साजिश मधेश मुद्दा असफल करने की : कैलाश दास

मधेश मुद्दा को कमजोर और असफल करने में काँग्रेस, एमाले, माओवादी और संघीय समाजवादी फोरम नेपाल (उपेन्द्र यादव) का सबसे बडा षड़यन्त्र है ।


निर्वाचन से मधेशवादी दलो का मुद्दा कमजोर हुआ है लेकिन ‘मरा’ नहीं है ।


अगर मधेशवादी दल निर्वाचन में सहभागी होता तो कल का भविष्य अन्धकारमय रहता । ऐसी स्थिति में मधेशी जनता का झुकाव सिके राउत की ओर भी नहीं होता कहना मुश्किल है ।

दशक का मधेश आन्दोलन दुनिया को दिखा चुका है कि नेपाल की आधी जनसंख्या (मधेश भूमि) शोषित—दमित और अधिकारविहीन है । यही कारण था कि मधेश में अधिकार की लड़ाई ऊँचाई की सीढि़याँ चढ़ रही थी आज वही सिमटकर छोटी हो चुकी है । किन्तु लड़ाई का नेतृत्व करने वाला अर्थात् मधेशवादी दल को चूँ तक भनक नहीं होने दिया कि आखिर यह शक्ति है कौन ?
मधेशवादी दलों ने सबसे बड़ी भूल यह की है कि एक साथ काँग्रेस, एमाले और माओवादियों को विश्वास में लेकर चलने का प्रयास ही नहीं किया । कभी काँग्रेस सरकार की तो कभी माओवादी सरकार को समर्थन कर संविधान संशोधन के प्रयास मे लगे रहे । जबकि एमाले, काँग्रेस, माओवादी तीनों मधेशवादी दल से फायदे लेने के सिवा कुछ किया ही नही, चाहे राष्ट्रपति का निर्वाचन हुआ हो वा सरकार गठन की बात हो । इसका एक और जीता जागता प्रमाण स्थानीय तह के निर्वाचन का परिणाम भी स्पष्ट कर रही है ।
मधेश मुद्दा को लेकर काँग्रेस ने अपनी रोटी सेकने का भरपूर प्रयास तो किया, लेकिन जिस प्रकार सफलता मिलनी चाहिए इसमें असफल साबित दिख रही है । काँग्रेस की सरकार मधेश मुद्दा को उलझाकर मधेश में सबसे ज्यादा सीट लाना चाहता था, किन्तु परिणाम वैसा नहीं दिखा । काँग्रेस भलीभाँति जानती थी कि अगर मधेशवादी दल स्थानीय निर्वाचन में भाग लिया तो यहाँ सीट हमारी ही कम होगी । इधर नेपाली जनता शायद काँग्रेस की दोधार नीति समझ गई । मधेशवादी दल आन्दोलन में थे और एमाले जो भी किया अपनी नीति से अलग नहीं हुआ । ऐसी अवस्था में नेपाली जनता एमाले को ही सबसे ज्यादा मतदान देना बुद्धिजीवी समझा ।
जहाँ तक राष्ट्रीयता की बात है तो पहले यह समझना चाहिए कि नेपाली जनता में नेपालीपन का गौरव होना ही सबसे बड़ी राष्ट्रीयता है । किन्तु नेपाल का नया संविधान जारी से अब तक दर्जनों नेपाली संविधान संशोधन के वास्ते शहादत दे चुके हैं । इसके बावजूद भी आज भी मुद्दा जहाँ का तहाँ है । एमाले हो, काँग्रेस हो या माओवादी हो जब भी सत्ता में आए है राष्ट्रीयता की परिषाभा तो अवश्य दी है किन्तु राष्ट्र की जनता को हमेशा अराष्ट्रवादी समझी है ।
स्थानीय निर्वाचन दो चरण से तीन चरण में कर दिया गया है जिसमें से दो चरण का निर्वाचन हो चुका है । इसमें भी प्रथम चरण में माओवादी की सरकार ने मधेशवादी दलों से फायदा उठाया और दूसरे चरण में काँग्रेस की सरकार ने ।
एमाले की नीति तो पहले से ही स्पष्ट है, मधेशवादी दल का विरोध कर राष्ट्रवादी बनना । जब मधेश में ६ दल मिलकर ‘राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल (राजपा)’ गठन हुआ तो उन्होंने देखा मधेश में एमाले सबसे कमजोर सावित हो रही है । तो उन्होने संघीय समाजवादी फोरम नेपाल को फोड़ने का प्रयास किया और उसमे सफल भी हो गया ।
