Sat. Sep 22nd, 2018

सांस्कृतिक रिश्तों की गहरी नींव है नेपाल-भारत के सम्बन्धों में : डॉ.श्वेता दीप्ति (कार्यपत्र)

कानूनी रूप से विवाह कर के जो महिला आती हैं वो अपनी पहचान छोड़ कर आती हैं । उनका उपनाम अपने पति से जुड़ जाता है । ऐसे में उन्हें वैवाहिक नागरिकता की आवश्यकता है अंगीकृत की नहीं ।

नेपाल और भारत का सम्बन्ध सदियों का है, इसे बेहतर समझने के लिए बृहत इतिहास को कुरेदना होगा इसलिए आज वर्तमान परिप्रेक्ष्य के साथ ही अतीत की चर्चा भी करनी होगी  । कई विवादों के बीच सदियों के रिश्तों की नींव आज भले ही  दरकती हुई लगे किन्तु सच्चाई तो यह है कि यह दरार  हमेशा राजनीति  के कारण ही पैदा होती रही है । बावजूद इसके जन–स्तर पर यह समाप्त नहीं हो सकती क्योंकि इस रिश्ते की जड़ें बहुत गहरी हैं । बरगद के पेड़ को आपने देखा होगा । वह जितना पुराना होता है उसकी जड़ें धरती को उतनी ही मजबूती से पकड़ती है और धरती से बाहर भी नई शाखाओं के रूप में वह फैलती ही जाती हैं । नेपाल–भारत का रिश्ता बहुत कुछ ऐसा ही है इसकी जड़ें जितनी धरती के नीचे है उतनी ही धरती के बाहर  भी । व्यापारिक और राजनीतिक रिश्ते समयानुकूल परिवर्तित हो सकते हैं क्योंकि ये रिश्ते आवश्यकता और स्वार्थ पर टिके होते है । लेकिन सांस्कृतिक और धार्मिक आधार दिल से जुड़े होते हैं जिसे राजनीतिक आक्षेप कुछ क्षणों के लिए विचलित जरुर कर सकते हैं पर उसे मिटा नहीं सकते । रिश्तों की गहराई ऐसी है कि नेपाल के नागरिक डा.रुइत और अनुराधा कोईराला जैसी नेपाल की सम्मानित हस्ती भारत के पद्मश्री से सम्मानि किए जाते हैं ।  असंख्य प्रहार को हमेशा इन दोनों देशों के रिश्तों ने झेला है । कई बार भारत को नेपाल की जनता ने कटघरे में खड़ा किया है, पर यह रोष क्षणिक ही रहा । बावजूद इसके हम सुख–दुख में साथ रहे हैं । यह कटु सत्य है कि पड़ोसी को विस्थापित नहीं किया जा सकता । इसलिए रोष और संतोष दोनों के साथ इस रिश्ते को और भी मजबूत करना होगा । जहाँ कमियाँ होती हैं वहाँ दिल में रोष होता है और जहाँ प्यार होता है वहाँ संतोष होता है और ये दोनों ही भाव अपनों के लिए ही दिल में आता है । शिकवा और शिकायत भी अपनों से ही की जाती है ।
आज यहाँ मूलतः वर्तमान की चर्चा हो रही है और सच तो यह है कि  वर्तमान का व्यवहार ही अतीत को याद करने का आधार देता है । दोनों देशों के रिश्तों ने एक अपनत्व का अतीत इतिहास में सँजोया है । पर आज यह कहने में मुझे हिचक नहीं कि इन दो देशों के बीच के रिश्तों को दोनों देशों की तरफ से पुनर्मुल्याँकन करने की आवश्यकता है । हर उस बिन्दु पर बात करने की आवश्यकता है, जहाँ हमें जरा सा भी स्वीकार करने में कठिनाई हो रही है । चाहे वो विगत में हुई संधियाँ हों या आज के परिप्रेक्ष्य में योजनाओं, परियोजनाओं या निवेश की बातें हों ।

