सांंस्कृतिक जागरण की आहट और नेपाल

कुमार सच्चिदानन्द :बैशाख १४ गते, मंगलवार की शाम वीरगंज के घड़ीहर्वा पोखरी में गंगा–आरती का आयोजन किया गया । यह आयोजन हरिहरनाथ–मुक्तिनाथ यात्रा समिति के द्वारा आयोजन किया गया । सीमित समय में सीमित लोगों की सूचना के बावजूद इसमें लोगों की उल्लेखनीय उपस्थिति थी और समस्त आरती के समय ऐसा लग रहा था मानो भक्ति और आध्यात्मिकता का सैलाब यहाँ उमड़ रहा है । भंगिमा, संगीत, प्रकाश और सुगंधित धूम्र के इस समन्वय में ऐसा लग रहा था कि हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना किसी दिव्य अनुभूति में अवगाहन कर हमें अलौकिक आनन्द की ओर ले जा रही है । जब यह आरती खत्म हुई तो समस्त दर्शक और भक्तजन अभिभूत थे और आयोजन समीति से इस तरह के आयोजन की निरन्तरता की माँग कर रहे थे । यह माँग उनकी पूरी हो या न हो, यह एक अलग बात है मगर इस बात का संकेत है कि हमारी धार्मिक–सांस्कृतिक चेतना अभी मरी नहीं है । यह आरती वीरगंज के लिए चाहे नयी क्यों नहीं है मगर जनकपुर जैसे धर्मक्षेत्र में इसका साप्ताहिक आयोजन निरन्तरता प्राप्त कर रहा है और लोगों की आस्थापूर्ण उपस्थिति में भी कमी नहीं आ रही है । इसका मतलब साफ है कि एक धार्मिक–सांस्कृतिक पुनर्जागरण की जमीन पर हम खड़े हैं । एक असाधारण और सक्षम व्यक्ति की प्रतीक्षा है जो अन्दर की वातहीनता और उमस को आँधी का स्वरूप दे सके ।
‘पुनर्जागरण’ या ‘रिनैंसा’ यूरोप में मध्यकाल में आए एक सांस्कृतिक आन्दोलन को कहते हैं । यह आन्दोलन इटली से आरम्भ होकर पूरे यूरोप में फैला । इस सांस्कृतिक आन्दोलन में परम्परागत स्रोतों से ज्ञानार्जन ने जोर पकड़ा । इससे शिक्षा के क्षेत्र में लोगों को नवीन दृष्टि मिली जिससे संसार की चीजों को जानने–समझने के दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन आया । इसके परिणामस्वरूप यूरोप में १६५० से १७८० ई. तक के काल को ज्ञानोदय का युग कहते हैं । इस अवधि में पश्चिमी यूरोप के सांस्कृतिक एवं बौद्धिक वर्ग ने परम्परा से हटकर तर्क, विश्लेषण तथा वैयक्तिक स्वातंत्र्य पर जोर दिया । आज जब सांस्कृतिक पुनर्जागरण की बात की जाती है तो इसका मतलब परम्परा की इन चीजों से थोड़ा अलग हटकर अपने अतीत और वर्तमान को समझने की बात आती है । दक्षिण एशिया की संस्कृति का वैदिक युग से ही विश्व पटल पर अपना महत्व रहा है । आर्थिक सम्पदा की प्रचुरता के कारण विदेशी आक्रमणकारियों के लिए यह प्रमुख आकर्षण का केन्द्र रहा है जिसके कारण न केवल हमारी आर्थिक शक्तियों का क्षय हुआ बल्कि हमारी सांस्कृतिक अस्मिता पर भी गहरी चोटें आईं और हमारा पारम्परिक वाङ्मय का भी नाश हुआ । इन सबसे अलग वैचारिक रूप से भी इस स्थिति ने हमें पंगु बनाया और अपनी ज्ञान–गरिमा को भूलकर हमने दूसरे के मूल्यों को महत्व दिया । इसका परिणाम यह हुआ कि आज हम सांस्कृतिक पहचानहीनता की दौर से गुजर रहे हैं और हमारी राजनीति तथा समाज के क्षेत्र में जो अवमूल्यन की अवस्था है उसे इसी का परिणाम माना जा सकता है ।
समय के वर्तमान सन्दर्भ में ‘धर्म’ और ‘संस्कृति’ संश्लिष्ठ अर्थ देते हैं और हमारी स्थिति यह है कि हम न तो पूर्ण धार्मिक होने का दावा कर पाते और न ही सांस्कृतिक संस्कारों से परिपूर्ण होने की बात ही स्वीकार कर पाते । आधुनिकता और नयापन की चकाचौंध में धर्म और संस्कृति महज मजाक और उपेक्षा के विषय बनकर रह गए हैं । आज धार्मिक व्यक्तित्वों को लोग वाह्याडंबर के पोषक और और कट्टरपंथी कहने से नहीं हिचकते और संस्कृति को पुराने जमाने की थाती कहने वालों की भी कमी नहीं है । ऐसा नहीं है कि विश्व के सभी धर्मानुयायियों के साथ ऐसा होता है । हर धर्म का व्यक्ति अपने धर्म का सम्मान करता है, यथासाध्य उसका आचरण भी करता है और उसके धार्मिक विचारों पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करनेवालों के प्रति आलोचना प्रबल भी होता है तथा प्रतिकार भी करता है । इस बात की सबसे जटिल समस्या सनातन धर्मावलम्बियों के साथ है ।
