सवाल मधेश राष्ट्र की पहचान का : कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी, १८ जून |
सम्राट मनु से लेकर महाभारत काल तक और सम्राट अशोक से लेकर लोहांग सेन, मुकुन्द सेन तक अनेक राज्यों के साथ मधेश अपने अस्तित्व के साथ गौरवान्वित देश रहा है । मधेश न कभी किसी से हारा न किसी के सामने अपने अधिकारों के लिए गिड़गिड़ाया । मधेश आज भी अपने गौरवपूर्ण स्वतन्त्र अस्तित्व में है । अगर कोई हारा है तो नेपालियों के साथ गठजोड़ करके उनके मालकियत को स्वीकारने वाले चन्द कुछ मधेशी नेता । मधेश आज भी अपनी स्वतन्त्रता को उजागर कर रहा है । यह आज भी पूर्ण स्वतन्त्र होने का प्रमाण दे रहा है । नेपाली शासक लोग खुद भी मधेश नेपाल से बाहर होने के संकेत दे रहे हैं । मधेशी पार्टियों से वार्ता करने के लिए नेपाल के विदेश मन्त्री को भेजा जाता है, जबकि कर्णाली, रोल्पा आदि जगहों पर वार्ता करने के लिए नेपाल के गृह मन्त्री जाते हैं । विदेश मन्त्री तो विदेशियों से ही वार्ता करते हैं न १ ब्रिटेन के राजदरबार, उसके पार्लियामेण्ट के द्वारा डा.सि.के राउत को भेजे गये जबाव (१८ जुलाई(२०११), संयुक्त राष्ट्रसंघ में नेपाल के ओर से पेश किए गये झूठा प्रमाण, नेपाल सरकार द्वारा मधेशियों के साथ किए जा जाने बाले गैर नेपाली का व्यवहार, मधेश में चारों तरफ मधेशियों के चेहरे, रंग, बोली, भाषा, रीतिरीवाजों से बिल्कुल अलग चेहरे, रंग, बोली, भाषा तथा रीतिरिवाजों के लोगों द्वारा होता रहा शासन, प्रशासन, नियन्त्रण तथा दुव्र्यवहार समेत यही प्रमाणित करता है कि मधेश नेपाल का उपनिवेश बना हुआ है और जितना मधेश नेपाल का उपनिवेश बना हुआ है, उससे कई गुणा ज्यादा मधेश के हक हित के नाम पर नेपालियों के साथ मिलकर राजनिति कर रहे मधेशी नेताओं ने इसे नेपालियों का गुलाम उपनिवेश बनाने में भूमिका निभाते आ रहे हैं ।

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तमलोपा की रामग्राम, परासी में होने जा रहे पहले महाधिवेशन का नारा नेपाली परम्पराओं के बीच ही नेपाली नयी परम्परा को जन्म देने का आश्चर्यजनक काम हो रहा है । उसके ब्यानरों में कहीं मधेशी राष्ट्र तो कहीं मधेश राष्ट्र की पहचान की बात देखने को मिलती हैं । व्याकरण के हिसाब से भी मधेशी राष्ट्र होना अटपटा सा लगता है और राजनीतिक विश्लेषनात्मक रूप से भी स्पष्ट नहीं होता है । क्योंकि दुनिया को कोई देश अपने राष्ट्र के आगे अस्पष्ट विशेषण का प्रयोग नहीं करता है । राष्ट्र जनता और सरकार के अन्तरआत्मा से जुड़ी होती है और कोई भी सरकार या किसी देश की जनता अपने आन्तरिक भावना या राष्ट्र भावना से मजाक नहीं कर सकता । इसलिए भारतीय राष्ट्र नहीं होता, अमेरिकी राष्ट्र नहीं होता, बल्कि भारत राष्ट्र, अमेरिका राष्ट्र, जापान राष्ट्र होता है, भूटान राष्ट्र होता है, भूटानी राष्ट्र नहीं । भूटानी राष्ट्रीयता होती है ।

