साप—छुछुन्दर के खेल में राज्य के सभी अंग फेल

कैलास दास: मधेश आन्दोलन का ‘घाव’ मिटा नहीं था कि आन्दोलन की लहर फिर से शुरु हो गई है । आन्दोलन का वही स्वरूप और गतिविधि मधेश राजनीतिक दल की ओर से निर्णय लिया गया है । आन्दोलन के स्वरूप में कुछ परिवर्तन अवश्य किया गया है । किन्तु इसका प्रभाव मधेश के जिलों में ही पड़ेगा यह भी निश्चित है ।
आन्दोलन का कहर केवल मधेशी जनता पर नही पहाड़—हिमाल में रहने वाले पर भी पड़ा था । अन्तर सिर्फ इतना था कि हिमाल—पहाड़ का शासक वर्ग मधेशी जनता के प्रति का विभेद अन्त नहीं करना चाहते थे और मधेशी जनता इस विभेद के विरुद्ध सड़क पर आग उगल रहे थे । यह सिलसिला ६ महीनाें तक चला जिससे नेपाल का अर्थतन्त्र धारासायी हो गया, शिक्षा और उद्योग धन्धे की बात तो दूर की बात है सरकारी कार्यालय तक बन्द रखना पड़ा ।
६ महीनों तक हुए मधेश आन्दोलन से कुछ भी उपलब्धि नहीं मिली यह बात नही है, किन्तु उपलब्धि से ज्यादा बर्बादी भी हुई इस सत्य को कोइ झुठला नही सकता । मधेश आन्दोलन से मानवीय, भौतिक एवं आर्थिक क्षति का लेखाजोखा तय कर पाना अब मुश्किल हो गया है । इसके वावजूद मधेश के नेतृत्व करने वाले दल बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं कि हमने विश्वपटल पर मधेश का नाम उँचा किया है । अन्तर्राष्ट्रीय स्तर में हमारी पहचान बनी है । इधर राज्य ने भी यह साबित कर दिया कि आन्दोलन लम्बा क्यों न चला हो लेकिन हम ने मधेशी जनता के आगे घुटना नहीं टेका । इस देश के पचास से ज्यादा नेपाली जनता राज्य द्वारा ही मारे गए फिर भी राज्य गर्व कर रही है कि आन्दोलन से हम झुके नही सरकार की पहचान बनी है । जबकि सारे संसार में नेपाल सरकार की इस रवैया से जगदुहाई हो रही है ।
ऐसी स्थिति में जनता ही निर्णय ले सकती है कि एक ओर राज्य जो संंविधान में मधेशी जनता का अधिकार सुरक्षित करने के मूड मेंं नहीं है, अधिकार के इस आन्दोलन में जनता के उपर राज्य ने गोलियाँ बरसायी है, देश का अर्थतन्त्र समाप्त कर दिया है । पड़ोसी मुल्क से सम्बन्ध को और अच्छा बनाने में सरकार नाकामयाब साबित हुई है । गत वर्ष आए विनाशकारी भूकम्प के समय पहाड़ हिमाल और तराई की जनता के बीच बने मधुर सम्बन्ध में दरार लाने में राज्य ने कोई कसर बाँकी नही रखी है । राष्ट्र नेता के रूप में पहचान बनाने की जगह राज्य स्तर के नेताओं से वाक युद्ध कर देश को हिंसा और गरीबी की दलदल में धकेल दिया है । पड़ोसी राष्ट्र भारत के साथ बेटी—रोटी के सम्बन्ध को समाप्त करने की कोशिश में यह सरकार कामयाब हुई है ।