इस प्रकार देखा जाए तो मधेश मुद्दा को कमजोर और असफल करने में काँग्रेस, एमाले, माओवादी और संघीय समाजवादी फोरम नेपाल (उपेन्द्र यादव) का सबसे बडा षड़यन्त्र है ।
अब सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि संविधान संशोधन होगा कि नहीं ? अगर संविधान संशोधन हुआ तो कब और कौन करेगा ? यह तो स्पष्ट है कि फिलहाल किसी भी हालत में मधेशवादी दल का जो मुद्दा था सीमांकन, जनसंख्या के आधार में प्रतिनिधित्व, सरकारी कामकाज की भाषा मातृभाषा और नागरिकता का जो अन्तरिम संविधान में व्यवस्था है यथावत रखे इनमें से दो बाहेक सभी असम्भव है, इसका भी कई कारण है ।
स्थानीय निर्वाचन में एमाले, काँग्रेस और माओवादी का जिस प्रकार परिणाम दिख रहा है उससे स्पष्ट होता है कि सीमांकन और जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व फिलहाल संविधान में संशोधन नहीं किया जाएगा । जहाँ तक नागरिकता और भाषा की बात है वह भी इतनी असानी से संशोधन होगा कहना बड़ी मुश्किल है ।
नेपाल की राजनीति पर भारत, अमेरिका, चीन और पाकिस्तान की भी निगाहें अटकी हैं । ऐसी स्थिति में अगर मधेशवादी दल संविधान संशोधन कराने में सफल हुआ तो विश्व के नजर में स्थापित हो सकता है । फिर ऐसी स्थिति में मधेशवादी दल को कमजोर और असफल करने में षड़यन्त्र होना स्वभाविक है । जब मधेशवादी दल कमजोर और असफल होगा तो तीसरी शक्ति फिर से जन्म ले सकती है । ऐसी अवस्था में मधेशवादी दल को धैर्य और साहस से काम लेना ही उचित होगा ।
सबसे ज्यादा उत्सुकता और जिज्ञासा सभी में यह है कि मधेशवादी दल अर्थात राजपा इस निर्वाचन में भाग नहीं लेकर भूल किया है या उसका रास्ता सही है । तो इसमे स्पष्ट करना चाहूँगा कि स्थानीय निर्वाचन में भाग नहीं लेकर उन्होंने अपना मुद्दा जीवित रखा है । वैसे भी राजनीति में सफलता असफलता बड़ी मायने नहीं रखती है, मायने रखती है तो केवल संघर्ष । किन्तु इस निर्वाचन से मधेशवादी दलो का मुद्दा कमजोर हुआ है लेकिन ‘मरा’ नहीं है । अगर मधेशवादी दल निर्वाचन में सहभागी होता तो कल का भविष्य अन्धकारमय रहता । ऐसी स्थिति में मधेशी जनता का झुकाव सिके राउत की ओर भी नहीं होता कहना मुश्किल है ।
दो नम्वर प्रदेश बाहेक स्थानीय निर्वाचन हो चुका है, तो क्या अब भी राजपा के जो मुद्दा है जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व और प्रदेश का सीमांकन हेरफेर संविधान में संशोधन होगा ? यह सवाल बड़ा है किन्तु असम्भव नहीं है । तत्काल के लिए दिक्कतें हो सकती है किन्तु आनेवाला कल में यह मुद्दा जीवित ही रहेगा ।
संविधान संशोधन के लिए राजपा को किसी एक दल के साथ विश्वास में लेकर चलना सफलता नहीं है । एमाले, काँग्रेस, माओवादी और सभी छोटे—छोटे दलों के साथ आगे बढ़ने में ही सफलता और राजनीतिक निकास है । इधर मुल्क में शान्ति और विकास के साथ नेपाली जनता में राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए राजनीतिक निकास की ओर सभी दलों को एकजुट होने की आवश्यकता है ।

 

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