सांस्कृतिक रिश्तों की नींव राजनीतिक प्रहार से कमजोर नहीं होते : डॉ.श्वेता दीप्ति

डॉ.श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १५ अगस्त, २०१७ |  हेल्मबु की जननी पार्वती की क्रीड़ा भूमि हिमाचल के अंचल स्थित शैलावृत नेपाल, हमेशा से आकर्षण की भूमि रही है  । प्राचीन नेपाल पहाड़ों से घिरी घाटी तक सीमित था । इसका नाम ‘ने’ या निमि द्वारा पालित होने के कारण हो अथवा नय अर्थात् नीति पालन के कारण पड़ा है । यह सही है कि यह नाम अति प्राचीन है । चाणक्य के अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी में नेपाल का नाम आया है । समुद्रगुप्त की ३८७–४३२ विक्रमीय दिग्वजय सूचक इलाहाबाद के अशोकस्तम्भस्थ हरिषेण के लेख में नेपाल का नाम आया है । किन्तु इसकी गणना भारतवर्ष या भरतखण्ड के अन्तर्गत ही रही । आज भी राजनीतिक दृष्टि से नेपाल की सार्वभौम सत्ता सर्वथा पृथक होने पर भी सांस्कृतिक दृष्टि से इसे भरतखण्ड ही कहा जाता है । नेपाली साहित्य के भक्त कवि भानुभक्त आचार्य ने कहा है, बडो दुर्लभजान्नू भरत भूमि को जन्म जनले (भक्तमाला : भानुभक्त पाँचवा पद) । मोतीराम भट्ट ने भारतवर्ष का प्रयोग नेपाल और भारत दोनों के लिए किया था । तात्पर्य यह कि नेपाल और भारत का सम्बन्ध सदियों का है, इसे बेहतर समझने के लिए बृहत इतिहास को कुरेदना होगा । आज भले ही विवादों के दौर में रिश्ते की नींव दरकती हुई लगे किन्तु सच्चाई तो यह है कि यह दरार राजनीति ने पैदा किया है । वरना इस रिश्ते की जड़ें बहुत गहरी हैं । जहाँ की संस्कृति एक हो उसे राजनीति कुछ क्षणों के लिए विचलित जरुर कर सकती है पर उसे मिटा नहीं सकती ।

सांस्कृतिक सम्बन्ध

नेपाल भारतीय संस्कृति का संरक्षण स्थल रहा है । यह शैव, शाक्त, बौद्धादि सम्प्रदायों को आश्रय देता रहा है । भारतवर्ष के विद्वान, तपस्वी कलाकार आदि यहाँ आए और यहाँ की साँस्कृतिक धरातल को प्रशस्त किया । गौतमबुद्ध, महावीर, जानकी, जनक, कौशिक, बाल्मीकि, कपिल,व्यास आज के नेपाल(भारतवर्ष) के विभूति हैं परन्तु यह भारत के राष्ट्रगौरव भी हैं । ऋषि मुनियों की तपस्या स्थल हिमालय रहा है । किरातेश्वर महादेव की महिमा पुराण प्रथित है । कैलाश मुक्तिनाथ तथा पशुपति की यात्रा भारतीय यात्रियों का परम पवित्र कृत्य माना जाता रहा है । नेपाल सिद्ध पीठ माना जाता है जहाँ भारतीय साधक आकर सिद्धता प्राप्त करते हैं । शैवों का तो नेपाल गढ़ ही है । कोटेश्वर, सन्तानेश्वर, ऋषिश्वर, गोरेक्षेश्वर आदि असंख्य शिवलिंग नेपाल में प्रतिष्ठित हैं । भैरवों की भी संख्या यहाँ कम नहीं है । बाघभैरव, काल भैरव, श्वेतभैरव, महाकाल भैरव, आकाश भैरव, बटुक भैरव, टीका भैरव तथा उन्मतेश्वर भैरव ये प्रमुख भैरव हैं । फलतः नेपाल प्राचीन समय से ही भारतीय विशेषतः सीमावर्ती भारतीय प्रदेशों के शैवों का आवागमन का आकर्षक केन्द्र बना हुआ है । ओल्डफील्ड ने कहा है, मंजुश्री के समय से ही(गौतम बुद्ध से भी पहले) भारत के मैदानों के लोग नेपाल में बस चुके थे और भारतीय नवीन सिद्धान्तों को नेपाल उपत्यका को दे चुके थे ।

since the time of Manjushree , colonists also from the plains of Hindustan  had settled in Nepal and has thus brought the new doctrines to the vally direct from India . Sketches from Nepal : Oldfield, p.48

