सर्वोच्च के फैसले का मधेशीकरण : डा.श्वेता दीप्ति

सर्वोच्च अदालत ने आषाढ़ ४ गते एक ऐतिहासिक फैसला लिया था । इस फैसले ने जहाँ एक ओर किसी एक पक्ष को न्यायालय के अस्तित्व पर विश्वास जगाया वहीं सत्तापक्ष ने उसके अस्तित्व और अधिकार पर ही सवाल उठा दिया । सर्वोच्च अदालत ने प्रमुख चार दलों द्वारा संविधान बनाने हेतु किए गए १६ बुन्दों पर जो सहमति हुई थी उसके कार्यान्वयन पर अन्तरिम आदेश जारी किया । न्यायाधीश गिरीशचन्द्र लाल के इजलास में इसकी सुनवाई हुई और अन्तरिम संविधान के धारा १, ८२ और १३८ के अनुसार संविधान निर्माण प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो रही है इसलिए मसौदा लेखन के कार्य को रोकने का आदेश दिया । bijay-karna-dipendra-jha-rita-shah
१६ बुन्दे सहमति में आठ प्रदेश और उसका सीमांकन, नामांकन संघीय आयोग के द्वारा किए जाने की बात है । जिसके विरोध में सर्र्वोच्च में रिट दायर की गई थी जिसे दायर करने वाले पूर्व राजदूत विजय कर्ण, अधिवक्ता दिपेन्द्र झा और रीता शाह थे । रिट दायर करने के समय में ही इसे राजनीतिक प्रकृति का कहते हुए इसे पंजीकृत नहीं किया गया । किन्तु सीधे इजलास में निवेदन देने की कानूनी व्यवस्था के तहत इसे पंजीकृत किया गया । जिसकी सुनवाई गिरीशचन्द्रलाल के इजलास में हुई । जिसका फैसला रिट दायर करने वाले के पक्ष में आया । और जाहिर सी बात है कि इस फैसले ने सत्ता की गलियारों में हलचल पैदा कर दी । यह स्वाभाविक था । ऐसा होना ही था । किसी भी फैसले पर असहमत होना एक बात है पर सर्वोच्च के द्वारा दिए गए फैसले को न मानना एक गम्भीर बात है । अगर राजनीति पर न्यायालय की पकड़ नहीं है या राजनीति से जुड़े मसले न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं तो क्या राजनीतिज्ञों को निरकुंश हो जाना चाहिए ? जनता की परवाह नहीं करेंगे, विरोधी पक्ष के अस्तित्व को नहीं मानेंगे, राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाएँगे तो क्या यह निरंकुशता जनता को मान्य हो सकती है ? इतना ही नहीं फैसले को समुदाय विशेष के साथ जोड़कर देखा जा रहा है तो क्या आज तक मधेश के लिए होते आए फैसले जो किसी खास समुदाय के अन्तर्गत होते आए हैं वो पक्षपातपूर्ण नहीं हो सकते हैं  ? समुदाय से जोड़कर देखना तो पूरे न्यायिक प्रक्रिया पर संदेह करना है । अगर आज मधेशी मूल के न्यायाधीश के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लगाया जा रहा है और उसे मानने से इनकार किया जा रहा है तो पूर्व में हुए फैसले जो पहाड़ी मूल के न्यायाधीशों ने दिए हैं अगर उन्हें मधेशी वर्ग ने नहीं माना होता तो क्या स्थिति होती ? यह तो चित भी मेरी और पट भी मेरी वाली बात है । पर जो हमेशा होता आया है वो आज भी हो ऐसा सम्भव नहीं है । जबकि ध्यान देने वाली बात तो यह है कि फैसले में संविधान प्रक्रिया को नहीं रोका गया है बल्कि धारा १, ८२ और १३८ के विपरीत कार्य न करने की बात की गई है । अगर यह नहीं माना जा रहा है तो बात तो स्पष्ट हो जाती है कि आप इन्हीं मुद्दों को नकारना चाह रहे हैं । और एक विशेष स्वार्थ के तहत सत्ता चलाने की साजिश कर रहे हैं । भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने तानाशाह बनने की गलती की थी । पूरे भारत में इमरजेन्सी लगाया था पर परिणाम क्या हुआ यह सर्वविदित है । अर्श से फर्श पर उनका अस्तित्व आ गया था और जिसका खामियाजा कमोवेश काँग्रेस आज भी भुगत रही है ।

