सामाजिक रीति–रिवाज महिलाओं के अधिकारों को अप्रभावी बना देते हैं – मो. जाहित परवेज

महिलाओं की हीन, स्थिति की दृष्टि से जब हम मुस्लिम समुदाय पर दृष्टिपात करते हैं तो हमें गोरखा और कपिलवस्तु जिला अचानक अपनी ओर खींच लेता है । कहने का आशय यह है कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने एसएनवी के प्रोजेक्ट से ‘एन्थ्रोपोलोजिकल इनडेप्थ अनालाइसिस ऑफप विहावियर ऑफ मुसलिम वोमन पार्टिसिपेशन इन पब्लिक प्लेसेस’ विषय पर अनुसंधान किया था । Jahid Parwajअध्ययन में मैंने पाया कि गोरखा के मुसलमानों को मजहब के बारे में कुछ भी जानकारियां नहीं है । यहां तक कि उनकी भाषा, वेशभूषा, रहन–सहन आदि सारी चीजें अन्य जाति जैसी ही हैं । वहां महिला शिक्षा पर अधिक ध्यान दिया गया है । राजनीति में भी उनकी पहुँच है । स्थानीय संस्थाओं द्वारा तालीम भी दी जाती है । इस हिसाब से देखा जाय तो वहां की महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं । वहीं कपिलवस्तु की महिलाएं अधिक पिछड़ी देखी गयीं । यहां कि महिलाएं शिक्षा, रोजगार व राजनीतिक में बहुत पिछड़ी हुई हैं । इसकी खास वजह है अशिक्षा, गरीबी, पुरुष प्रधान समाज की बहुलता आदि ।
वैसे नेपाल पुरुष प्रधान समाज है । इसी का अनुसरण करते हुए मुस्लिम पुरुष भी अपनी महिला को बाहर नहीं जाने देता है । ज्यादा से ज्यादा महिला को मदरसा शिक्षा तक पढ़ाकर शादी कर देते हैं । जेनरल शिक्षा नहीं दी जाती है । कपिलवस्तु की महिलाओं में स्वास्थ्य की भी समस्याएं देखी जाती हैं । खासकर ग्रामीण महिलाएं अस्पताल नहीं जाती हैं । इसलिए कि अस्पताल में पुरुष डॉक्टर होेते हैं । जहां तक सवाल है परिवार नियोजन का तो मुस्लिम महिला परिवार नियोजन नहीं करती है और पुरुष भी करने से रोकते हैं । उनका मानना है कि संतान ऊपर वाले की देन है । वो जिसको चाहता है, उसे देता है, जिसे नहीं चाहता उसे नहीं देता है । खासकर इस्लामिक शरीअत की धारणा भी यही रही है । मुस्लिम महिला का जो सम्पूर्ण चित्र हमारे सामने उभरकर आता है, वह कुछ नये प्रश्नचिह्न खड़े कर देता है । हमारा सामाजिक रवैया और रीति रिवाज महिलाओं के अधिकारों को अप्रभावी बना देते हैं । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मुस्लिम समाज में शिक्षा, मोटिवेशन, विभिन्न प्रकार की तालीम की आवश्यकता है । अगर इस प्रकार की व्यवस्था की जाती है, तो इक्कीसवीं सदी में नेपाल की मुस्लिम महिलाएं बहुत आगे जा सकती है और बहुत कुछ कर भी सकती हैं ।
दूसरी तरफ महिलाओं को भी अपने पारिवारिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना है । घर से बाहर इस्लामिक शरीअत के तहत आर्थिक गतिविधियों में भाग लेते हुए एक सामाजिक समस्या का हल ढूंढ़ना है । वैसे समाज की तेजी से बदलती हुई आवश्यकताओं के कारण खासकर शहरी व पहाड़ी मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन हुए हैं । वक्त का तकाजा है कि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरष की तरह भागीदार बनें

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