सस्ती किन्तु गुणस्तरीय शिक्षा: शुभ प्रभात एकेडमी

स्वामी विवेकानंद की एक महान उक्ति है, ‘हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढेÞ, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैर पर खड़ा हो सके ।’
शिक्षा तो जन्म से मृत्युपर्यन्त तक की एक प्रक्रिया है । जो जीवन भर निरन्तर चलता रहता है । शिक्षा समाज और राष्ट्र की आंखे हैं जिससे हम देख सकते हैं । शिक्षा असल और खराव को पहचान करने का विवेक प्रदान करता है । मानवता, नैतिकता और चरित्र निर्माण का सेतु है शिक्षा । इस महान विचार को हम समझकर उपयोग करें तो स्वच्छ समाज और देश बनने में सहायक सिद्ध हो सकता है । लेकिन अभी का समाज इस विचार से बहुत दूर जा चुका है । वर्तमान में लोग अपनी सन्तति को कितने मंहगे स्कुल में पढाएं इसपर चिन्तित होते हैं । विद्यालयों मे बच्चों को कैसी शिक्षा, संस्कार और व्यवहार दिया जाता है इस पर अभिभावक का ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाता है । समय और बदलते परिस्थिति ने शिक्षा को व्यापार बना कर रख दिया है । कितने विद्यालयों मे बच्चों के भविष्य से ज्यादा बिजनेश बार्गेनिङ को महत्व दी जाती है ।
शिक्षा के उपर राज्य की नीति कैसी होनी चाहिये इसपर शिक्षाविद् और विद्वानो को ध्यान देना बहुत जरुरी है । क्योंकि एक बच्चा का भविष्य देश के भविष्य से जुड़ा हुआ होता है । लेकिन कितने गरीव, दलित के छात्र÷छात्रा पढ़ नहीं पाते हैं । आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वञ्चित हैं और उन परिवारों की हालत दिन ब दिन बदतर होती चली जाती है । अगर किसी गरीब घर का बच्चा शिक्षा के मन्दिर तक नहीं जा सकता है तो शिक्षा को ही उस के पास जाना चाहिये । हर गांव–गांव में निःशुल्क पाठशाला खोलनी चाहिये । राज्य को ऐसी नीति बनानी चाहिये जिससे गरीव विद्यार्थियों को भी शिक्षा मिल सके ।
क्या हमारे देश में सस्ते में गुणस्तरीय शिक्षा देने वाला कोई विद्यालय नहीं हैं ? जिस विद्यालय में बच्चो को कम से कम शुल्क में ज्ञान दिया जाता हो, जो एक अच्छा संस्कार और व्यवहार सिखा सकें । इस विषय पर हिमालिनी नें एक खोज की है ।
क्या आप लोंग यह जानते हैं कि सौ रुपये में ही आप अपने बालबच्चों को पढ़ा सकते हैं ? यह सवाल किसी से पूछा जाए तो जवाब ना ही आएगा । सौ रुपए में पढ़ाई ? यह मुमकिन नहीं है । महंगाई के जमाने में इतने कम रुपए में, यह कैसे हो सकता है ? मुमकिन हीं नहीं नामुमकिन भी है । यह एक बकबास है । हाँं, आप लोगों को बकबास लग सकता है । इस बात पर विश्वास नहीं होगा लेकिन यह एक सुखद सच भी है । आप अपने बालबच्चों को सिर्फ सौ रुपए में हीं पढ़ा सकते हैं । ऐसी शिक्षा कहां पर दी जाती है ? अब, मन मे आप लोगों को जिज्ञासा तो जरुर उठ गयी होगी । सब्र कीजिये मै बता रहा हूँ ।
मनमैजु गाविस, वार्ड न.ं १, नेपालटार स्थित शुभ प्रभात ऐकेडमी में सस्ते में ही गुणस्तर शिक्षा दी जाती है । इस एकेडमी मे तकरीवन ३०० विद्यार्थी और २२÷२४(फुल टाइम÷हाफ टाइम) शिक्षक हैं । इस एकेडमी में शुद्ध अंग्रेजी माध्यम मे पढ़ाई होती है । वि. स. २०६५ मे स्थापित यह एकेडमी एक पवित्र मन्दिर है । विद्या का मन्दिर है । क्योंकि इस एकेडमी में शिक्षा और ज्ञान से वञ्चित छात्राओं के लिए भी ज्ञान की दीप जलता है । सेवामुखी भावना से प्रभात विक्रम थापा ने इस शुभ प्रभात एकेडमी की स्थापना की है । जिससे कितने निम्न वर्ग के छात्रछात्रा लाभान्वित हो रहे हैं ।