दूसरी ओर मधेशवादी राजनीतिक दल जिन्होंने २०६३÷०६४ साल से मधेश केन्द्रित आन्दोलन करती आ रही । जिस सरकार के विरुद्ध आन्दोलन करती है कभी कभार उसी सरकार के साथ मिलकर सरकार बनाने से भी पीछे नही पड़ती । एक ओर आन्दोलन के नाम पर मानवीय, भौतिक, आर्थिक एवं शैक्षिक नुकसान पहुँचा रही है तो दूसरी और सांसद परित्याग करने से भी डरती है । ६ महीनों तक के मधेश आन्दोलन से मधेश का ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा जिन्हें लाखों रुपयों का नुकसान न हुआ हो । किन्तु मधेशवादी दल जिनका संसद भवन में रहने के बाद भी न तो संविधान बनाने के वक्त कुछ चल पाया और न ही संविधान निर्माण के बाद ही कुछ कर पा रहे हैं । फिर भी सत्ता और भत्ता के लालच में संसदीय पद त्याग करने से डरती है । जिन्होंने लगातार ६ महीनों तक बन्द हड़ताल कराने के बाद बिना कोई शर्त और सम्वाद के ही आन्दोलन स्थगित कर दिया है । किन्तु आज फिर से आन्दोलन का आह्वान किया है ।
आन्दोलन के आग में झुलस चुकी मधेशी जनता फिर से उसी आग में अपने आपको धकेलना नही चाहती । क्योंकि उन्हे पता है अभी तक के आन्दोलन से कुछ हाथ नहीं लगा है । जबकि जनता आन्दोलन नहीं अधिकार खोजने में लगी है । फिर से मधेशी जनता के माथे पर आन्दोलन का पहाड़ गिर पड़ा है । राज्य पक्ष मधेशी जनता की भावनाओं से खेलने में कोई कसर बाँकी नही रखी है । ऐसे में मधेशी जनता के साथ साँप और छुछुन्दर की स्थिति उत्पन्न हो गयी है । अर्थात् कहने का मतलव एक ओर राष्ट्रीय पार्टी है जो अपने आप को प्रमुख पार्टी कहलाते हैं और दूसरी ओर मधेशवादी सहित छोटी—छोटी पार्टी है । फिर भी यह कह पाना मुश्किल है कि साँप किसको माने और छुछुन्दर किसको ? यह निर्णय करने की बारी फिर से मधेशी जनता के कन्धे पर आ पड़ी है ।
इस साँप छुछुन्दर के खेल में देश की सारी निकाय फेल हो चुकी है । जहाँ जाएँ आन्दोलन से पड़े असर की बात अभी तक होती है । नेपाल जैसे प्राकृतिक सौन्दर्य और विविधता से भरा देश पर्यटन उद्योग से चलता है । जबकि अब पर्यटक इस देश में घूमने नहीं आना चाहते । इसकी प्रमुख वजह है सुरक्षा । वैसे तो विनाशकारी भूकम्प और मधेश आन्दोलन से तबाह हुए नेपाल घूमने आने वाले पर्यटक को लुभाने के लिए सरकार बर्ष २०७३ को पर्यटन बर्ष के रूप में मनाने की घोषणा कर चुकी है । इस योजना से नेपाल उबर पाएगा या नही यह कह पाना मुश्किल है ।
६ महीना तक चले आन्दोलन में मधेश के जिलो में आन्दोलन की आग अपनी चरम सीमा पर थी, मधेशवादी दल आन्दोलन से पीछे न हटने की बात कर रहे थे और दूसरी ओर राज्य पक्ष गोलियाँ बरसाने से पीछ नही हट रहा था । इसी कारण से नेपाल की जगहँसाई संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर पूरे विश्व में हुई है । इस आन्दोलन के क्रम में आन्दोलन की आग में झुलस रहे मधेश के जिलों में सारा सरकारी निकाय बन्द पड़ा हुआ था । आन्दोलन समाप्त होने के तुरन्त बाद इस सरकारी निकायो पर ऐसी भीड़ उमड़ी की पीछे पड़े काम भी सम्हाल पाना मुश्किल हो गया है । कहने का मतलब यह हुआ आन्दोलन का असर राज्य पक्ष या मधेशवादी दलों को नजर आया हो या ना हो लेकिन जनता पर प्रत्यक्ष असर पड़ा है । लेकिन सरकार ने अपने आतंक से जनता को और भी हैरत में डाल दिया है । मधेश बन्द के बाद खुले सरकारी कार्यालय सहित के निकाय पर उपभोक्ताओं की ऐसी भीड़ उमर पड़ी है कि उनका सम्भलना कुछ दिनों तक मुश्किल अवश्य है । फिलहाल कहा जाए तो ऐसी स्थिति में राज्य का सभी सिस्टम फेल नजर आ रहा है । बन्द के समय का भी कर देने का भार जनता पर पड़ा है । जनता कर के चक्कर में पिस रही है । जिससे जनता में कोहराम मचा हुआ है । लेकिन सरकार कान में रुई डाल के सोयी हुई है । इससे सरकार को कोई परवाह नही है । ऐसी ही स्थिति रही तो जनता उनको अपने स्थान में लाने में कोई कसर बाँकी नही रखेगी ।