सांस्कृतिक – धार्मिक सम्बन्ध

नेपाल भारतीय संस्कृति का संरक्षण स्थल रहा है । यह शैव, शाक्त, बौद्धादि सम्प्रदायों को आश्रय देता रहा है । भारतवर्ष के विद्वान, तपस्वी कलाकार आदि यहाँ आए और यहाँ की साँस्कृतिक धरातल को प्रशस्त किया । गौतमबुद्ध, महावीर, जानकी, जनक, कौशिक, बाल्मीकि, कपिल,व्यास आज के नेपाल(भारतवर्ष) के विभूति हैं परन्तु यह भारत के राष्ट्रगौरव भी हैं । ऋषि मुनियों की तपस्या स्थल हिमालय रहा है । किरातेश्वर महादेव की महिमा पुराण प्रथित है । कैलाश मुक्तिनाथ तथा पशुपति की यात्रा भारतीय यात्रियों का परम पवित्र कृत्य माना जाता रहा है । नेपाल सिद्ध पीठ माना जाता है जहाँ भारतीय साधक आकर सिद्धता प्राप्त करते हैं । शैवों का तो नेपाल गढ़ ही है । कोटेश्वर, सन्तानेश्वर, ऋषिश्वर, गोरेक्षेश्वर आदि असंख्य शिवलिंग नेपाल में प्रतिष्ठित हैं । भैरवों की भी संख्या यहाँ कम नहीं है । बाघभैरव, काल भैरव, श्वेतभैरव, महाकाल भैरव, आकाश भैरव, बटुक भैरव, टीका भैरव तथा उन्मतेश्वर भैरव ये प्रमुख भैरव हैं । फलतः नेपाल प्राचीन समय से ही भारतीय विशेषतः सीमावर्ती भारतीय प्रदेशों के शैवों का आवागमन का आकर्षक केन्द्र बना हुआ है । इन दो देशों के रिश्तों की गहराई हम यहाँ से लगा सकते हैं कि दोनों की संस्कृतियाँ इतनी घुली मिली हैं कि इसे एक दूसरे से अलग करना दूध और पानी को अलग करने के जैसा है । माना जाता है कि पाटन का चतुष्कोण स्तूप सम्राट अशोक ने बनाया था । अशोक की पुत्री चारुमाला ने डानदेव का मंदिर गणेश मंदिर बनवाया और भिक्षुणी बनकर आजीवन यहीं रह गई ।
नेपाल और भारत के बीच का यह सांस्कृतिक रिश्ता दोनों देशों के बीच सदियों से जारी है । यहाँ की धार्मिक भूमि जिस तरह भारतीयों के लिए प्रिय है उसी तरह नेपाल के नागरिकों के लिए काशी, गया, प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, अयोध्या, बद्रीनाथ, हरिद्वार आदि प्रिय धार्मिक स्थल हैं । आज भी मृतआत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने वाले गया की यात्रा करते हैं ।

नेपाल और भारत का कलाकौशल आंशिक भिन्नता के साथ लगभग एक जैसा है । अशोककालीन बौद्ध चैत्य नेपाल में यत्र तत्र पाए जाते हैं । गुप्तों द्वारा प्रचारित भागवत सम्प्रदाय के विष्णु, गरुड़, तान्त्रिक सम्प्रदायों द्वारा प्रचारित अनेक बौद्ध तथा हिन्दू देवमूर्तियाँ नेपाल में आज भी विद्यमान हैं । मथुरा की मूर्तियों में जो कुषाण कला विद्यमान है वह नेपाल में भी देखी जाती है । गान्धार शैली जिसमें युनानी और उत्तर भारतीय कला का मिश्रण है वह नेपाली बुद्ध तथा सूर्य की मूर्तियों में प्रत्यक्ष दिखाई देती है । नेपाल की वास्तुकला पर उत्तर भारत की नागर शैली का प्रभाव प्रत्यक्ष दिखाई देता है । इतना ही नहीं दोनों देशों के धार्मिक कृत्य भी कई जगहों पर एक ही हैं । इन दोनों देशों में इतनी समानता है कि हम यह कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के अध्ययन के बिना नेपाली संस्कृति का अध्ययन सम्भव नहीं है । नेपाल के हिन्दू के लिए गंगास्नान, काशी सेवन, और कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पुण्य स्थल के दर्शन की जो अभिलाषा रहती है वही भारत के हिन्दू के मन में हिमालय का आकर्षण, पशुपतिनाथ और मुक्तिनाथ दर्शन की अभिलाषा रहती है । अयोध्या की चर्चा हो तो जनकपुर स्वयं सामने आ जाता है । दो बार भारतीय प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी की जनकपुर यात्रा तय होने के बाद भी सम्भव नहीं हो पाई है । जनकपुर से भारत का रिश्ता आध्यात्मिक तो है ही यह भावनात्मक स्तर पर भी जुड़ा हुआ है ।
इन सारी बातों का फायदा कल भी था और आज भी है । आँकड़े बताते हैं कि सबसे अधिक पर्यटक नेपाल में भारत से आते हैं । नेपाल के लिए पर्यटन का विकास नेपाल की समृद्धि का द्वार खोल सकता है और इसमें भारत का सहयोग अपेक्षित है क्योंकि पहले ही कहा जा चुका है कि दोनों देशों के धार्मिक स्थल की यात्रा दोनों देशों के नागरिकों की आवश्यकता है । इसे अगर बृहत स्तर पर बढ़ाया जाय तो दोनों देश प्रत्यक्ष लाभ ले सकते हैं । मांउट एवरेस्ट नेपाल की पहचान है और देश विदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र भी । इसका प्रवद्र्धन और संरक्षण दोनों देशों के लिए नई सम्भावनाओं को जन्म देता है जिसका विकास पर्वतारोहियों और ट्रैकिंग वालों को अपनी ओर और भी अधिकता के साथ खींच सकता है और इससे नेपाल की आर्थिक स्थिति लाभान्वित हो सकती है ।
सांस्कृतिक क्षेत्र से आबद्ध नेपाली कला शैलियों का भारत में अगर समय–समय पर प्रदर्शन किया जाय तो इससे नेपाली कला को विस्तार मिलेगा और इस साँस्कृतिक आधार को और भी मजबूती । बड़े ही दुख की बात है कि हाल में ही सुरक्षा का हवाला देकर भारतीय सिने कर्मियों का काठमान्डौं में होने वाले कार्यक्रम को रोक दिया । यह पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी ऐसी बातें हो चुकी है । ऐसे में प्रशासन और शासन को चुस्त होना पड़ा और सुरक्षा व्यवस्था को चौकस करना होगा  । क्योंकि यह सिर्फ मनोरंजन की बातें नहीं थी इससे कला के आदान–प्रदान के साथ–साथ आर्थिक लाभ भी थे ।

