सहयोग राशि का उचित सदुपयोग हो

Lila Nath Gautam

लीलानाथ गौतम

महाभूकम्प से सृजित त्रास से धीरे–धीरे जनजीवन सामान्य होता जा रहा है । तब भी परिवार के सदस्यों को गंवाने वालों की पीड़ा यथावत हैं । रहने का वास और खाने का गाँस गंवाने वालों की चिन्ता भी जैसी की तैसी ही है । लेकिन कब तक हम इस तरह की चिन्ता में बैठे रहेंगे ? भूकम्प के कारण सृजित पीड़ा को मन में दबा कर भी हम लोगों को बाँकी जीवन जीना है । जितना भी कष्ट भुगतना पड़े, कोई भी अपने जीवन को मृत्यु के मुँह में जबरदस्ती धकेलना नहीं चाहते । इसीलिए अब विगत के नकारात्मक चिन्तन में नहीं, विनाश के बाद होने वाले निर्माण में अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।
भूकम्प ने ज्यादा ही धन और जन का नुकसान किया है । भूकम्प के कारण जिन लोगों को अपना जीवन समाप्त करना पड़ा, वे लोग कभी भी वापस नहीं हो सकते । लेकिन ध्वस्त भौतिक संरचना का हम अवश्य ही पुन निर्माण कर सकते हैं । हाँ, इसके लिए समय लग सकता है । इसीलिए भूकम्प द्वारा हुए विनाश को याद करके चिन्तत होने के बजाय भविष्य में निर्माण होने वाला नई संरचना और विकास की योजना बनाना आज की आवश्यकता है, इसके चलते नया नेपाल की परिकल्पना करना ही आज का उत्तम विकल्प हो सकता है ।
राजनीतिक रूप में नया नेपाल का बहस बहुत पहले से जारी है । राज्य पुनर्संरचना का बहस अभी तक दिशा प्राप्त नहीं कर पा रहा है । अब तो भूकम्प द्वारा हुई क्षति को भी राज्य पुनर्संरचना की बहस के साथ–साथ आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी आई है ।
देश को संघीय संरचना में ले जाने की तैयारी हो रही है । जहाँ, कुछ ज्यादा ही प्रशासनिक संरचना और भवन की आवश्यकता होती है । विगत के प्रशासनिक संरचना और भवन के कारण नयाँ भवन निर्माण करते वक्त विवाद हो सकता था । लेकिन अब पुरानी भौतिक संरचना बिगड़ गयी है । इसीलिए भूकम्प ने विनाश किया गया सरकारी भौतिक संरचना को अब संघीय राज्य की अवधारणा और आवश्यकता के अनुसार निर्माण करना चाहिए । यह हमारे लिए नया अवसर भी है । सर्वसाधारण के मकान के सवाल में भी यही बात लागू होती है । एकीकृत आवास की बहस लम्बे समय से चल रही है । उस का प्रयोग कुछ शहर में प्रारम्भिक चरण में ही है । लेकिन प्रभावकारी नहीं हो पाया है । गांव में तो एकीकृत आवास का प्रयोग शुरु भी नहीं हुआ है । अब एकीकृत आवास सम्बन्धी अवधारणा को कार्यान्वयन करने का मौका भी यही है । शुरुआत करने का अवसर सरकार को ही प्राप्त हो रहा है । यह सम्भव भी है । क्योंकि भूकम्प द्वारा हुई क्षति को मध्यनजर करते हुए देश–विदेश से जितना सहयोग राशि प्राप्त हो रहा है, उसका उचित व्यवस्थापन और कार्यान्वयन हो सके तो हम सच में ही नयाँ नेपाल निर्माण का जग खड़ा कर सकते है । बस, उसके लिए राजनीतिक नेतृत्व में ईमानदारी और साहस चाहिए । सवाल यह है कि इस तरह का राजनीतिक नेतृत्व हम कब प्राप्त कर पाएंगे ?
भूकम्प पीडि़त के लिए सहयोग करेवाले व्यक्ति, संस्था तथा राष्ट्रों की संख्या सौ से भी ज्यादा हो चुकी हैं । सहयोगी देशों की संख्या भी तीन दर्जन से ज्यादा है । सहयोग राशि की घोषणा बिना ही सहयोग जारी रखनेवाले राष्ट्र दर्जनों हैं । भारत इस का उदाहरण है । नेपाल की भूकम्प पीडि़त जनता के लिए सबसे पहले सहयोग करने वाला देश ही भारत है । अभी तक उसके द्वारा करोड़ों का सहयोग हो चुका है । लेकिन कितनी सहयोग सामग्री तथा धनराशि राहत के लिए दी जाएगी ? इस सम्बन्ध में भारत ने औपचारिक रूप में कुछ नहीं कहा है । सम्भावना है– भारत द्वारा निकट भविष्य में ही इस सम्बन्ध में औपचारिक घोषणा हो जाएगी । भारत की तरह ही कतार, साउदी अरेबिया, श्रीलंका, बंगलादेश, पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया आदि देशों ने भी सहयोग के लिए प्रतिवद्वता जताई है । लेकिन इन देशों ने भी रकम राशि का घोषणा नहीं की है । सहयोग के लिए प्रतिवद्धता व्यक्त करनेवाले दातृ निकाय दिन प्रतिदिन बढ़ रहे हंै । इसीलिए हम कह सकते है, ध्वस्त भौतिक संरचना निर्माण के लिए आर्थिक संकट नहीं होगा । इस का सही व्यवस्थापन और कार्यान्वयन ही आज की प्रमुख चुनौती है ।