इधर मधेशवादी दल मधेशी जनता की भावना समझ नही पा रही है । उनकी भावना क्या है, यह समझना उनका दायित्व है । कम से कम आन्दोलन को सफल बनाने के लिए । लेकिन मधेशवादी दल भी अपने दम्भ से हुंकार भर रही है । यह हुंकार किस के बल पर है यह समझ पाना थोड़ा कठिन है । उन लोगो को यह बात समझनी होगी कि कोई भी आन्दोलन जनता के बल पर उत्कर्ष पर जाती है न कि राजनीतिक दलों के बल पर । लेकिन इस यथार्थ को समझने में बार—बार मधेशवादी दल भूल करती आ रही है । फिर से आन्दोलन का कार्यक्रम मोर्चा सहित के संघीय गठबन्धन सार्वजनिक कर चुकी है । लेकिन दुःख की बात यह है कि फिर से उन लोगो ने वही गलती दोहराई है, जो इससे पहले दोहराई थी । इस बार भी आन्दोलन के कार्यक्रम को सार्वजनिक करते वक्त जनता की राय सुझाव को ताक पर रखते हुए आन्दोलन की घोषणा की गयी है ।
जनता को निर्णय करना है कि राज्य विरुद्ध आन्दोलन करे कि आन्दोलन के नेतृत्वकर्ताओं से सवाल करे कि हम लोग कब तक आन्दोलन करते रहेगें ? तुम लोग कब तक जनता को भूल भूलैया में रखकर इस प्रकार जनता को आन्दोलन के दलदल में धकेलते रहोगे ?
इस बरबादी की वजह सिर्फ मधेशवादी दलों को माने यह उचित नहीं होगा, इस बरबादी के पीछे प्रमुख पार्टियाँ भी उतनी ही जिम्मेवार है । मधेशी जनता ने ६ महीनों तक आन्दोलन किया किन्तु उन पार्टियों ने पूरे नेपाल को समेटने की बजाय सिर्फ पहाड़ पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रखा है । जबकि राज्य का दायित्व होता है पूरे देश को एक सूत्र में बाँध के रखे, जिसमें यह पार्टियाँ कहीं भी खरा उतर नही पायी है । पहाड़ की जनता को ललचाने के लिए मधेशी जनता के भावनाओं को मजाक उड़ाने में देश की प्रमुख पार्टियाँ लिप्त हैं । कहा जाए तो नेपाली राजनीति की धुरी मधेश के बल पर चलती है । यह बात नेपाली कांग्रेस के संस्थापक नेता वीपी कोईराला बार–बार अपने भाषण में बोलते थे । लेकिन उनके जैसी दूरदर्शिता अभी के राज नेताओं में अब नही रही है । उन पार्टियोँ को यह अब निर्णय करना होगा कि पूरे नेपाल को एक सूत्र में बाँधना है या नही ।
नेपाली जनता विगत एक दशक से बार–बार आन्दोलन करती आ रही । आन्दोलन से बरबादी ही होती है । यह बात अलग है कि आन्दोलन के बल पर ही नेपाल में अधिकार संस्थागत होती आ रही है । इस परम्परा को अब समाप्त करना पड़ेगा । नेपाली जनता ने जितना समय आन्दोलन करने में लगायी है उतना समय देश के विकास में लगाया होता तो शायद नेपाल की स्थिति ऐसी न होती । नेपाल भी विश्व मानचित्र में अपना दमदार उपस्थिति दिखा पाता ।

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