हम जानते हैं कि विश्व के समस्त धर्म प्रवर्तित हैं । सिर्फ सनातन धर्म एक ऐसा धर्म है जो विकसित धर्म है और शायद विश्व का सबसे प्राचीन धर्म भी यही है । इसे निर्देशित करने के लिए वेद और उपनिषद से लेकर मध्यकाल के भक्त्यात्मक साहित्य भी हैं । इस धर्म–चिन्तन में लोचकता अधिक होने के कारण यहाँ सम्प्रदाय भी अधिक हैं और धर्मपंथ भी अनेक हैं । यही कारण है कि सर्वाधिक आक्रमण भी सनातन धर्म पर हुआ । पाश्चात्य शिक्षा पद्धति के प्रभावों के कारण भारतीय महाद्वीप में अपने धर्म को सम्मान न करने की जो भावना विकसित हुई है उसी का परिणाम है कि आज हम स्वयं को धार्मिक कहने में शर्म महसूस करते हैं और समाज तथा राजनीति में उच्च स्थान प्राप्त करने के बाद धर्म विरोधी बातें कहकर स्वयं को प्रगतिशील समझते हैं । सही मायने में यह अगर प्रगतिशीलता है तो ऐसी प्रगतिशीलता किसी भी व्यीक्त या समाज के लिए विधायी नहीं हो सकती क्योंकि धर्म भी एक प्रकार का कानून है और यह हमें एक संस्कारयुक्त जमीन देता है । इस जमीन पर खड़े होकर हम सहिष्णुता का उद्घोष भी कर सकते हैं और सर्वधर्म समभाव की भावना का प्रसार कर मानवता के कल्याण की कामना भी कर सकते हैं । यह बात सभी धर्मों पर लागू होती है ।
चाहे भारत हो या नेपाल— सनातन धर्म की दृष्टि से ये दोनों देश संसार के भूगोल में महत्वपूर्ण हैं । क्योंकि यहाँ की अधिकांश जनता हिन्दू है और सनातन धर्म में विश्वास करती हैं । यह भी सच है कि यहाँ अन्य धर्मों के लोग भी उतनी ही सहृदयता से रहते हैं । लेकिन धर्मांतरण का सबसे अधिक कुप्रभाव हिन्दू धर्मावलंबियों पर पड़ रहा है । विभिन्न धर्मों की एजेंसियाँ इस काम में सक्रिय हैं । इसी का परिणाम है कि अनेक हिन्दूवादी संगठन इस मिशन को रोकने की दिशा में भी आज सक्रिय हैं । लेकिन हमारी विशेषता यह है कि हम एक को तो कट्टरपंथी कहते हैं मगर दूसरे की आलोचना करने के लिए तैयार नहीं होते । इसका कारण है कि इस अवसर का उपयोग भी हम अल्पकालीन राजनैतिक स्वार्थ के लिए करते हैं जिसके कारण सच्चाई से हमारा रिश्ता टूटता जाता है । इसका परिणाम यह है कि एक प्रकार की धार्मिक उच्छृंखलता समाज का आदर्श बनती जाती है जो धर्म की खोखली जमीन का संदेश जग के समक्ष प्रस्तुत करती है । यही प्रवृत्ति धर्मांतरण का सबसे आसान लक्ष्य इस धर्म को बनाती है । सही अर्थ में अपने धर्म का सम्मान करना दूसरे धर्म का अपमान नहीं है । इससे किसी की सहिष्णुता की भावना पर प्रश्नचिह्न खड़ा नहीं होता । दूसरा सच यह है कि जब तक हम स्वयं का सम्मान नहीं कर सकते तब तक दूसरे का सम्मान करने की हमारी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती और ऐसे लोगों में सम्मान की जो भावना दिखलाई देती है उसे हम महज चाटुकारिता मात्र कह सकते हैं ।
इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि भारत और नेपाल के वैचारिक और बौद्धिक आकाश में प्रगतिशील विचारों का दबदबा रहा है । लोकतंत्र आया । विभिन्न दलों का शासन भी हुआ लेकिन इस वैचारिक किले को तोड़ने का प्रयास किसी के द्वारा नहीं हुआ और प्रगतिशीलता के नाम पर आज भी ये विचार यहाँ लहरें ले रही हैं । लेकिन यह जो प्रगतिशीलता है उसे हम किसी रूप में अपनी मिट्टी की उपज और सांस्कृतिक ताने–बाने से बुना हुआ नहीं मान सकते । हम जानते हैं कि इस विचार का जन्म यूरोपीय देशों में हुआ और इस आधार पर शासन की स्थापना भी उन्हीं देशों में हुई । यह भी सच है राजनैतिक रूप में इसका सबसे अधिक विरोध भी यूरोपीय देशों के द्वारा ही हुआ । वास्तव में यह एक अर्थराजनैतिक चिन्तन था । साम्यवादी अर्थतंत्र में लोकतंत्र की चासनी मिलाकर समाजवाद की एक परिकल्पना राजनीति के क्षेत्र में स्थापित की गई और इसके पुरोधा भारत में जवाहरलाल नेहरू और नेपाल में वीपी कोइराला को माना जा सकता है । घोषित तौर पर जो भी वामपंथी दल इन दोनों देशों की राजनीति में सक्रिय हैं उनके नेताओं की तो यह स्थिति रही है कि साम्यवादी शासन को कार्यरूप देने वाले देशों में अगर धूप उगती है तो छाता इन दोनों देशों में ओढ़े जाते हैं । सही बात यह है कि स्वदेशी की बात ये करते हैं और विदेशी चिंतन से संचालित होते हैं । लेकिन यह भी सच है कि जब तक ये देश राजनीतिक चिंतन की मौलिकता को नहीं अपनाएँगे तब तक इनका कल्याण महज सपना बना रहेगा ।
इस सम्बन्ध में भारत के साथ एक सकारात्मक बात तो यह हुई है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी भारत को एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला जो चिंतन की मौलिकता में विश्वास करते हैं । लेकिन नेपाल में इस ढंग के नेतृत्व का अभाव है । यह सच है कि आज भाजपा के क्रियाकलापों की आलोचना करने वालों की कमी नहीं । लेकिन यह भी सच है कि परम्परागत भारतीय शासक दल और तथाकथित समाजवादियों को इनसे कठिन चुनौती मिल रही है और राजनैतिक दृष्टि से एक संतुलन की अवस्था में वे हैं । लेकिन इस दृष्टि से नेपाल अभी भी अधूरा है । यहाँ की राजनीति में वामपंथी दलों की बहुलता है । नेपाली काँग्रेस जैसी पार्टी साम्यवाद की आर्थिक नीतियों को स्वीकार कर और उसमें लोकतंत्र का समाहार कर समाजवादी आवरण धारण किए हुई है । यहाँ के वामपथी दल भी लोकतंत्र को स्वीकार कर लगभग उसी जमीन पर आ चुके हैं जहाँ काँग्रेस खड़ी है । इसलिए सारी पार्टियाँ वैचारिक रूप से लगभग समान भूमि पर स्थापित हैं । ऐसा नहीं है कि यहाँ दक्षिणपंथी पार्टियाँ नहीं हैं । लेकिन इनका आधार अत्यन्त छिन्न है । वैचारिक प्रतिबद्धता का इनमें सर्वथा अभाव और अवसरवादिता की प्रबलता है । यही कारण है कि जनता इसे गम्भीरता से नहीं लेती । लेकिन यह स्थिति सर्वदा रहेगी इस बात को नहीं माना जा सकता । क्योंकि पिछले दिनों धर्म के नाम पर जो विभिन्न आन्दोलन यहाँ हुए हैं वे इस बात का संकेत दे रहे हैं कि निकट भविष्य में यह देश भी धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजरेगा । इस दृष्टि से भारत अभी प्रसव वेदना के दौर से गुजर रहा है । लेखकों और कलाकारों द्वारा पुरस्कार–सम्मान लौटाने की घटना से लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए विवाद की घटनाओं को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है । कहने के लिए तो यह भी कहा जा सकता है कि एक तरह से पूर्ववर्ती वैचारिक किला धीरे–धीरे झटका खा रहा है ।