प्रभात विक्रम
सबसे पहले मैं शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा हुआ आदमी बिल्कुल नहीं था । समाजसेवा करने की भावना जागृत होने के बाद आंख मे पट्टी बांधकर मैंने प्रवेश किया । प्रवेश होने के बाद कितनी समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा इसकी कोई व्याख्या नहीं । अगर व्याख्या करें तो

 प्रभात विक्रम थापा संस्थापक तथा वरिष्ठ समाजसेवी

प्रभात विक्रम थापा संस्थापक तथा वरिष्ठ समाजसेवी

कथा और रामायण बन जाएगा । शिक्षा के प्रति हमारी सोच उल्टी होने के कारण मुझे इतनी चुनौती का सामना करना पड़ा । शिक्षा व्यापार नहीं दान है, इस दुनिया में सबसे बड़ा दान विद्या का दान होता है । विद्यालय ही मनुष्य के जीवन का विकासोन्मुख, भौतिक और अध्यात्मिक परिवर्तन का माध्यम है । शिक्षा में शुद्ध काम करना पड़ता है । उन्होंने कहा, ‘अगर सामान्य रूप से मैं भी स्कूल सञ्चालन करता तो कोई समस्या नहीं थी ।’ जब मैने स्कूल खोला था तो इस के विरुद्ध मे समाज और अभिभावक भी उतर गए थे ।
संसार मे चलने वाली नयीं प्रविधि से हम विद्यार्थियों को पढाते हैं । उस प्रविधि के विषयों मे मै जानकारी देना चाहता हूँ । छोटे–छोटे बच्चे को दवाव नहीं देना चाहिये क्योंकि दवाव देने से उस के दिमाग पर असर पड़ सकता है । ५ वीं क्लास मे पहँुचने के बाद जव वो पढ़ने लगे तब उसकी परीक्षा में हेरफेर करें । विद्यार्थियों को उस की परीक्षा के विषय में जानकारी ही ना दें । बिना रुटिन के परीक्षा लें । कल दो विषयों मे एक की परीक्षा हो सकता है ऐसा बताने पर वो पढ़कर आएगा । चिटिङ की कोई सम्भावना नहीं रहेगी । विद्यार्थियों मे सर्जनात्मक और रचनात्मक क्षमता का स्वयं विकास होगा ।
सस्ते में भी गुणस्तरीय शिक्षा दी सकती है यह सोच तो साहस और हिम्मत से आती है । इस दुनियां मे मुझे क्या करना है, किस के लिए करना है सब से पहले ये तय करना पड़ता है । समाज में धनाढय लोगों के बच्चों को स्कूल जाते देखा और गरीव के बच्चे को नहीं । दलित के बच्चे को नहीं । इसलिए मैनें निःशुल्क रूप में शिक्षा देने का फैसला किया । समाजसेवा में ही अपनी जीवन को लगाने का निर्णय किया । एक दूसरा प्रसङ्ग में उन्होंने ऐसा कहा, महंगे और सस्ते स्कूल के शिक्षा में कोई अन्तर नहीं होता है । क्या प्राइभेट महंगे स्कूल में ज्यादा फीस देने से ‘ए फार एप्प्ल’ नहीं पढ़ाया जाता है । प्राइभेट स्कूल में दस हजार फीस देने से ‘बी फार बाल’ नहीं पढ़ाया जाता है । सस्ते और सरकारी स्कूलाें में भी ऐसी ही शिक्षा दी जाती है । यह समझने वाली महत्वपूर्ण बात है ।
गुणस्तरीय शिक्षा देने की सरकार की कोई रणनीति ही नहीं है । एसएलसी की परीक्षा कड़ाई के साथ नहीं ली जाती है । अभिभावक को सिर्फ अपने बालबच्चों के प्रतिशत से मतलव है । सरकार को गुणस्तरीय शिक्षा और पास पर ध्यान देना चाहिये ।
अन्त में विद्यार्थियों को इन्सान बनाना चाहिये मशीन नहीं । हमारी एकेडमी विद्यार्थी के धार्मिक, व्यवहारिक और नैतिकवान शिक्षा पर जोर देता है । शिक्षा का व्यापारीकरण किया जा रहा है इसपर मीडिया को आवाज उठाना चाहिये । शिक्षा के वास्तविकता, गुणस्तरीयता पर जन–जन से जनचेतना जगाना होगा । – प्रभात विक्रम थापा संस्थापक तथा वरिष्ठ समाजसेवी