इन दो देशों के रिश्तों की गहराई हम यहाँ से लगा सकते हैं कि दोनों की संस्कृतियाँ इतनी घुली मिली हैं कि इसे एक दूसरे से अलग करना दुध और पानी को अलग करने के जैसा है । माना जाता है कि पाटन का चतुष्कोण स्तूप सम्राट अशोक ने बनाया था । अशोक की पुत्री चारुमाला ने डानदेव का मंदिर गणेश मंदिर बनवाया और भिक्ष’णी बनकर आजीवन यहीं रह गई ।

नेपाल और भारत के बीच का यह सांस्कृतिक रिश्ता दोनों देशों के बीच सदियों से जारी है । यहाँ की धार्मिक भूमि जिस तरह भारतीयों के लिए प्रिय है उसी तरह नेपाल के नागरिकों के लिए काशी, गया, प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन, अयोध्या, बद्रीनाथ, हरिद्वार आदि प्रिय धार्मिक स्थल हैं । आज भी मृतआत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने वाले गया की यात्रा करते हैं ।

नेपाल और भारत का कलाकौशल आंशिक भिन्नता के साथ लगभग एक जैसा है । अशोककालीन बौद्ध चैत्य नेपाल में यत्र तत्र पाए जाते हैं । गुप्तों द्वारा प्रचारित भागवत सम्प्रदाय के विष्णु, गरुड़, तान्त्रिक सम्प्रदायों द्वारा प्रचारित अनेक बौद्ध तथा हिन्दू देवमूर्तियाँ नेपाल में आज भी विद्यमान हैं । मथुरा की मूर्तियों में जो कुषाण कला विद्यमान है वह नेपाल में भी देखी जाती है । गान्धार शैली जिसमें युनानी और उत्तर भारतीय कला का मिश्रण है वह नेपाली बुद्ध तथा सूर्य की मूर्तियों में प्रत्यक्ष दिखाई देती है । नेपाल की वास्तुकला पर उत्तर भारत की नागर शैली का प्रभाव प्रत्यक्ष दिखाई देता है । इतना ही नहीं दोनों देशों के धार्मिक कृत्य भी कई जगहों पर एक ही हैं । इन दोनों देशों में इतनी समानता है कि हम यह कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति के अध्ययन के बिना नेपाली संस्कृति का अध्ययन सम्भव नहीं है । नेपाल के हिन्दू के लिए गंगास्नान, काशी सेवन, और कन्याकुमारी से कश्मीर तक की पूण्य स्थल के दर्शन की जो अभिलाषा रहती है वही भारत के हिन्दू के मन में हिमालय का आकर्षण, पशुपतिनाथ और मुक्तिनाथ दर्शन की अभिलाषा रहती है ।