ऐसा नहीं है कि गरीबों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की पुराने जमाने में कमी थी, ऐसा भी नहीं है कि समाज की कुप्रथाओं और अंधविश्वासो. को दूर करने की दिशा में अतीत में लोगों ने काम ही नहीं किया । अनेक सामाजिक कुप्रथाओं का अन्त और अंधविश्वासों के विरोध में इतिहास में जो सामाजिक–सांस्कृतिक क्रान्तियाँ हुई हैं उनके पीछे लोगों की प्रगतिशील चेतना रही है । मगर यह प्रगतिशीलता किसी वैचारिक आन्दोलन से जुड़ी नहीं थी । कहने का मतलब यह कि जनकल्याण के प्रयास हर युग और हर काल में होते रहे हैं । महत्व इस बात का है कि मनुष्य में सांस्कृतिक चेतना कितनी है ? यहाँ यह भी साफ किया जाना आवश्यक है कि वास्तव में संस्कृति की अवधारणा क्या है ? यद्यपि ‘सभ्यता’ और ‘संस्कृति’ ऐसा विषय है जिसकी व्यापक गवेषणा समाजशास्त्र के अन्तर्गत आती है । लेकिन सामान्य रूप में इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जनकल्याण की भावना से परिचालित होकर जो भी आविष्कार या अनुसंधान होते हैं वे हमारी संस्कृति के अन्तर्गत आते है या वह व्यक्ति जो आविष्कारक या अनुसंधानकर्ता है उसे संस्कृत व्यक्ति के अन्तर्गत गणित किया जा सकता है । यही बात कला–संगीत आदि के क्षेत्राें में भी लागू होती है । इस तरह कहा जा सकता है कि सभ्यता के इतिहास में आदि से लेकर अब तक जो अनुसंधान हुए हैं और जिसने मानव जीवन को सुखमय और शांतिमय बनाने की कोशिश की है वे सभी हमारी सांस्कृतिक चेतना के परिणाम हैं । यह बात अलग है कि अगली पीढ़ी को इस तरह के अनुसंधानों और आविष्कारों का लाभ यूँ ही मिल जाता और वे अतीत के लोगों की तुलना में अधिक अनुसंधान और आविष्कारों का प्रयोग करते हैं मगर ऐसे प्रयोगकर्ता को हम संस्कृत व्यक्ति नहीं बल्कि सभ्य व्यक्ति या समाज कह सकते हैं । सारांश के तौर पर कहा जा सकता है कि अतीत की ज्ञान–गरिमा का उपयोग करना हमारी सभ्यता का प्रमाण है और इन आधारों पर कुछ नवीन का प्रयास करना हमारी सांस्कृतिक चेतना का परिणाम है ।
हमारा अतीत सांस्कृतिक चेतना से लबालब भरा पड़ा है । लेकिन वर्तमान में जो संकट दिखलार्ई दे रहा है उसका कारण है कि हम आधुनिकता और नएपन की भावना से ग्रसित होकर अपनी मिट्टी की पहचान भी भूलते जा रहे हैं और उसकी माँग की भी जाने–अनजाने हम उपेक्षा कर जाते हैं । आज हमारी राजनीति और समाज में जो जो दिशाभ्रम की स्थिति देखी जा रही है उसका कारण यही है कि अपनी सांस्कृतिक चेतना से हमारी पहचान कम होती जा रही है । जो हमारा नहीं है उसे हम अपना समझते हैं और जो हमारा है उसकी हम महज पारम्परिक कहकर उपेक्षा कर जाते हैं । साम्यवादी शासन में लम्बे समय चले देशों की पृष्ठभूमि भी देखी जानी चाहिए कि क्या वहाँ के समाज में साम्यरस्य हो पाया है, क्या वहाँ की जनता शोषणमुक्त हुई है, क्या वर्गसंघर्ष से ये देश स्वयं को मुक्त कर पाये हैं ? अगर नहीं तो प्रयोग के लिए हमारा ही धरातल क्यों ? रही बात प्रगतिशीलता की तो भगवान राम और कृष्ण से भी अधिक कोई प्रगतिशील हो सकता है ? गौतम बुद्ध, महावीर और संत कबीर जैसे लोगों की वैचारिक प्रगतिशीलता आज भी हमारे लिए आश्चर्य और आकर्षण पैदा करती है । सही मायने में पाश्चात्य चिन्तन से जो प्रगतिशीलता आयी है और जिसे हमने नया कहकर अंगीकार किया है उसके तहत तो हमारी यह स्थिति हो गई है कि एक ओर प्रत्यक्ष रूप में हम अपनी सांस्कृतिक संस्थाओं पर आघात करते हैं, ईश्वर के बदले जनता के नाम पर शपथ खाते हैं और दूसरी ओर माता–पिता की मृत्यु पर बारह दिनों के संस्कार में बैठते हैं तथा दशहरा में मंदिरों में आस्था और विश्वास से भरकर बलि चढ़ाते हैं । सही मायने में हमारी सांस्कृतिक प्रगतिशीलता तो यह है कि ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए जे, पीर पराई जाने रे ।’ अगर इतनी ही प्रगतिशीलता को हम अपना लें तो हमारा समाज समरस हो सकता है ।

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