पढ़ाई बहुत अच्छी है । मैने दूसरे स्कूलों में भी पढ़ाई की है । लेकिन इस एकेडमी मे आने के बाद सब से ज्यादा अच्छा लगा । क्योंकि यहां का वातावरण बहुत सुन्दर है । सुबह ६ बजे से शाम ६ बजे तक पढ़ाई होती है । । पैसा भी निःशुल्क है । किसी चीज का अभाव महसूस नहीं होता है । हम विद्यार्थियों का भविष्य कैसे बनेगा ये स्कूल की चाहना है । शिक्षक ट्यालेन्ट और व्यवहारिक हैं । हर समस्या जब भी शेयर कर सकता हूँ । शिक्षक भी बहुत प्यार से पढ़ाते हैं । शिक्षकों और विद्यार्थी के बीच मित्रता का सम्बन्ध है । – रमेश तामाङ, विद्यार्थी, कक्षा–१०

इस स्कूल में पढाई बहुत बढि़या है । शिक्षक हमें रटने से ज्यादा समझा, बुझाकर पढ़ाते हंै । दूसरे स्कूल के विद्यार्थिंयों से हम अच्छा मुकाबला कर सकते हैं । हमारे फाउन्डर सर भी बहुत सर्पोट करते हैं । सभी वर्ग के छात्रा÷छात्राओं को समान रूप से शिक्षा दी जाती है । हर विद्यार्थी के उज्ज्वल भविष्य के लिए यह स्कूल लगा रहता है । यहां पर कोई दिक्कत हैं ऐसा मुझे नहीं लगता । – ऐलिसा थापा, विद्यार्थी, कक्षा–१०

मेरी दीदी एक आर्मी स्कूल में पढ़ाई करती है । ये सच है कि उस स्कूल के वातावरण में अन्तर होगा । लेकिन मुझे इस स्कूल की पढाई ठीक लगती है और मै शुरु से ही इसी स्कूल मे पढ़ती आई हुँ । यहां पर व्यक्ति–व्यक्ति को गाईड किया जाता है । दूसरे स्कूल में तो शिक्षक एकदम कड़े स्वभाव के होते हैं मगर इस स्कूल में अभिभावक की तरह । हम गार्जियन मानते हैं शिक्षकों को । यह स्कूल में बजेट ना होने पर कम्प्युटर ल्याब नहीं है । – सबिना ढकाल, विद्यार्थी, कक्षा–९

मै पहले तरुण स्कूल में था । मुझे बहुत कठिनाई होती थी वहां पर । उस स्कूल में किसी का केयर नहीं किया जाता था । इस स्कूल में आने के बाद शिक्षक भी ख्याल रखते हैं । मुझे बहुत अच्छा वातावरण मिला है । पहले की तुलना में मेरी पढ़ाई बेहतर हो गयी है । मैने इस स्कूल में एक गुरु को पाया है । शिक्षकों जो पढाते हैं वो बाते स्मरण रहती है । कोई समस्या नहीं होती है । सभी लोग अपने जैसे लगते हैं । – सन्तोष डंगोल, विद्यार्थी, कक्षा–९

