्यता को चेतन की ओर ले चलो, हे माँ हम में जो जड़ता है उसको हटा कर चेतना का संचार करो ताकि हम इस संसार का और आपका वास्तविक स्वरूप समझ सकें ।
कुन्डलिनी योग के अनुसार मानव शरीर में इस शक्ति का स्थान मूलाधार चक्र है जिसके जागरण से व्यक्ति प्राणवान, ओजस्वी, प्रकाण्ड वक्ता इत्यादि गुणों को प्राप्त करता है ।
२) ब्रह्मचारिणी
शक्ति का वह स्वरूप् जिससे व्यक्ति में सद्गुण, सद्भाव, सदाचरण की प्रेरणा आती है, सत्कार्य करने का साहस आता है, सत्य के लिए कुछ कर गुजरने की सामथ्र्य आता है उस शक्ति को ऋषियों ने ब्रह्मचारिणी नाम दिया है ।
जैसे हर माता अपने पुत्र के पूर्णता की कामना रखती है उसी तरह शक्ति माता भी जीव को पूर्णता की ओर ले जाना चाहती है और उसके लिए अपने साधक को वह क्षमता प्रदान करती है जिससे वह पूर्णता की ओर बढ़े । पूर्णता प्राप्त करने के लिए सिर्फ जड़ से चेतन बनना पर्याप्त नहीं है । चेतन में अगर ब्रह्मत्व न आए, संस्कार न आए, आचरण और व्यवहार सही नहीं हो तो वह पशु समान ही है । माँ शक्ति की ब्रह्मचारिणी स्वरूप के प्रभाव से वह सारे गुणों की साधक उपासक में अभिवृद्धि होती है जो उसे पूर्णता की ओर ले जाने में सहयोगी हो ।
नवरात्र के दूसरे दिन माता के इस स्वरूप की साधना उपासना की जाती है और यह अभिलाषा की जाती है कि माता से ब्रह्मचारी के आचरण पालन करने की शक्ति प्रदान हो ।
कुण्डलिनी योग के अनुसार मानव शरीर में इस शक्ति का स्थान ‘स्वाधिष्ठान चक्र‘ है । इस चक्र पर ध्यान करने और इसके जाग्रत होने से व्यक्तित्व, सत्यता, सरलता, समरसता, आदि गुणों का विकाश होता है ।
३) चन्द्रघण्टा
पूर्णता प्राप्त करने के तीसरे सोपान में साधक की क्षमता भौतिक रूप से जनमानस में दिखाई और सुनाई देने लगती है । साधक के भौतिक क्षमता के चर्चे होने लगते हैं । जिस शक्ति के प्रभाव से साधक भौतिक रूप से प्रभावशाली दिखाई देता है उस शक्ति को चन्द्रघण्टा कहते हैं ।
चन्द्र और घण्टा एक ऐसा प्रतीक है जो प्रकाश और शब्द का द्योतक है । व्यक्ति का जन्म जड़वत होता है, माँ शैलपुत्री उसे चेतना प्रदान करती है, माँ ब्रह्मचारिणी उसका व्यक्तित्व निर्माण करती है परन्तु उसके बारे बाहरी जगत में किसी को कुछ पता नहीं रहता । परन्तु इस ब्रह्माण्ड में अगर कोई भी पूर्णता की ओर बढ़ता है तो बाहर भी उसकी आभा दिखाई देने लगती है और उसमें जो अलौकिक क्षमता का विस्तार होता है उसके बारे जनमानस को भी पता लगने लगता है । माँ शक्ति ने अपने साधक पुत्र को भौतिक रूप से ऊँचा उठाने, संसार के सामने उसे प्रस्तुत करने के लिए जिस रूप को धारण किया उसे चन्द्रघण्टा कहते हैं ।
मनुष्य के शरीर में इस शक्ति के केन्द्र का स्थान ‘नाभिचक्र‘ अथवा ‘मणिपुर चक्र‘ है । जिस साधक की नाभि चक्र जाग्रत होती है उसे भौतिक सामग्री, भौतिक जगत में ख्याति की कोई कमी नही रहती । वह साधक अन्धकार को प्रकाशित करने वाला, अपने क्षमता से अर्जित भौतिक सामग्री से जनमानस को सहयोग करने वाला इत्यादि दैवी गुणों का भण्डार होता है । साधक में ऐसी सोच और क्षमता माँ चन्द्रघण्टा की शक्ति से आती है ।
४) कुष्माण्डा