राजनीतिक सम्बन्ध

महाभारत के सभापर्व में यह उल्लेख है कि धर्मांकर जो नेपाल पर शासन करने वाला सबसे पहला शासक था भारत का था । नेपाल के आदिवासी किरात माने जाते हैं जिन्हें महाभारत में क्षत्रिय कहा गया है । इतिहास में वर्णित है कि अजातशत्रु परास्त होकर नेपाल की ओर आया था । डॉ. एल डी जोशी की पुस्तक खस फैमिली लॉ  में जिक्र है कि ठकुरीवंश भी जो खसों की एक शाखा है हिन्दी क्षेत्र से यहाँ आए थे । खसवंश आर्यों की ही एक शाखा है । बस्नेत, भण्डारी, कार्की, खड़का, अधिकारी, विष्ट, कँुवर, दानी, वर्ती, खत्री आदि क्षत्रियों के अतिरक्ति खसों में ब्राह्मण भी हैं । बालचन्द्र शर्मा की पुस्तक नेपालको ऐतिहासिक रुपरेखा में उल्लेख है कि शाक्य भी आत्मरक्षार्थ आए थे  । मल्लों की दो शाखाएँ नेपाल में पाई जाती हैं, जिसमें से एक ने जुम्ला में अपना राज्य स्थापित किया । मानदेव (पाँचवी शताब्दी) के चाँगुनारायण के शिलालेख में पूर्वागत मल्लों का उल्लेख है । इतिहासकार श्री गेशेफ टुची इन मल्लों का आगमन गढ़वाल से मानते हैं ।  दूसरी मल्लशाखा नेपाल की है जो १२२८ ई. में गयासुद्दीन द्वारा खदेड़े जाने पर सिम्रोनगढ़ होती हुई नेपाल उपत्यका में पहुँची थी । प्रतापगढ़ मल्ल के शिलालेख से यह ज्ञात होता है कि उसके पूर्वज कर्नाटक से आए थे । वंशावली के अनुसार उपत्यका के नेवार दक्षिण भारत से आए थे । हरिसिंह देव के मंत्री चण्डेश्वर जो विद्यापति के पितामह थे उन्होंने नेपाल के रघुवंशी महीपों का उन्मूलन कर पशुपतिनाथ का स्वयं स्पर्श किया और वांगमती(बागमती) के किनारे आत्म तुलादान किया । स्वयं विद्यापति वर्तमान नेपाल के सप्तरी जिले में पुरादित्य के आश्रय में रहे और वहीं उन्होंने लिखनावली की रचना की । इतिहासकार शाहवंश का सम्बन्ध चितौड़ से मानते हैं और उनके पूर्वज कुम्भकर्ण को कुमाउँ का बताते हैं । कुछ इन्हें पश्चिम भारत का मानते हैं जो मुसलमानों से त्रस्त होकर नेपाल में आ बसा था । राणा अपनी वंश परम्परा सिसौदिया वंशज राणाओं से जोड़ते हैं । वैसी और चौबीसी के अधिकांश शासक हिन्दी भाषी राजपुताना से नेपाल आए थे । पाल्पा का सेनवंश चितौड़ से आकर बेतिया के पास बसा । तनहुँ के राजवंश और पाल्पा के शास्कों का एक ही मूल रहा । नेपाल के ब्राह्मण प्रायः भारत से आए हुए हैं । कुमाउँ के ब्राह्मण यहाँ अपने आपको कुमैया कहते हैं । श्री सूर्य विक्रमज्ञवाली के अनुसार अज्र्याल, सिग्द्याल तथा पौड्याल का पूर्वज एक ही हैं और वो हैं कान्यकुब्ज ब्राह्मण । ये इतिहास का विषय है जहाँ का शोध यह बताता है कि भारत से किसी भी कारण से भागे हुए भगौड़े नेपाल आए और यहाँ आकर बस गए ।

जिस तरह नेपाल में भारतीयों ने शरण लिया उसी तरह यहाँ के लोग भी भारत में शरण पाते रहे हैं । पृथ्वीराज से पराजित रणजीत मल्ल ने बनारस में शरण लिया । बेतिया नेपाल के शरणार्थियों को शरण देता रहा । कोतपर्व के बादशाह राजा राजेन्द्र ने बनारस में शरण पाई । डंकर फोर्बेस के शब्दों में विश्व इतिहास में राष्ट्रीय विद्रोह का नेतृत्व करने वाले प्रथम राजा त्रिभुवन शाह ने दिल्ली जाकर शरण लिया था । आधुनिक नेपाल के प्रवासी नेता देवीप्रसाद सापकोटा बनारस रहे और वहीं से साप्ताहिक गोरखाली पत्र निकाला । वर्तमान में कोइराला से लेकर प्रचण्ड तक ने जनान्दोलन के समय भारत में जाकर शरण ली है । कहने का तात्पर्य यह है कि ये दोनों देश इतने करीब रहे कि एक दूसरे के लिए  बुरे वक्त का आसरा बनते रहे । सबसे बड़ी बात तो यह कि आज जो खस, क्षत्रिय खुद को यहाँ का मूल निवासी बताते हुए तराई क्षेत्र के निवासी को भारतीय कह कर दुष्प्रचार कर रहे हैं वो स्वयं भारतीय मूल के हैं और इसका इतिहास साक्षी है ।