सरकार का मानना है कि ध्वस्त भौतिक संरचना को पुनर्निमाण के लिए दो खर्ब का बजेट आवश्यक है । यह तो जमा हो ही जाएगा । लेकिन २ खर्ब जमा करना ही बड़ी बात नहीं है । इस का सही सदुपयोग हो पाएगा या नहीं, चिन्ता का विषय यही है । अगर सच में ही दाताओं से प्राप्त राशि का सही सदुपयोग हो जाए तो हर भूकम्प पीडित का पक्की महल निर्माण हो सकता है । इसके लिए सत्ता में भिजन, साहस और ईमानदारी की जरुरत है । वर्तमान प्रधानमन्त्री सुशील कोइराला में तो यह नहीं दिखाई देता ।
देश–विदेश से प्राप्त सहयोग सामग्री को उचित व्यवस्थापन और उपयोग करना तो दूर की बात, यहाँ तो पीडित के लिए दिया गया राहत सामग्री ‘त्रिपाल’ भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता ही नगद लेकर बेचते हैं । यह समाचार कुछ ही दिन पहले सार्वजनिक हुआ था । ऐसी भ्रष्ट राजनीतिक संस्कारवाले देश में विदेशी मित्र जितना भी सहयोग करें, सर्वसाधारण जनता उससे लाभाविन्त नहीं हो पाएंगे । स्थानीय तह में सहयोग करने वालों की सूची बहुत लम्बी है । स्थानीय तह के व्यक्ति, संघ–संस्था, कलाकर्मी, खिलाड़ी द्वारा किए गए सहयोग राशि तथा राहत सामग्री की तो गणना ही नहीं हो रही है । स्थानीय स्तर में संकलित राशि और राहत सामग्री को एकमुष्ट मूल्यांकन किया जाए तो वह भी अरबों का हो सकता है । भूकम्प के एक हफ्ता तक सरकारी निकाय जनता में नहीं पहुँच पाया है । ऐसी सरकारी संयन्त्र और व्यवस्थापन से जनता कैसे आशावादी रह सकती हैं ?
मजदूरी करके दैनिकी चलानेवाले मजदूरों ने भी भूकम्प पीडि़त को सहयोग किया है । इस का उदाहरण है, गुलरिया– पण्डितपुर के स्थानीय बासिन्दा । उन लोगों ने अपनी ढुकुटी में रहे, गेहू (जो दैनिक मजदूरी से जमा किया गया था) बेचकर ६७ हजार १ सय ७१ रुपैयाँ जम्मा किया और भूकम्प पीडित को दिया । लेकिन विडम्बना, गरीब देश के अमीर मन्त्री और नेता कहलाने वाले हमारे राजनीतिक लोगों ने अभी तक ऐसी घोषणा नहीं की है । संस्थागत रूप में पार्टी तथा सभासदों द्वारा कुछ रकम पीडि़तों के नाम कर देना कोई बड़ी बात नहीं है । हाँ कुछ नेता ने थोड़ा ही सही, व्यक्तिगत रूप में कुछ सहयोग की घोषणा की है ।
देश की आवश्यकता और क्षमता से ६०१ सभासद हमारे यहाँ है । लेकिन देश की जनता संकट में रहते वक्त यह ६०१ जनप्रतिनिधि कहाँ छुप गए, पता नहीं । भूकम्प के ६ घण्टा भी नहीं हुआ था, राहत सामग्री जुटने लगी थी । लेकिन नेपाल सरकार की कमजोर व्यवस्थापन के कारण, वो सामग्री समय में पीडि़त तक नहीं पहुँच पाया । सिर्फ भाषणबाजी में पोख्त हमारे नेताओं की कमजोर व्यवस्थापन के कारण ही जनता को राहत से वञ्चित रहना पड़ा । ६०१ में मुश्किल से १० प्रतिशत सभासद ही जनता के बीच दिखाई पडेÞ । जब नेताओं की चौतर्फी आलोचना शुरु होने लगी तब नेता लोग बाहर आने लगे, समय गुजरने के बाद !
मृतक के परिवार के लिए तत्काल १ लाख राहत देने का निर्णय नेपाल सरकार ने किया है । यह राशि तो नेपाल को सहयोग करने वाला एक ही दातृ निकाय भर सकता है । ध्वस्त हुए बहुत ग्रामीण बस्ती को ऐसे ही कुछ दाताओं ने पुननिर्माण करने का वचन दिया है । इसीलिए पीडि़त को कुछ रुपया देने से दाताओं से प्राप्त रकम खत्म होने वाला भी नहीं है । प्राप्त सहयोग राशि का सदुपयोग कर गिरी हुई सरकारी संरचना ही नहीं, विकास निर्माण के अन्य काम भी हो सकता है । दुःख की बात है– हमारे यहाँ, सरकार द्वारा घोषित करोड़ों का वार्षिक बजट तो कार्यान्वयन नहीं होने के कारण फ्रिज हो जाता है । ऐसी असक्षम राजनीतिक नेतृत्व और कर्मचारीतन्त्र द्वारा विदेशी सहयोग राशि का सही सदुपयोग कैसे हो पाएगा ? चिन्ता का विषय यही है ।

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