सहने का माद्दा !

वसन्तकुमार सिग्देल
शीत, ताप, वषर्ात !
प्रकृति का हर घात प्रतिघात !
सहलेता है नेपाली
सहने का अजीव माद्दा रखता है, नेपाली !
पल-पल जीने के लिए संर्घष्ा करता है !
और भ्रष्ट नेतागण द्वारा देश की होती वर्वादी
देखकर भीतर-भीतर डरता है, कुढÞता है !
फिर भी कुछ नकर सकने की पीडÞा पी जाता है
सहलेता है नेपाली !
सहने का अजीव माद्दा रखता है नेपाली !
राष्ट्रिय सहमति नहीं जुट रही !
पार्टियाँ बार-बार फूट रही !
अन्य देश आत्मोन्नति के पथ पर !
हम दिनों दिन अवनति के गर्त पर !
कल इस देश का क्या होगा –
यह सब सोचता और सहना होता है !
कहना ही पडÞे तो
दबी-दबी जवान से कहना होता है !
मगर आराम से सब सहलेता है नेपाली
सहने का अजीव माद्दा रखता है नेपाली !
-कवि वरिष्ठ अध्ययापक भी हैं)

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