ऐतिहासिक – राजनीतिक सम्बन्ध

राजनीतिक सम्बन्धों को जानने के लिए अतीत की ओर जाना अनुचित नहीं होगा । महाभारत के सभापर्व में यह उल्लेख है कि धर्मांकर जो नेपाल पर शासन करने वाला सबसे पहला शासक था, भारत का था । नेपाल के आदिवासी किरात माने जाते हैं जिन्हें महाभारत में क्षत्रिय कहा गया है । इतिहास में वर्णित है कि अजातशत्रु परास्त होकर नेपाल की ओर आया था । डॉ. एल डी जोशी की पुस्तक खस फैमिली लॉ  में जिक्र है कि ठकुरीवंश भी जो खसों की एक शाखा है हिन्दी क्षेत्र से यहाँ आए थे । खसवंश आर्यों की ही एक शाखा है । बस्नेत, भण्डारी, कार्की, खड़का, अधिकारी, विष्ट, कँुवर, दानी, वर्ती, खत्री आदि क्षत्रियों के अतिरक्ति खसों में ब्राह्मण भी हैं । बालचन्द्र शर्मा की पुस्तक नेपालको ऐतिहासिक रुपरेखा में उल्लेख है कि शाक्य भी आत्मरक्षार्थ आए थे  । मल्लों की दो शाखाएँ नेपाल में पाई जाती हैं, जिसमें से एक ने जुम्ला में अपना राज्य स्थापित किया । मानदेव (पाँचवी शताब्दी) के चाँगुनारायण के शिलालेख में पूर्वागत मल्लों का उल्लेख है । इतिहासकार श्री गेशेफ टुची इन मल्लों का आगमन गढ़वाल से मानते हैं ।  दूसरी मल्लशाखा नेपाल की है जो १२२८ ई. में गयासुद्दीन द्वारा खदेड़े जाने पर सिम्रोनगढ़ होती हुई नेपाल उपत्यका में पहुँची थी । प्रतापगढ़ मल्ल के शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि उसके पूर्वज कर्नाटक से आए थे । वंशावली के अनुसार उपत्यका के नेवार दक्षिण भारत से आए थे । हरिसिंह देव के मंत्री चण्डेश्वर जो विद्यापति के पितामह थे उन्होंने नेपाल के रघुवंशी महीपों का उन्मूलन कर पशुपतिनाथ का स्वयं स्पर्श किया और वांगमती(बागमती) के किनारे आत्म तुलादान किया । स्वयं विद्यापति वर्तमान नेपाल के सप्तरी जिले में पुरादित्य के आश्रय में रहे और वहीं उन्होंने लिखनावली की रचना की । इतिहासकार शाहवंश का सम्बन्ध चितौड़ से मानते हैं और उनके पूर्वज कुम्भकर्ण को कुमाउँ का बताते हैं । कुछ इन्हें पश्चिम भारत का मानते हैं जो मुसलमानों से त्रस्त होकर नेपाल में आ बसा था । राणा अपनी वंश परम्परा सिसौदिया वंशज राणाओं से जोड़ते हैं । वैसी और चौबीसी के अधिकांश शासक हिन्दी भाषी राजपुताना से नेपाल आए थे । पाल्पा का सेनवंश चितौड़ से आकर बेतिया के पास बसा । तनहुँ के राजवंश और पाल्पा के शास्कों का एक ही मूल रहा । नेपाल के ब्राह्मण प्रायः भारत से आए हुए हैं । कुमाउँ के ब्राह्मण यहाँ अपने आपको कुमैया कहते हैं । श्री सूर्य विक्रमज्ञवाली के अनुसार अज्र्याल, सिग्द्याल तथा पौड्याल का पूर्वज एक ही हैं और वो हैं कान्यकुब्ज ब्राह्मण । ये इतिहास का विषय है जहाँ का शोध यह बताता है कि भारत से किसी भी कारण से भागे हुए भगौड़े नेपाल आए और यहाँ आकर बस गए ।
जिस तरह नेपाल में भारतीयों ने शरण लिया उसी तरह यहाँ के लोग भी भारत में शरण पाते रहे हैं । पृथ्वीराज से पराजित रणजीत मल्ल ने बनारस में शरण लिया । बेतिया नेपाल के शरणार्थियों को शरण देता रहा । कोतपर्व के बादशाह राजा राजेन्द्र ने बनारस में शरण पाई । डंकर फोर्बेस के शब्दों में विश्व इतिहास में राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व करने वाले प्रथम राजा त्रिभुवन शाह ने दिल्ली जाकर शरण लिया था । आधुनिक नेपाल के प्रवासी नेता देवीप्रसाद सापकोटा बनारस रहे और वहीं से साप्ताहिक गोरखाली पत्र निकाला । वर्तमान में कोइराला से लेकर प्रचण्ड तक ने जनान्दोलन के समय भारत में जाकर शरण ली है । कहने का तात्पर्य यह है कि ये दोनों देश इतने करीब रहे कि एक दूसरे के लिए  बुरे वक्त का आसरा बनते रहे । सबसे बड़ी बात तो यह कि आज जो खस, क्षत्रिय खुद को यहाँ का मूल निवासी बताते हुए तराई क्षेत्र के निवासी को भारतीय कह कर दुष्प्रचार कर रहे हैं वो स्वयं भारतीय मूल के हैं और इसका इतिहास साक्षी है ।
आधुनिक नेपाल के राजनीतिक सम्बन्ध ऐतिहासिक हैं । भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में जननायक बीपी कोइराला के नेतृत्व में नेपाल के राजनेताओं की सहभागिता रही वहीं नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में भारत का नैतिक समर्थन और सहयोग रहा है ।
वक्त के साथ साथ राजनीतिक सम्बन्ध का स्वरूप भी बदल रहा है । राजनीतिक स्तर पर जब देश हित से अधिक आत्महित की बात होने लगती है तो देश के विकास की बातें कहीं पीछे छूट जाती हैं । इसलिए किसी भी मुद्दों को भड़का कर नहीं उसे वैचारिकता के साथ सुलझाकर आगे बढ़े की आवशयकता है ।