जीव को पूर्णता की ओर विकशित करने वाली चौथी शक्ति कुष्मांडा है । जिस शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति में विश्व कल्याण की भावना जाग्रत होती है, व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर से बाहर निकलकर विश्व ब्रह्माण्ड के लिए कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त करता है उस शक्ति को कुष्मांडा कहते हैं । इस शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति विद्वता को प्राप्त करता है, उच्च मानसिक अवस्था में स्थिर रहता है, सब जीव के कल्याण कैसे हो इस बात की चिन्तन करता है, हर प्राणी के दुःख के निवारण का सोचता है और ज्ञान का प्रचार करता है ।
पौराणिक कथाओं के अनुसार जो देवी हँसते हँसते इस ब्रह्माण्ड का निर्माण करती है उसे कुष्मांडा कहा जाता है । उनका स्थान ऋषियों ने सूर्य के मध्य में बताया है । शक्ति के इस स्वरूप् का उपासना करने से साधक किसी भी कार्य को बड़ी आसानी से सम्पन्न कर सकता है ।
कुण्डलिनी के अनुसार माता शक्ति के कुष्मांडा का हृदय चक्र में स्थान है ।
५) स्कन्दमाता
पुराणों के अनुसार स्कन्द नाम भगवान शिव के पुत्र ‘कुमार‘ का है जो देवताओं के सेनापति हैं । देवता, जो इतने शक्तिशाली हैं उनके सेना कितनी शक्तिशाली होगी और उस सेना के सेनापति के शक्ति का तो कहना ही क्या ! जिस माता ने ऐसे वीर पुत्र को जन्म दिया, जिनसे शक्ति पाकर कुमार स्कन्द सेनापति बने वह शक्ति माता हमे भी वही क्षमता प्रदान करें । इस शक्ति के प्रभाव से साधक देवताओं को भी निर्देश देने की क्षमता को प्राप्त कर सकता है ।
जिस शक्ति की प्रेरणा और प्रभाव से देव शक्तिओं को संगठन करने की, नेतृत्व और सञ्चालन करने की, असुर शक्तिओं से लोहा लेने के विचार और सामर्थ्य आते हैं उस शक्ति को माता शक्ति के पञ्चम रूप में उपासना की जाती है । शक्ति के इस रूप की उपासना से साधक में वाक् शक्ति प्रभावशाली, दृढ़ता, निश्चयता, निर्भीकता का विस्तार होता है ।
कुण्डलिनी के अनुसार मनुष्य शरीर में इस शक्ति का स्थान विशुद्धि चक्र है । इस चक्र के जाग्रत होने पर मनुष्य में अलौकिक कार्य करने की साहस, देवत्व की, सत्कर्म की, धर्म की रक्षा के लिए मर मिटने की निश्चयता का विकास होता है ।
६) कात्यायिनी
दुर्गा सप्तशती में वर्णित जो महिषासुर मर्दिनी हैं वही माता कात्यायिनी हैं । कात्यायन ऋषि द्वारा पूजित होने के कारण शक्ति के इस रूप को कात्यायनी कहा जाता है । जीव के पूर्णता प्राप्त करने के मार्ग में सहयोगी शक्ति का यह छठा रूप है । इस शक्ति के प्रभाव से मनुष्य देव तुल्य हो जाता है । व्यक्ति का समस्त गुण सदैव देवत्व से भरा रहता है । इस स्तर के व्यक्ति या इस कात्यायनी शक्ति से प्रभावित व्यक्ति सामूहिक रूप से कार्य करने, सब को अच्छे कार्य करने को प्रेरित करने के स्वाभाव वाला होता है । अकेले कार्य करने की क्षमता होने पर भी सहकार्य को महत्व देना, दूसरे को सदमार्ग पर लगाना, अध्यात्म विद्या, ब्रह्म विद्या का जानकार होना, अलौकिक शक्तियों का स्वामी होना, सूक्ष्मलोक और दिव्य लोक से सम्बन्ध स्थापित करना, दिव्य दृष्टि प्राप्त करना, सोचे हुए अभीष्ट वस्तु प्राप्त करना, इत्यादि सारे देव तुल्य शक्ति जिसके द्वारा प्राप्त होती है वही शक्ति माता कात्यायिनी है । इस शक्ति से पूर्ण सात्विक ज्ञान, विज्ञानं का प्रादुर्भाव होता है एवम् साधक आध्यात्मिकता से ओतप्रोत होता है ।