आधुनिक नेपाल के राजनीतिक सम्बन्ध ऐतिहासिक हैं । भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में जननायक बीपी कोइराला के नेतृत्व में नेपाल के राजनेताओं की सहभागिता रही वहीं नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में भारत का नैतिक समर्थन और सहयोग रहा है ।

व्यापारिक सम्बन्ध

चाणक्य के समय में नेपाल में कम्बल, खालें, कांचन रस, मैनसिल, शिलाजीत अधिक मिलते थे । आयुर्वेदिक औषधियों के मूल द्रव्य भी यहीं मिलते थे । इसलिए इनका निर्यात नेपाल से होता रहा । कर्कपैट्रिक ने जो विवरण दिया है उसके अनुसार नेवार घरेलू उद्योग धन्धों में बड़े निपुण रहे । ताबां, पीतल तथा काष्ठकला में नेपाली कारीगर की निपुणता आज भी देखी जा सकती है । नेपाल से भारत बर्तन भेजे जाते रहे हैं । घी, सेमर की रुई तथा तेल का निर्यात नेपाल से होता रहा है ।

भारत से नेपाल का व्यापारिक सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है । १७९२ में कम्पनी सरकार और नेपाल के बीच व्यापारिक समझौता हुआ  । अँग्रेजों ने नेपाल से लड़ाई इसलिए छेड़ी थी क्योंकि गोरखों ने नेपाल के साथ उनके व्यापार को रोक दिया था । नेपाल का भारत से आयात निर्यात सबसे अधिक होता रहा है और आज तक हो रहा है । जरुरत की सारी सामग्री नेपाल भारत से आयात करता है । नेपाल तथा भारत के उत्तर सीमावर्ती प्रदेशों का नेपाल के साथ प्राचीन काल से व्यापारिक सम्बन्ध रहा है और इसकी वजह से परस्पर एक दूसरे का प्रभाव पड़ता रहा है ।

शैक्षिक सम्बन्ध

प्राचीन समय से नेपाल का अध्ययन स्थल हिन्दी प्रदेश रहा है । नेपाल के राजनीति विशारद, कलाकार, साहित्य निर्माता तथा न्यायशास्त्री भारत के सीमावर्ती क्षेत्र से शिक्षा प्राप्त करते आए हैं । त्रिभुवन विश्वविद्यालय के अस्तित्व में आने से पहले पटना विश्वविद्यालय द्वारा यहाँ की शिक्षा संचालित होती थी । आज भी विशेष शिक्षा हेतु छात्र भारत जाते हैं । काशीपूरी प्राचीन काल से नेपाली नागरिक का अध्ययन स्थल रही है । बौद्ध काल में नालन्दा, विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में नेपाली शिक्षार्थी अध्ययन करते रहे हैं ।

वाणीविलास पाण्डेय, पद्मविलास पन्त, तेजबहादुर राणा, ऋषिकेश उपाध्याय, हरिदयाल सिंह हमाल, पद्मप्रसाद ढुँगाना, देवीदत्त पराजुली इन सबकी शिक्षा दीक्षा काशी में हुई है । नेपाल के शासक ही नहीं शासित भी भारत में जाकर शिक्षा ग्रहण करते आए हैं जो आज भी कायम है ।