सामाजिक – वैवाहिक सम्बन्ध

हम जानते भी हैं और मानते भी हैं कि “नेपाल ओर भारत सिर्फ पड़ोसी देश नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों का पुराना नाता है ।” हर बार यह कह कर हम अपने बीच के रिश्तों को परिभाषित करते आए हैं । सच भी है कि सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से दोनों देश एक दूसरे के करीबी हैं । पर क्या वजह है कि हमें यह बात बार–बार यह बात दुहरानी पड़ती है ? यानि कहीं ना कहीं कुछ ऐसा है, जो दो देशों के रिश्तों का परिभाषित करने के लिए समय समय पर विवश करता है । दोनों देशों के बीच रिश्तों को परिभाषित करने के लिए सबसे प्रचलित नारा है रोटी और बेटी का सम्बन्ध, यह उक्ति हम जनता और नेता दोनों से सुनते आए हैं । यह सच भी है कि इन दोनों देशो के बीच रिश्तों का सबसे मजबूत आधार वैवाहिक सम्बन्ध रहा है । कह सकते हैं कि पारिवारिक सम्बन्ध से गहरा कोई और सम्बन्ध नहीं होता । एक वक्त था कि भारत के सीमावर्ती राज्य बिहार और उत्तरप्रदेश के लिए नेपाल के लिए विदेशी होने का भाव नहीं था । इसलिए बेटियों के ब्याह के समय वो इस बात पर ज्यादा विचार नहीं करते थे कि बेटी को किसी दूसरे देश में ब्याह रहे हैं, या वहाँ उनकी बेटियों के अधिकार क्या होंगे, उसे वहाँ किस तरह की नागरिकता प्राप्त होगी । या नेपाल के तराई क्षेत्र के अभिभावक भी इतनी गहराई से इन बातों पर विचार नहीं करते थे । पर आज चेतना और जागरुकता के साथ साथ अधिकार के विषय में सजगता आई है । शिक्षा का प्रसार–प्रचार जैसे जैसे हुआ रिश्तों के आधार उससे भी जुड़ने लगे । पहले बेटियों की शिक्षा कम होती थी । ब्याहने के बाद घर की जिम्मेदारियों का निर्वाह ही उनका मकसद हुआ करता था । पर आज बेटियाँ वहाँ से अपनी आधी अधूरी शिक्षा के साथ यहाँ आती हैं परन्तु भाषा की बाध्यता कई बार उन्हें आगे की शिक्षा के लिए प्रतिबंधित कर देती है । आवश्यक नहीं कि हर घर की बेटी अँग्रेजी माध्यम से पढ़कर आई हों क्योंकि बिहार और उत्तरप्रदेश में आज भी शिक्षा का माध्यम हिन्दी है जिसे यहाँ मान्यता प्राप्त नहीं । जब भी संवैधानिक स्तर पर इसे मान्यता देने की बात उठती है तो उसका राजनीतिकरण किया जाता है और मातृभाषा के भावनात्मक पक्ष को उकसा कर विरोध की राजनीति की जाती है । जबकि शिक्षा के माध्यम की स्वतंत्रता का अधिकार माँगना अनपेक्षित नहीं है । इसे बेवजह राष्ट्रभाषा, राजभाषा, मातृभाषा के शब्द जाल में न उलझाकर सिर्फ शिक्षा के लिए उन बेटियों के अधिकार की बात समझें जो इस देश को अपना कर्मक्षेत्र बनाना चाहती है । परन्तु भाषा की स्वतंत्रता उन्हें नहीं है ।
आज के परिवेश में अगर सर्वेक्षण कराया जाय तो स्पष्ट परिणाम दिखेगा कि अब दोनों देशों के बीच वैवाहिक रिश्ते पहले की अपेक्षा काफी कम हो गए हैं और हालात जो सामने हंै, उनसे यह भी जाहिर होता है कि कुछ वर्षों में वैवाहिक रिश्तों पर पाबन्दियाँ लग जाएँगी । हालाँकि वैवाहिक रिश्ते सामाजिक स्तर पर जुड़े होते हैं इसमें राज्य और राजनीति का दखल कम होता है । पर जब बात दो देशों के बीच वैवाहिक रिश्तों की हो, तो राज्य और राज्य द्वारा बनाई गई नीतियाँ भी इसमें शामिल हो जाती हैं । वर्तमान में राज्य द्वारा निर्धारित भाषा और नागरिकता सम्बन्धी जो नीति है, वही इस रिश्ते को कमजोर कर रही है । इस कटु सत्य को अब स्वीकार करना होगा । लुभाने वाला नारा बेटी और रोटी का सम्बन्ध का अब स्वरुप बदल रहा है । राज्य की यही नीति रही तो यह रिश्ता अभी कमजोर हुआ है कल यह पूरी तरह समाप्त होगा इसमें कोई दो मत नहीं है । इस मसले पर दोनों देशों को सोचना होगा ताकि यहाँ दोनों देशों की बेटियों को परेशानियों से नहीं गुजरना पड़े । भारत के संविधान में नागरिकता सम्बन्धी जो भी प्रावधान हैं उसके अनुसार भारत में जन्मे  उस व्यक्ति को  नागरिकता प्रदान की जाती है जिसके माता या पिता में से एक भारत का नागरिक है । वैवाहिक नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान में पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने का प्रावधान है । पर गौरतलब यह है कि यह प्रावधान खास कर बंगलादेश और पाकिस्तान को ध्यान में रखकर बनाया गया है । इस सन्दर्भ में यह कहना चाहूगीँ कि भारत में