मानव शरीर में इस शक्ति का केन्द्र ‘भ्रूमध्य‘ में हैं जिसे आज्ञा चक्र कहा जाता है ।
७) कालरात्री
अन्धकार को रात्री कहा जाता है और समय को काल । समय के अंधकार अर्थात मृत्यु के घेरा से पार ले जाने वाली जो शक्ति है वह काल रात्री है । इस शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति में मृत्यु भय समाप्त हो जाता है और वह मृत्यु से अमरता की ओर प्रस्थान करता है और अमरता को प्राप्त करता है । रात्री को पार करके जैसे प्रकाशमान सुबह होता है वैसे शक्ति के कालरात्री को पार किया हुवा साधक अमरता के अरुणोदय को प्राप्त होता है । इस शक्ति के प्रभाव से साधक को पाने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता । आशा, निराशा, मोह, माया, आदि समस्त मानवीय एवम् तीनो गुणों, तीनो शरीरों, तीनो तापों से पार हो जाता है । इस संसार में जो भी गुण, ताप या शरीर रूपी बन्धन हैं वह सब कालरात्री के समान ही है । जब तक इन रात्री स्वरूपों को पार नहीं किया जाता तब तक पूर्णता का आभास नहीं होता । माता कालरात्री की शक्ति के प्रभाव से जीव इस रात्री को पार करता है और मानव जीवन, मानव शरीर प्राप्त करने का सही अर्थ सिद्ध करता है ।
मानव शरीर में इस शक्ति का स्थान सहस्रार चक्र है । इस चक्र के जागरण से व्यक्ति पूर्णता को प्रात करता है, सर्वज्ञ और सर्व शक्तिमान हो जाता है ।
८) महागौरी
पुराणों में वर्णित कथा अनुसार माँ पार्वती एक बार तपस्या कर रही थी । काफी समय तपस्या करने की कारण उनका शरीर मैला हो गया जिसके कारण वह स्यामल वर्ण की हो गई । उस समय भगवान शिव ने उन्हें गंगाजल से मल मल कर स्नान कराया जिससे उन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया ।
माँ महागौरी रूपी जो शक्ति है वह अपने पूर्णता को प्राप्त किये बालक के शरीर पर जो कुछ भी बाँकी मैल है उसे गंगाजल की प्रतीक पवित्रता से से साफ करती है और उसकी उज्ज्वल, धवल, श्वेत कान्ति की आभा चारों ओर व्याप्त हो जाती है । फिर उसपर कोई कालिमा या दाग नहीं लग सकता । जिस शक्ति के प्रभाव से पूर्णता को प्राप्त हुए व्यक्ति की ख्याति निष्कलंक हो युग युगान्तर तक अपनी आलोक फैलाती रहती है माँ शक्ति का वह रूप महागौरी की नाम से विख्यात है ।
कुण्डलिनी योग के अनुसार इस शक्ति का स्थान मानव के शरीर में नहीं है । क्योंकि मानव शरीर में जो भी शक्ति केन्द्र है उसपर साधक अपनी साधना के अनुसार ऊपर नीचे हो सकता है परन्तु एक बार पूर्णता को प्राप्त हुआ जीव पुनः नीचे नहीं आ सकता । महागौरी के शक्ति केन्द्र का नाम सोम चक्र है ।
९) सिद्धिदात्री
शक्ति माँ के नौ रूपों में यह नौवां रूप है । पूर्ण और निर्मल जीव को माँ शक्ति अपनी समस्त सिद्धियाँ देती हैं । जो पूर्णता को प्राप्त नहीं और निर्मल नहीं उनको उनके अवस्था के अनुरूप ही जो उचित है वह दिया जाता है परन्तु एक बार जब साधक शक्ति की उपासना और साधना से एक एक अवस्था को प्राप्त कर पूर्णता और निर्मलता की अवस्था में आता है तो उसके लिए माता शक्ति कुछ भी नहीं छिपाती । इस शक्ति के अवतरण पर जीव वह हर कार्य करने में सक्षम होता है जिसे माँ शक्ति कर सकती है अर्थात वह माँ जगदम्बा के साथ एकाकार हो जाता है । वह माता में और माता उसमे समाहित हो जाती है, दोनों में कोई भेद नही रह जाता । इस अवस्था को पूर्ण अवस्था कहते हैं ।