मै नर्सरी से ही इसी स्कूल में पढ़ती आई हूँ । स्कूल में पहले की अवस्था से काफी बदलाव आया है । पहले ज्यादा शिक्षक और विद्यार्थी भी नहीं होते थे । लेकिन अब शिक्षकों की कमी नहीं है । हमारे स्कूल में भी डान्स सिखाया जाता है । प्राइभेट मंहगे स्कूल की तुलना में हमारी स्कूल की शिक्षा प्रणाली अच्छी है । यह स्कूल में सिर्फ विषय वस्तु का ज्ञान हीं नहीं बल्कि व्यवहार और संस्कार भी सिखाता है । मैं यह स्कूल के पढ़ाई से सन्तुष्ट हूँ । – सुमिना थापा, विद्यार्थी, कक्षा–८

मुझे नेपाली बोलना नहीं आता था । उस वक्त १ क्लास में कोई स्कूल में मुझे दाखिला नहीं ले रहा था । तब ही से मैं इस एकेडमी में आया हूँ । और पढ़ाई करता हूँ । कितना स्कूल सिर्फ पैसे से मतलव रखता है शिक्षा से नहीं । यहां पर किस से कैसे व्यवहार करें ? नैतिक शिक्षा क्या है ? ईश्वर क्या है ? हम कौन हैं ऐसा ज्ञान भी दिया जाता है । जो दूसरे स्कूल में नहीं है । हम असल और मेहनती कैसे बने इस पर हमारे गुरु लगे रहते हैं । – नीरज जैसवाल, विद्यार्थी, कक्षा–८

मै इस स्कूल में स्थापनाकाल से ही पढ़ाता हूँ । और स्कूल की भाइस प्रिन्सिपल का जिम्मेदारी निर्वाह भी करता हूँ । हम शिक्षकों को किताव का ट्रान्सलेटर नहीं बनना चाहिये । इस स्कूल में धार्मिक, नैतिक शिक्षा और आत्मिक शिक्षा का वातावरण सर्जना किया गया है । पार्ट टाइम के रूप में मंै दूसरे स्कूल में भी पढ़ाता हूँ लेकिन इस स्कूल में पढ़ाने के बाद विद्या की मन्दिर में सेवा करने का भावना जागृत होती है । प्रभात सर की सेवामुखी भावना से अभिप्रेरित हूँ । वर्तमान समय में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच मित्रता की भावना होनी जरुरी है । विद्यार्थी अपनी समस्या किसी भी समय शिक्षक को शेयर कर सकें ऐसा वातावरण विद्यालय में होना आवश्यक है । इस स्कूल से पास हो कर गए विद्यार्थी अब तक हम शिक्षकों से सलाह–मशवरा करने आता है । इस स्कूल की यह एक विशेषता भी है । प्रभात सर के इस यज्ञ में हम सहभागी हंै । सेवा करने की भावना से जुड़ा हूँ । हांंंँ, ये बात सच है कि यहांंँ पर भौतिक पूर्वाधार की समस्या है । और इतने अभाव होने के बाबजुद भी हम गुणस्तरीय शिक्षा दे रहें हैं । यह स्कूल का आय स्रोत नहीं । विद्यालयों को सहयोग करने के लिए अबतक कोई आगे नहीं आया है । सरकार और विभिन्न दातृ निकाय द्वारा शिक्षा पर बजट आनेपर भी किसी का सहयोग प्राप्त नहीं हो रहा है । – प्रजुन ज· बस्नेत, शिक्षक