अब नेपाल से गई हुई बेटियों के लिए  खुली हुई सीमा की तरह नागरिकता सम्बन्धी नियम की स्पष्ट और खुली व्याख्या की जाय । क्योंकि जब भी नेपाल में अंगीकृत नागरिकता पर बहस होती है तो यह कटाक्ष किया जाता है कि भारत की बेटियों को नेपाल आते के साथ ही नागरिकता चाहिए जबकि भारत में सोलह साल के बाद दिया जाता है । मैंने इस तथ्य को खोजने की कोशिश की पर वैवाहिक नागरिकता में इसे स्पष्ट नहीं किया गया है । हाँ, पंजीकरण के माध्यम से उन व्यक्तियों के लिए छः वर्षों की समय सीमा निर्धारित की गई है जो विदेशी हैं और भारत के नागरिक बनना चाहते हैं । और देशीयकरण नागरिकता में छः वर्ष की अवधि को १० वर्ष कर दिया गया है । यहाँ भी वैवाहिक रिश्तों की व्याख्या नहीं की गई है । यानि आज के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि इस विषय पर भारत में भी चर्चा होनी चाहिए ।
यहाँ मैं थोड़ी चर्चा नेपाल के संविधान की करना चाहूँगी, नेपाल का नया संविधान आया जिसे मधेश ने कई विषयों पर आज भी स्वीकार नहीं किया है । नागरिकता सम्बन्धी जो धराएँ नए संविधान में हैं बहस उसको लेकर आज भी ज्यों का त्यों है । पहली बार जब एमाले की सरकार बनी और प्रधानमंत्री ओली भारत की यात्रा पर गए तो उन्होंने वहाँ कहा कि नेपाल के नए संविधान में नागरिकता सम्बन्धी कोई विभेद नहीं है । यहाँ मैं उल्लेखित करना चाहुँगी कि नए संविधान में राज्य के कुछ पद अंगीकृत नागरिक के लिए वंचित किया गया है । नयाँ संविधान के धारा २८९ (१) में ‘राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, प्रधानन्यायाधीश, प्रतिनिधिसभा के सभामुख, राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष, प्रदेश प्रमुख, मुख्यमन्त्री, प्रदेश सभा के सभामुख और सुरक्षा निकाय के प्रमुख के पद में निर्वाचित, मनोनीत या नियुक्ति के लिए वंशज के आधार में नेपाल की नागरिकता प्राप्त व्यक्ति होना आवश्यक है ।
यह प्रावधान अंगीकृत नागरिक के प्रति विभेद ही है । दूसरे प्रावधान पर नजर डालें जो उपधारा (२) में कहा गया है कि अन्य संवैधानिक निकाय के पद के लिए वंशज, अंगीकृत या जन्म के आधार में नागरिकता प्राप्त व्यक्ति योग्य हो सकते हैं । इन पदों के हेतु योग्य होने के लिए अंगीकृत नागरिकताधारी को कम से कम  दस वर्ष नेपाल में रहना होगा पर, जन्म के आधार में नागरिकता प्राप्त  व्यक्ति और नेपाली नागरिक के साथ  विवाह करने वाले अंगीकृत नागरिकता प्राप्त महिला को कम से कम पाँच वर्ष स्थायी वास करना पड़ा । अर्थात, संविधान के अनुसार नेपाली पुरुष के साथ  विवाह के बाद  नेपाल की अंगीकृत नागरिकता प्राप्त विदेशी महिला अन्य संवैधानिक निकाय के पद के लिए पाँच वर्ष में योग्य होगी वहीं, नेपाली महिला के साथ  विवाह कर अंगीकृत नागरिकता लेने वाले विदेशी पुरुष को कम से कम १० वर्ष तक  नेपाल में रहना होगा । यहाँ भी विभेद है । एक पुरुष अपनी शादी के वक्त कम से कम आज के परिवेश में ३५ वर्ष का जरुर होता है इस स्थिति में दस वर्षों के बाद उसकी उम्र के हिसाब से वह किसी लायक ही नहीं रह जाता है ।
 अब यहाँ सीधी सी बात सामने आती है कि यह बहस अंगीकृत नागरिकता से अधिक समानता, अधिकार और पहचान की है । मधेश की लड़ाई विभेद के  विरुद्ध की थी, पहले और दूसरे दर्जे के नागरिक की थी जहाँ अँगीकृत नागरिकता तो तीसरे दर्जे की हो जाती है ।
कानूनी रूप से विवाह कर के जो महिला आती हैं वो अपनी पहचान छोड़ कर आती हैं । उनका उपनाम अपने पति से जुड़ जाता है । ऐसे में उन्हें वैवाहिक नागरिकता की आवश्यकता है अंगीकृत की नहीं ।
अंतरिम संविधान में संवैधानिक पद में पहुँचने के लिए दस वर्ष की अवधि निर्धारित की गई थी जिसे वर्तमान संविधान से हटाकर आजीवन अंगीकृत नागरिक कह कर प्रतिबंधित कर दिया गया ।
किसी भी देश के लिए सुरक्षा, भाषा, स्वायत्तता, धर्म, संस्कृति अति संवेदनशील मुद्दे होते हैं जहाँ सतर्कता की आवश्यकता होती है परन्तु इसकी आड़ में देश के नागरिक के अधिकार नहीं छीने जाते हैं । भाषा और नागरिकता सम्बन्धी ये दो विषय नेपाल और भारत के सम्बन्धों की एक नई परिभाषा खोज रहा है जिसमें दोनों देशों को पहल करनी होगी । वरना ‘रोटी–बेटी के सम्बन्ध’ का नारा सिर्फ रोटी तक सीमित रह जाने वाला है ।