वैवाहिक सम्बन्ध

इन दोनों देशो के बीच रिश्तों का सबसे मजबूत आधार वैवाहिक सम्बन्ध रहा है । कह सकते हैं कि पारिवारिक सम्बन्ध से गहरा कोई और सम्बन्ध नहीं होता । हालाँकि आज के परिवेश में इन रिश्तों के बीच राजनीतिक कटुता आ गई है । किन्तु इतिहास बदला नहीं जा सकता और इतिहास गवाह है कि नेपाल और भारत का पारिवारिक सम्बन्ध सदियों का रहा है । राजघरानों से लेकर सर्वसाधारण तक के रिश्ते दोनों देशों के बीच होते रहे हैं । नेपाल के राणा, राजा, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि लगभग सभी सम्बन्ध भारत से रहे हैं । मौर्यों और नेपालियों के बीच विद्वानों ने अनेक सम्बन्धों का पता लगाया है । विशेषकर भारत का उत्तरी हिन्दी क्षेत्र और नेपाल के दक्षिणी तथा केन्द्रीय भाग लगभग सभी दृष्टियों से एकतान्वित हैं । उनका आपसी सम्बन्ध अच्छेद है ।

आज के सन्दर्भ में भी नेपाल और भारत का सम्बन्ध बहुआयामिक और व्यापक है । नेपाल के आर्थिक, प्राविधिक, सामाजिक और व्यवस्थापकीय विकास में भारत का महत्तवपूर्ण योगदान रहा है । भारत का सहयोग नेपाल के सामाजिक आर्थिक रूपान्तरण में बहुत बड़ा योगदान रहा है । भारत सरकार ने नेपाल में विभिन्न शैक्षिक, स्वास्थ्य और पोलीटेक्निक संस्थाओं की स्थापना कर नेपाल के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है । सड़क, रेलवे का विस्तार, सिंचाई और जलविद्युत आदि क्षेत्रों में भारतीय सहयोग सराहनीय रहा है । भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल यात्रा के समय कहा था कि नेपाल दक्षिण एशिया का गर्व है और नेपाल का चहुँमुखी विकास भारत की चाहत है ।

ये और बात है कि राजनीति कई बार इन दोनों देशों के बीच के प्रगाढ़ रिश्ते को कमजोर करने की कोशिश करती रही है । दिलों में कड़वाहट आती रही है किन्तु सम्भवतः इन रिश्तों की नींव इतनी मजबूत है कि यह इन प्रहारों से विचलित नहीं हुई है । भारत नेपाल के साथ हर सुख दुख में खड़ा मिला है, इससे नेपाल की जनता इन्कार नहीं कर सकती । जिसका सबसे बड़ा उदाहरण था २०१५ का महाभूकम्प । यह वह क्षण था जब नेपाल की गति थम गई थी, जिन्दगी कराह रही थी, आँखें सिर्फ राहत खोज रही थीं और उस समय सहारा और सहयोग का सबसे पहला हाथ भारत ने बढ़ाया था । सुख का साथ भूला जा सकता है पर दुख के सहयोग को भूलना मानवता और नैतिकता दोनों के खिलाफ है । मधेश आन्दोलन के समय हुई नाकाबन्दी का आरोप भारत पर लगा, पर इस सत्य से भी नेपाली जनता इनकार नहीं कर सकती कि अगर सचमुच भारत ने यह नाकाबन्दी की होती तो त्राहिमाम की स्थिति होती । परन्तु वह बुरा वक्त भी गुजरा और स्थिति सामान्य हुई ।

निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं कि सबसे अधिक मतभेद अपनों से ही होता है क्योंकि वही आप के ज्यादा करीब होते हैं और इसलिए अच्छाई और बुराई दोनों से वाकिफ होते हैं । परन्तु मतभेद के बावजूद भी वो आप के अपने ही होते हैं । क्षणिक कटुता आती है और फिर मिठास में बदलती है । नेपाल भारत के आपसी रिश्ते की नींव सिर्फ व्यापारिक या राजनैतिक होती तो परिदृश्य बदल सकता था । पर इन दोनों देशों के रिश्ते संस्कृति, धर्म और परम्परा से पोषित हैं, न तो ये कभी कमजोर हो सकते हैं और न ही इन्हें समाप्त करने की कोशिश कामयाब हो सकती है । नेपाल भारत मित्रता अमर रहे । 

नेपाल भारत मैत्री समाज द्वारा प्रकाशित स्मारिका से साभार

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