मै इस स्कूल में ६ से १० वी तक पढाता हूँ । अंग्रेजी विषय में मै मास्टर कर चुका हूँ । इस स्कूल में अंग्रेजी और सामाजिक शिक्षा पढ़ाता हूँ । यहां पर विद्यार्थियों को शिक्षा पढ़ाने पर मुझे एक तरह की सन्तुष्टि मिलती है । मैं एक बात आप को बताना चाहता हूँ । समस्या तो हर जगह होती है । इस स्कूल में भौतिक पूर्वाधार की समस्या है । सरकार ने शिक्षा क्षेत्र के लिए १७ प्रतिशत बजट निकासा करने पर भी कोई सुनवाई नहीं हुई है । जिला शिक्षा अधिकारी समक्ष स्कूल की शैक्षिक उपलब्धि, टिचिङ स्केल, स्टैन्डर्ड बताने पर भी किसी प्रकार का प्रतिक्रिया न आना एक चुनौती हैं । शिक्षक पर्याप्त हंै, हम सभी अनुभवी हैं । दूसरे स्कूल से तुलनात्मक रूप में बेहतर है । मंै प्रभात सर की सेवामुखी भावना से प्रभावित और प्रेरित हूँ । ज्ञान का ज्योति फैलाने का, मध्यमवर्र्गीय विद्यार्थियों को शिक्षित और सुसभ्य बनाने का प्रभात सर का उद्देश्य है । उस उद्देश्य प्राप्ति के लिए मै एक सहयोगी भी हूँ । प्लेटो ने कहा था, शिक्षक ऐसा होना चाहिये जो विद्यार्थी की स्वच्छता में डूब सकें । – बासु देवकोटा, शिक्षक

बासु देवकोटा
शिक्षक

मै छोटे–छोटे बच्चों को नर्सरी में पढ़ाता हूँ । ग्रेड शिक्षिका हूँ । मेरी योग्यता इन्टरमीडियट है । विद्यार्थी और शिक्षक बीच का सम्बन्ध नाखुन और माँस जैसा होना चाहिये । जिस तरह से अपने सन्तान को प्यार से पढ़ाता हूँ उसी तरह सभी बच्चों को प्यार से ही शिक्षा बांटती हूँ । नर्सरी में बच्चों को पढ़ाना कोई मामुली काम नहीं है । बच्चो को क्रोध से नफरत होती है उसे प्यार से ही सिखाना पड़ता है । मंै सात साल से इस स्कूल में शिक्षण करती आई हूँ । अब तक अभिभावकों से कोई भी कम्पलेन नहीं आया है । – कविता चौलागाई, शिक्षिका

सबसे पहले इस स्कूल की शिक्षण पद्धति मुझे पसन्द है । मै पांच सालों से इसी स्कूल में शिक्षण करती आई हूँ । दुसरे स्कूल जैसा यह स्कूल विल्कुल नहीं हैं । गरीव, दलित जेहेन्दार विद्र्यािर्थयों को निःशुल्क शिक्षा दिया जाता है । सभी विद्यार्थी यह स्कूल में एक समान है । किसी जाति का हो चाहे वर्ण का हो । यह स्कूल मुझे एक पवित्र मन्दिर जैसा लगता है । यहां पर कुछ ज्यादा समस्या नहीं है । समस्याओं को हमारी स्कूल की टीम बहुत अच्छी तरह से समाधान कर लेता है । मुझे कोई दिक्कत नहीं है । – सरस्वती अधिकारी, शिक्षिका