जनता की मनोदशा के साथ खिलवाड़ करना हमेशा महंगा साबित हुआ है । तानशाही और दमन की राजनीति की उम्र लम्बी नहीं होती हाँ वक्त जरुर लगता है किन्तु इसका परिणाम जरुर  सामने आता है । बहुमत और शक्ति का अहंकार ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं है । चार दलों की नीयत साफ नजर आ रही है । उनकी बैचेनी जनता के लिए नहीं बल्कि अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए है । हाथ में आए किसी मौके को वो बेकार नहीं जाने देना चाहते हैं । जहाँ एक ओर मधेशी जनता और जनजाति पहचान सहित की संघीयता का मांग आरम्भ से करती आई है और उसी मांग का सहारा लेकर आज संविधान सभा में नेताओं का जमघट लगा हुआ है उसी मांग को नजरअंदाज कर के संविधान निर्माण का औचित्य कहाँ तक सही है ?
लोकतंत्र में विधि का शासन होता है । राज्य के संरक्षण और कानून का जिम्मा राज्य के तीसरे प्रमुख इकाई न्यायपालिका में निहित होता है । और इसके द्वारा किए गए फैसले का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य होता है किन्तु जब सत्ता ही इसे मानने से इनकार करेगी तो आम जनता से सरकार क्या उम्मीद कर सकती है ? मधेशी मूल पर सवाल उठाकर खुद की मानसिकता को उजागर किया गया है । जिस तरह समुदाय विशेष का दोष लगाकर उनके ऊपर उँगली उठाई जा रही है वो उनके विगत और भविष्य के नीयत को साफ दिखा रही है । आज न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला सत्ता को मान्य नहीं है और कल वही सीमांकन और नामांकन के लिए जिस संघीय आयोग का गठन सत्ता पक्ष करने वाला है उसके द्वारा लिया गया निर्णय अगर प्रभावित पक्ष को मान्य नहीं हुआ तब क्या सम्पूर्ण  को राष्ट्रद्रोही साबित कर दिया जाएगा ? क्योंकि राष्ट्रीयता और राष्ट्रद्रोह यहाँ की राजनीति का प्रिय शब्द है । इन दो शब्दों की कितनी गहन व्यापकता है इसे न समझ कर राष्ट्रीयता शब्द को हमेशा से एक शस्त्र के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है । परन्तु जहाँ अधिकार नहीं, जहाँ पहचान नहीं, जहाँ अस्तित्व नहीं वहाँ इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता है । न्यायालय ने १, ८२ और १३८ धाराओं का नकार कर नहीं बल्कि समावेश कर के संविधान निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कही है किन्तु यही बात चार दलों को हजम नहीं हो रही है । सभामुख अपनी मर्यादा को भूल रहे हैं कुछ ही महीने पहले की बात है जब उन्होंने अपने अधिकार से बाहर जाकर संविधान सभा में जो किया था वह न्यायोचित नहीं था किन्तु वह मान्य हो गया पर आज न्यायालय ही कटघरे में खड़ा है क्योंकि न्यायाधीश मधेशी मूल के हैं और सवाल मधेश का है । इसलिए सम्भवतः सभी नियम और कानून का मजाक उड़ाते हुए और परमादेश का उल्लंन करते हुए आज संविधान मसौदा पेश किया जा चुका है । वैसे अवमानना का एक और रिट सत्ता पक्ष के खिलाफ न्यायालय में दायर किया जा चुका है, निगाहें अब उस ओर टिकी हैं ।

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