मधेश बहुत गम्भीर होकर इस महाधिवेशन के सफलता, इसके नेतृत्व चयन तथा मधेश मुक्ति के सवालों पर उसके आने बाले धारणाओं की प्रतीक्षा कर रही है । मगर सवाल यह भी है कि यह महाधिवेशन से मधेश राष्ट्र की पहचान, उसके उपनिवेशिता की खोज तलाश, उसकी परनिर्भरता के कारण और उसके मुक्ति तथा स्वतन्त्रता क्या आयाम ला पायेगी ? मधेश की राजनीति करने बाली पार्र्टी तथा उसके नेतृत्व आजतक नेपाली राजनीति में फँसता क्यों रहा ? आजतक उसने किया क्या कि मधेश राष्ट्र की पहचान बहुत कुछ बिगड़ने के बाद खोज रहा है ? मधेश के हर गली, चौक, गाँव और बस्तियों में नेपाली जनपद, सशस्त्र और सेना लाकर रख देने के वर्षों बाद मधेश राष्ट्र की पहचान करबाने की बात हो रही है । मधेश राष्ट्र की पहचान तो मधेशी को हो गयी है जो तमलोपा करबाने जा रही है । अब बेहतर यह होगा कि वह मधेशी जनता से यह स्पष्ट करें कि मधेश राष्ट्र नेपाल राष्ट्र के ही एक अंग के रूप में देखना चाहता है या यह अलग राष्ट्र ही के रूप को पूर्निनर्धारण करेगी ? क्यूँकि दो राष्ट्र कभी भी एक राष्ट्र में नहीं रह सकते । दो राष्ट्र एक हो सकते हैं, मगर दो राष्ट्र एक ही शासन के तले असंभव होता है ।

मधेश राष्ट्र की बात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मधेश अब एक अलग मुल्क है, जिसकी अपनी ही शासनव्यवस्था होनी चाहिए, उसका अपना संविधान होना चाहिए, अपनी सेना, सुरक्षाकर्मी, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका होनी चाहिए । नहीं तो मधेशी जनता यह बखूबी जानती है कि अपने सत्ता भत्ता के नौकरी में मस्त रहने बाले मधेशी नेताओं के संघर्ष या दया दृष्टि से नहीं, अपितु मधेशियों को छोटे मोटे कोई नौकरी उन्हें मिल भी जाय या गया हो तो वह नेपाली हुकुमतों की दया और भीख पर ही निर्भर रही है । मधेशी जनता के शहादत के बाद नसीब होने बाले सारे अवसरों, आरक्षणों और प्राप्तियों को उन्होंने बेच डाला है ।

मधेशी जनता तो अब यह तय करने के करीब आ चुकी है कि मधेश को मधेश राष्ट्र के नाम पर नेपाल में ही कैद छोड़ मधेशी दल या फिर उसके ही नेताओं को मत देने से अच्छा नेपाली पार्र्टीयाँ और उनके नेतों को ही तन, मन और मत देना बुद्धिमानी होगी ।

मधेश राष्ट्र के पहचान का नारा क्या है यह तमलोपा को बताना पड़ेगा , यह आशंका आम मधेशी जन में व्याप्त है । इस आशंका को तमलोपा अभी जहाँ कहीं भी सुन सकता है । यह आशंका इसलिए भी सबूतपूर्ण सा लगता है कि मधेश राष्ट्र की बात करने बाली पार्र्टी नेपाली शासन व्यवस्था को ही मानने और उसके नियम कानुन के अन्तर्गत ही महाधिवेशन कराने की झंझट क्यूँ मोल ले रहा है । एक तरफ वह नेपाल के संविधान को नहीं मानने की बात करता है, दुसरी तरफ उसी संविधान में संसोधन या उसका पुनर्लेखन की बात करता है तो तीसरे तरफ वह मधेश राष्ट्र का बात भी करता है । आखिर तमलोपा का वास्तविक अड़ान क्या है ? वह मधेशी जनता को देना क्या चाहती है ? मधेश राष्ट्र या नेपाल में ही बन्धुवा मधेश ?

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