आज भी रोटी अर्थात रोजगार की तलाश में दोनों देशों के नागरिक

व्यापारिक – आर्थिक सम्बन्ध

इतना ही नहीं नेपाल भारत के रिश्तों को व्यापारिक नजरिए से भी खंगालना होगा । अतीत से ही यह सम्बन्ध गहरा है । चाणक्य के समय में नेपाल में कम्बल, खालें, कांचन रस, मैनसिल, शिलाजीत अधिक मिलते थे । आयुर्वेदिक औषधियों के मूल द्रव्य भी यहीं मिलते थे । इसलिए इनका निर्यात नेपाल से होता रहा । कर्कपैट्रिक ने जो विवरण दिया है उसके अनुसार नेवार घरेलू उद्योग धन्धों में बड़े निपुण रहे । ताबां, पीतल तथा काष्ठकला में नेपाली कारीगर की निपुणता आज भी देखी जा सकती है । नेपाल से भारत बर्तन भेजे जाते रहे हैं । घी, सेमर की रुई तथा तेल का निर्यात नेपाल से होता रहा है । इनसब क्षेत्रों में आज भी अधिक विकास और ध्यान देने की आवश्यकता है ।  नेपाल में कभी सबसे अधिक निवेश भारत का होता था जो आज पहले की अपेक्षा कम हो रहा है । इसकी वजह ढूँढनी होगी । क्योंकि हम यह कभी नहीं कह सकते कि नेपाल को भारत की आवश्यकता नहीं है । आखिर क्यों जब भी किसी परियोजनाओं में भारत की बात आती है तो नेपाल की जनता के अन्दर जो शक या विरोध जन्म लेता है ? उसके कारण को खोजना होगा । विवादित संधियों को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि परिवेश के साथ समय की माँग बदलती है और तभी रिश्तों में ताजगी आती है ।
भूगोल एवं इतिहास की अनिवार्यताओं के परिणामस्वरूप दोनों पड़ौसियों की आर्थिक नियति का अंतर्गुम्फन हुआ है । नेपाल के विदेश व्यापार का दो तिहाई व्यापार भारत के साथ होता है, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार अनुमानतः लगभग ४.७ बिलियन डालर का है । नेपाल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का ४७ प्रतिशत भारत से है । १९९६ में संशोधित व्यापार संधि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों की केंद्र बिंदु साबित हुई है । १९९६ के बाद से, भारत में नेपाल के निर्यात में ग्यारह गुणा वृद्धि हुई थ िऔर द्विपक्षीय व्यापार सात गुणा से अधिक बढ़ गया था । भारतीय फर्में नेपाल में सबसे बड़ी निवेशक हैं जिन्होंने कुल अनुमोदित प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों का लगभग ४० प्रतिशत निवेश किया है । नेपाल में लगभग १५० से अधिक भारतीय उपक्रम कार्य कर रहे हैं जिनमें विनिर्माण, सेवाओं (बैंकिंग, बीमा, शुष्क बंदरगाह, शिक्षा और दूरसंचार), ऊर्जा क्षेत्र एवं पर्यटन उद्योग जैसे विविध क्षेत्रों के उपक्रम शामिल हैं । नेपाल में निवेशकर्ताओं में अन्या के साथ साथ आईटीसी, डाबर इंडिया, टाटा पावर, हिंदुस्तान यूनीलिवर, वीएसएनएल, टीसीआईएल, एमटीएनएल, भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, भारतीय जीवन बीमा निगम और एशियन पेंट्स शामिल हैं । अर्थात हम यह निःसंकोच कह सकते हैं कि नेपाल और भारत दोनों को एक दूसरे की आवश्यकता है ।
खुली सीमा जहाँ हमारे खुले दिल और रिश्तों को परिभाषित करती है और जो पूरे विश्व में अपने आप में एक अनूठा उदाहरण है । नेपाल भारत की खुली सीमा व्यापार की दृष्टि से दोनों देशों के लिए फायदेमन्द है । पर कभी कभी सीमा पर नागरिकों को असहज वातावरण को झेलना पड़ा है । इसके व्यवस्थापन की आवश्यकता है । जाँच को बहाना बनाकर नागरिकों को परेशान किया जाता है इस ओर कारगर कदम उठाया जाना चाहिए ।
दूसरी बात यह कि नेपाल दो मजबूत पड़ोसियों के बीच अवस्थित है जहाँ नेपाल को एक विश्वास का आधार देकर अपनी कूटनीति बनाने की आवश्यकता है ।  खुली सीमा भारत के लिए चिन्ता का विषय भी हो सकता है जिसे चिन्तामुक्त करने का आश्वासन नेपाल को देना होगा क्योंकि यहाँ भारत की सुरक्षा का सवाल सामने आता है ।
नेपाल की समृद्धि में भारत का योगदान रहा है इससे इनकार नहीं किया जा सकता और आगे भी विकास की राह पर सहयोग की अपेक्षा लाजमी है । ऐसे में दोनों देशों को इस रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए पूर्वाग्रह से मुक्त होकर आगे आना होगा । दोनों देशों को एक दूसरे की आवश्यकता है । यह सच है कि,  पनबिजली, सड़क जोड़ना, व्यापार के मामलों में दोनों देश एक दूसरे के सहयोग के बिना आगे नहीं बढ़ सकते हैं  और इसके लिए आवश्यक है कि नेपाल में भारत को लेकर अविश्वास का जो माहोल है उसे दूर किया जाना चाहिए । नेपाल के पास संशाधन है और भारत के पास साधन इसका सह ीऔर उचित प्रयोग किया जाना चाहिए और ऐसी नीति निर्धारण की जानी चाहिए कि दोनों देशों को बराबर का फायदा हो ।
आज के सन्दर्भ में भी नेपाल और भारत का सम्बन्ध बहुआयामिक और व्यापक है । नेपाल के आर्थिक, प्राविधिक, सामाजिक और व्यवस्थापकीय विकास में भारत का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है । भारत का सहयोग नेपाल के सामाजिक आर्थिक रूपान्तरण में बहुत बड़ा योगदान रहा है । भारत सरकार ने नेपाल में विभिन्न शैक्षिक, स्वास्थ्य और पोलीटेक्निक संस्थाओं की स्थापना कर नेपाल के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है । सड़क, रेलवे का विस्तार, सिंचाई और जलविद्युत आदि क्षेत्रों में भारतीय सहयोग सराहनीय रहा है । आज भी नेपाल को इस सहयोग और साथ की आवश्यकता है क्योंकि नेपाल की सबसे बड़ी जरुरत नेपाल का विकास है । भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल यात्रा के समय कहा था कि नेपाल दक्षिण एशिया का गर्व है और नेपाल का चहुँमुखी विकास भारत की चाहत है । उन्होंने नेपाल की स्वतन्त्रता , सम्प्रभुता स्वाभिमान को सम्मान दिया तथा नेपाल के साथ सहयोग , सम्पर्क ,संस्कृति और संविधान पर चर्चा की नेपाल को आर्थिक रूप से मजबूत करने पर बल तथा  पनबिजली योजनाओं में पूरा सहयोग देने का वचन दिया था उन्होंने कहा था कि नेपाल की जल विद्युत क्षमता का यदि प्रयोग किया जाए तो  वह दक्षिणी एशिया का संपन्न देश बन जायेगा यही नहीं भारत नेपाल को एक अरब डालर की सहायता देने का आश्वासन दिया मोदी जी ने कहा था कि, नेपाल में मीठा जल और जंगलों में यदि औषधियों को प्रचुरता है, कमी केवल सही दिशा निर्देश की है । आज नए नेपाल के निर्माण के लिए इसे दिल से कार्यान्वयन करने की आवश्यकता है ।

सुरक्षा का सवाल

भारत की सेना में नेपाली गोरखों की टुकड़ी शामिल रही है जो पर्वतीय क्षेत्रों में लड़ने लिए उत्तम लडाके माने जाते हैं । इसे यह स्पष्ट होता है कि भारत को नेपाली नागरिक पर कितना विश्वास है । सुरक्षा जैसे संवेदनशील मसले पर भी वो नेपाली जनता पर यकीन करता है । इस विश्वास को और भी बढाकर यहाँ की जनता को सेना में अधिक अवसर दिया जा कता है ।
जहाँ तक नेपाल की बात है, सैन्य शक्ति के विस्तार या विकास को लेकर नेपाल  को यह शिकायत है कि वे जो हथियार खरीदते हैं, उन्हें इसके लिए भारत को पूछना पड़ता है क्योंकि यहज्ञढछण् की संधि में लिखा हुआ है । इसके साथ ही उसमें लिखा है कि अगर किसी तीसरे राज्य से कोई खतरा होता है तो दोनों देश आपस में सलाह करेंगे । पर आज कहीं ना कहीं ये सारी बातें हजम नहीं हो रही हैं क्योंकि परिदृश्य बदल रहा है । इसलिए इन संधियों के पुनव्र्याख्या का समय आ चुका है, जिस पर दोनों देशों को तत्काल ही पहल करनी चाहिए ।  समुद्र की ओर से भारत को चीन या पाकिस्तान से खतरा होता है तो उससे नेपाल पर कोई असर नहीं पड़ता है परन्तु सीमावर्ती क्षेत्र से यह खतरा हमेशा बना हुआ है और अगर कोई अनपेक्षित हालात पैदा होती है तो इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं नेपाल पर भी पड़ेगा क्योंकि आग या बाढ़ से सिर्फ पड़ोसी का घर नहीं जलता या बहता है दुष्परिणाम दोनों को ही भुगतना पड़ता है ।  इसलिए यथाशीघ्र इस संधि पर दोनों पक्षों को गंभीरतापूर्वक चर्चा करने की जरूरत है । सभी जानते हैं कि नेपाल भारत के लिए इसलिए महत्तवपूर्ण है क्योंकि  भारत के लिए भारत की सुरक्षा महत्वपूर्ण है । इसलिए भारत यह चाहेगा कि नेपाल कोई ऐसा काम न करे, जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो क्योंकि इन दोनों देशों के बीच खुली सीमा है, जिसकी वजह से सुरक्षा को लेकर भारत की चिंता स्वाभाविक है । नेपाल और भारत को एकबार पुनः सभी संधियों और नीतियों पर विचार करना होगा । रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए जिस विश्वास की जरुरत है उसे पैदा करना होगा और एक स्वस्थ सोच के साथ आगे बढना होगा, तभी सदियों के इस रिश्ते को दिल से महसूस किया जा सकता है और निभाया जा सकता है ।  नेपाल भारत के आपसी रिश्ते की नींव सिर्फ व्यापारिक या राजनैतिक होती तो परिदृश्य बदल सकता था । पर इन दोनों देशों के रिश्ते संस्कृति, धर्म और परम्परा से पोषित हैं, न तो ये कभी कमजोर हो सकते हैं और न ही इन्हें समाप्त करने की कोशिश कामयाब हो सकती है । नेपाल भारत मित्रता अमर रहे ।

नेपाल–भारत विकास मञ्च द्वारा काठमांडू में आयोजित ‘वर्तमान परिवेश में नेपाल–भारत विषयक विचार गोष्ठी’ में डा. श्वेता दीप्ति द्वारा प्रस्तुत कार्यपत्र ( मार्च १६, २०१८ )

लेखक परिचय
सम्पादक, हिमालिनी मासिक
पूर्व अध्यक्ष, केन्द्रीय हिन्दी विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू
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