कुण्डलिनी योग के अनुसार शक्ति के इस केन्द्र को निर्वाण केन्द्र कहते हैं । यह भी मानव के शरीर में नहीं रहता । शास्त्रों में वर्णित जो परम् पद, ब्रह्म पद, निर्वाण पद या मोक्ष है वह यही अवस्था है । इस तरह अगर हम सूक्ष्म रूप से देखें तो कण कण में व्याप्त शक्ति की सत्ता ही जड़ से चेतन में परिणत होती है और फिर एक एक अवस्था से गुजरते हुए पूर्णता को प्राप्त होती है । जड़ रूप में भी वही शक्ति का स्वरुप है, चेतन या जीव रूप में भी वही शक्ति है और जो पूर्णता को प्राप्त होती है वह भी वही शक्ति है । वही शक्ति माता जगदम्बा अपनी गुण और प्रभाव से अपने आपको जड़ से पूर्णता की ओर ले जाती है । परन्तु इस परिवर्तन को, इस रूपांतरण की प्रकृया इतनी सूक्ष्म और गहन है जो हर किसी की समझ में नहीं आता और वह भी महामाया शक्ति का ही प्रभाव है ।

१६ वर्ष बाद विशेष संयोग
१६ वर्ष बाद फिर नवरात्र में विशेष संयोग बन रहा है । दूज तिथि लगातार दो दिन होने के कारण शारदीय नवरात्र नौ की जगह १० दिन का होगा । श्राद्ध पक्ष समाप्त होते ही, शारदीय नवरात्र आरंभ हो रहे हैं । १ अक्टूबर से नवरात्र आरंभ होंगे । इस बार दुर्गा जी अश्व पर आएंगी और भैंसा पर बैठकर जाएंगी ।
शारदीय नवरात्र इस बार १० दिन के होंगे । ये १० दिन सुख–समृद्धिदायक होंगे । शारदीय नवरात्र अश्विन मास के शुक्ल पक्ष से आरंभ होंगे । इस बार गजकेशरी योग में शारदीय नवरात्र होंगी । ऐसा इसीलिए कि गुरु व चन्द्रमा एक साथ कन्या राशि में लग्न स्थान में होने से गजकेशरी महासंयोग बन रहा है । शारदीय नवरात्र में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है । १ अक्टूबर से शुरू होकर शारदीय नवरात्र उत्सव १० अक्टूबर तक रहेगा ।
विशेष यह है कि इस बार मां दुर्गा का आगमन अश्व से होगा व गमन भैंसा पर होगा, जो अति शुभ है । देवीपुराण में उल्लेखित है कि नवरात्र में भगवती के आगमन व प्रस्थान के लिए वार अनुसार वाहन बताए गए हैं । देवी भागवत में नवरात्र के प्रारंभ व समापन के वार अनुसार मां दुर्गा के आगमन प्रस्थान के वाहन इस प्रकार बताए हैं । आगमन वाहन–रविवार व सोमवार को हाथी, शनिवार व मंगलवार को घोड़ा, गुरुवार व शुक्रवार को पालकी, बुधवार को नौका आगमन होता है ।
प्रस्थान वाहन ः रविवार व सोमवार भैसा, शनिवार और मंगलवार को सिंह, बुधवार व शुक्रवार को गज हाथी गुरुवार को नर वाहन पर प्रस्थान करती हैं । शनिवार के दिन हस्त नक्षत्र में घट स्थापना के साथ शक्ति उपासना का पर्व काल शुरु होगा । शनिवार के दिन हस्त नक्षत्र में यदि देवी आराधना का पर्व शुरू हो, तो यह देवीकृपा व इष्ट साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है ।
१० दिन विशेष, ११ अक्टूबर को मनेगा दशहरा
–१ अक्टूबर–घटस्थापना, गजकेशरी योग ।
–२ अक्टूबर–द्वितीया, द्विपुष्करयोग
–३ अक्टूबर–द्वितीया,रवियोग
–४ अक्टूबर–तृतीया,रवियोग
–५ अक्टूबर–चतुर्थी,रवियोग, अमृतसिद्धियोग
–६ अक्टूबर–पंचमी षष्ठी, सर्वार्थ सिद्धियोग,रवियोग
–७ अक्टूबर–षष्ठी रवियोग
–८ अक्टूबर –पर्जन्य सप्तमी,सरस्वती पूजन

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