एकेडमी के विद्यार्थी बने गुरु
एसएलसी पास करके एसएलसी देने वाले विद्यार्थी कों पढ़ाना आप को एक मजाक लग सकता है ।
हां, ये सभी विद्यार्थी से सम्भव नहीं हो सकता है । लेकिन शुभ प्रभात एकेडमी के विद्यार्थी ने यह सावित कर दिया है । वह विद्यार्थी है, सुशिल विष्ट । जिस ने एसएलसी परीक्षा देने के बाद ही १० वीं में पढाना शुरु कर दिया । शुभ प्रभात एकेडमी के विद्यार्थी शिक्षक बनने के बाद हिमालिनी से कहा, ‘ये आंट और हिम्मत प्रभात सर की है, जिन्होंनें हमें ऐसी गुणस्तरीय शिक्षा दी ।’ शुरुआत में मुझे कठिनाई हुई थी । लेकिन कुछ महीनों के बाद मुझे आसान लगने लगा । शिक्षक विष्ट नें खुद त्रिचन्द्र कालेज में पढ़ने की जानकारी दी । शुरुवात के दिन याद करते हुए, प्रभात सर ने मुझे कहा था अगर तुम यहांँ पर पढ़ी बातों को प्रयोग ना कर सकें तो तुम भूल जाओगे । इसलिए तुम्हे पढ़ाना जरुरी है ।
गुरु सुशील के साथ बैठी थी चेली संगिता वि.क. । एसएलसी में ८५.६५ प्रतिशत अंक प्राप्त की है संगिता ने । संगिता कहती है, मेरी सफलता में गुरु सुशिल सर का प्रयास है । उन्होने मुझे नहीं पढ़ाया होता तो मै इस अवस्था में बिल्कुल नहीं होती । मै भी १० वीं तक का क्लास ले रही हूँ । शिक्षण करना शुरु में बहुत चुनौतीपूर्ण लगता था लेकिन अब आसान महसुस कर रही हूँ । आदत लग जाने के बाद सबकुछ ठीक हो जाती है । इस स्कूल में निःशुल्क पढाया जाने पर भी दातृ निकायों से सहयोग प्राप्त न होने पर दुःख लगती है । चेली संगिता की बोली में अपनी बात जोड़ते हुए गुरु स्ुशिल ने कहा, काठमाडौं में यह स्कूल निशुल्क शिक्षा देता है लेकिन अबतक सरकार की नजर में नहीं आया है । धीरे–धीरे सम्बन्धित निकाय तक पहुँचने पर आशावादी हूँ । बिना शुल्क का शिक्षा कैसा होगा इसपर लोगों की धारणा नकारात्मक है । इसपर समाज की सकारात्मक सोंच बनानी होगी ।

मेरा आशिर्वाद है
बेटा के किए काम को ठीक ना कहना कोई सवाल पैदा ही नहीं होता है । परोपकार ही पुण्य है । पुण्य धर्म खर्च करने से नहीं, शरीर मजबूत होने से नही होता है इस के लिए हृदय स्वच्छ और साफ होना चाहिये । मानव सेवा प्रति की भावना हृदय में जागृत होनी चाहिये । फूल कभी नहीं कहता है की यह मेरी खुशबु है । हवा के माध्यम से लोगों को पता चलता है पूmलों की महक । ठीक ऐसे ही अच्छे कर्म करने से अच्छाई चारो ओर फैलता है । दुःख और सुख तो हमारे साथी हैं । घटा बढा तो होता रहता है । अतीत की ओर देखा जाए तो परोपकार मे ही जीवन व्यतीत किया था । मैने आर्मी में ३२ साल नोकरी की । सभी से दयाभाव से ही पेश आया हूँ । आदमी को अपने विचार में चलना देना चाहिये । जैसे की पानी को रोकने से दुर्गन्धित हो जाता है और बहने देने से कञ्चन बन जाता है । बेटे प्रभात को शुभ कार्य में दिल आ गया है तो मै क्यों रोकुं । अपने बेटे के काम से मैं बहुत प्रसन्न हूँ । जब मै रास्ते में होता हूँ तब लोग कहते हंै, वो देखो प्रभात सर के पिता । स्कूल में पढने से मेरी बच्चा बहुत खुश है ऐसा सुनने पर बहुत आनन्द लगता है । सबसे बड़ी बात होती है मनुष्य में दया, माया, क्षमा और करुणा । बिना पैसा से गरीव निमुखा पढ़कर उद्योग व्यापार करने में सक्षम है तो मै गलत कैसे कहुँ । सलाना रूप में इस स्कूल के विद्यार्थी जिला में उत्कृष्ट होते हैं । मै ऐसे काम को दाद देता हूँ । प्रभात को मेरा पूरा आशिर्वाद है । भगवान साथ और सहयोग देते रहें ऐसी कामना है । – धर्म बहादुर थापा, पिता

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: