साम्यवादी वर्गवाद और जातिवाद

बाबुराम पौड्याल:नेपाल में इन दिनों जाति जनजातियों के लिए जातीयरूपसे ही राजनीतिक अधिकारों को परिभाषित करने और उसके व्यवहारिक कार्यान्वयन के सवाल पर गैरसाम्यवादी ही नहीं साम्यवादियों के बीच भी भारी मतभेद चल रहे हैं । यह उन चन्द अहम् मुद्दों मंे एक है जिस पर दलों के बीच विवाद के कारण पहले संविधानसभा का विघटन हो गया था और दुसरे संविधानसभा में भी यह विवाद अब तक ज्यों का त्यों है । जाति को राजनीतिक पहचान के साथ जोडÞने की मंशा अपनेआप में एक बुरी बात नहीं है । नेपाल जैसे छोटे देश में सौ के आसपास छोटी बडÞी जाति जनजातियों का बसोबास है और लगभग सभी हिस्सों में जातीय हिसाब से मिश्रति आबादी है । कुछ अपेक्षाकृत बडÞी जातियों की ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहचान की चिन्ता भी है वहीं पर अन्य छोटी जातियों की पहचान को व्यवस्थित करना भी कम चुनौतिपर्ूण्ा नहीं है ।  ऐसे में किसी एक जाति की पहचान को प्राथमिकता देने व अनेक जातियों का साझा पहचान स्थापित करने को लेकर जो विवाद चल रहा है उसे बीतते समय के साथ अहंकार की चासनी में डाला जा रहा है । साम्प्रदायिक और जातीय सद्भाव नेपाली समाज के जो गुण अब तक कायम है उसके सामने सियासतदारों के बीच जो रस्साकसी चल रही है उसमें कोई खास दम दिखाई नहीं देता । कई लोग तो इस मतभेद को नेताओं के बीच मुछों की लडर्Þाई भर मानते हैं । हकीकत में संस्कृति लोगांे की अपनी जीवन शैली है । comunismइसलिए आम लोगों की जीवन शैली को समस्या के रूप में आगे लाकर नेताओं ने बहुत बडÞा मजाक बना दिया है । जातीय भावनात्मकता को अच्छी तरह न समझने के कारण दुनिया के कई देशों में खुनखराबे हुये हैं । जनता शान्ति और प्रगति चाहती है, खुनखराबा नहीं । वह क्रान्ति के नाम पर नाउम्मीद की हरदम खुनखराबा भी नही चाहती । इसी सर्ंदर्भ में इस आलेख में विशेषकर समकालीन  साम्यवाद के भीतर वर्गवाद और जातिवाद को लेकर चल रहे शंकाओं पर नजर डालने का प्रयास भर किया गया है ।    बदलते वक्त के साथ साम्यवाद और जातिवाद को अब बिल्कुल रुबरु खडÞा होना पडÞ रहा है । आजकल साम्यवादियों में इन दो सवालों को लेकर काफी अस्पष्टता है । विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि शीतयुद्ध के अन्त के साथ जब दुनियां में कई साम्यवादी शासनों का पतन ही नहीं हुआ अपितु साम्यवाद के पूंजीवाद और गरीब जनता के बीच होनेवाले वर्गसंर्घष्ा का पारम्परिक सिद्धांत पर ही व्यवहारिक रूपसे सवाल उठ रहे हैं । यह उसी से उत्पन्न निराशा का प्रतिफल है । जिसका प्रभाव दुनिया के समूचे साम्यवादी आन्दोलन पर पडÞा है । साम्यवादी गुटों में कुछ ने तो अब वर्गसंर्घष्ा के शब्द तक को उच्चारण करना बन्द कर दिया है और कुछ ने नाम तो भुलाया नही  है, परन्तु समकाल में संसदवादी बहुलवाद की चारों ओर बोलती तूती ने उसे व्यवहारिक नहीं बननेे दिया है । कुछ ने मार्क्स और लेनिन के जमाने में ही उनके खेमें से पुंजीवाद के दलाल के रूप में आरोपित सामाजिक जनवादी के शक्ल में ही रुपान्तरित होना उचित समझ लिया है । पारम्परिक वर्गसंर्घष्ा को मानते हुए स्वयं को पवित्र क्रान्तिकारी बतलानेवाले साम्यवादी तबके ने तो वर्गसंर्घष्ा के हिलते खुंटे के बगल में ही जतिवाद का एक और खुंटे को गाडÞते हुये धार्मिक, भाषिक, सांस्कृतिक समुदायों बीच की सुषुप्त अन्तरविरोध पर क्रान्तिकारिता की खेती के जरिए सदाबहार द्वन्द के बीच अपने को गर्म बनाए रखना मुनासिब समझा । शायद वे यह समझ रहे है कि नेपाल के अन्दर जितनी सब सामाजिक आन्तरिक अन्तरविरोध हैं उन सबको अभी ही समाधान करना होगा और यही रास्ता उनके अपने लिए भी राजनीतिक फायदे का है ।  र्सवहारावाद के मुकाबले जातिवाद ही उनका फिलहाल प्रमुख और प्रगतिशील मुद्दा है । एकबात यह भी है कि मार्क्स, लेनिन और माओ की सौ दो सौ साल पुरानी सिद्धांत और व्यवहारिकता को इस समय किस हद तक परिमार्जन किया जाना आवश्यक है, इसका कोई बनाबनाया सूत्र नहीं है । इसलिए भी साम्यवादियो के बीच यह कभी समाधान न होने वाला मसला बना रहेगा । साम्यवाद के नाम पर खुली तमाम राजनीतिक दलों की उसूलों में दिखती भारी विविधता का यह भी एक कारण है । इस स्थिती को साम्यवादियों की बेइमानी नहीं, अन्योल या मजबुरी कहना ज्यादा उचित रहेगा ।
एक शंका यह भी है कि कहीं साम्यवाद का सबसे लोकप्रिय अन्तरराष्ट्रवाद, दुनिया के गरीब मजदूर किसानों को तमाम फिरकों के दायरे ही नहीं देशों के लकीरों तक को लांघते हुये एक होने की अपील जो थी, अब उसकी जगह कौम और मजहब की साम्प्रदायिक मुक्ति का नाम न आए । कुछ ही समय बाद अगर साम्यबाद के नाम पर क्रान्तिकारी हिन्दु, इर्साई, मुस्लिम दल और जाति के नाम पर तरह तरह के साम्यवादी कहे जानेवाले दलों को कुुकुरमुत्तों की तरह फैलता देखना भी पडÞ सकता है । क्या मार्क्सवाद का स्वरूप अन्तरराष्ट्रवाद से राष्ट्रवाद और उससे अब जातिवाद की ओर स्खलित हो रहा है या फिर प्रगति कर रहा है ־ समझ पाना आसान नहीं है । इससे यह भी अन्दाजा लगाया जा सकता है कि शीतयूद्ध के पतन के बाद दुनिया के साम्यवादी आन्दोलन में जो सैद्धांतिक असमंजसता आई थी, उससे सामूहिक ढंग से निपटने का कोई अन्तरराष्ट्रीय मंच अब उनके पास नहीं था । उनके अपने ही बीच अक्सर चलनेवाली जूतपैजारी के कारण अन्तरराष्ट्रवाद तो दूर हमवतन साम्यवादियो एक दुसरों को आदर, सलाह मशविरा करने की संस्कृति भी काफी पहले ही पीछे छुट चुकी है ।  ऐसे में हरेक साम्यवादी गुट ने अपने स्थानीय विशिष्ट परिस्थिति के नाम पर सैद्धान्तिक तुकबन्दी को जोडÞÞ कर स्वयं को अपने ही जमीन का असली क्रान्तिकारी घोषित करना शुरु कर दिया है । संसदवाद के आसपास ही घुमने की उनकी मजबूरी ने समस्याओं से जुझते फिरकापरस्तों की बात छोडिÞए शोषक, दलाल,गुण्डों के साथ भी दोस्ती करना सिखा दिया, चूंकि उनको चुनाव में हरहाल मेेेे जितने की चाह की बीमारी लग चुकी है । उनके ही द्वारा जनविरोधी बर्ुजुवा कहे जानेवाले ताकतों में और स्वयं उनमंे र्फक करना अब सहज नही है । इस कशमकश में उनका मेहनतकश गरीब आम लोगों के बीच का सम्बन्ध भी अब बिल्कुल अलग־थलग पडÞता दिखाई दे रहा है । वे जाति की चिन्ता तो कर रहे है परन्तु इस चिन्ता से सीधा लाभ जातियों के खातेपीते एलिटों, जो कभी पर्ूववर्ती शासकों के शक्तिवृत में भारदारी करने में मशगुल रहते थे, को ही मिलता दिखता है, निचले तबकों नहीं । एक और हिस्सा है जो जतिवाद को जातीय ही नहीं वल्कि देश का ही बिखण्डन मानते हुये उसे नकारता है और पीछे लौटने का आभाष देता है । ये दोनों चिन्तन देश और आम मेहनतकश जनता की एकता, अमनचयन और तरक्की के लिए बेहद खतरनाक परिणाम देनेवाले है । जतिवाद किसी भी शक्ल में अगर सम्प्रदायिक अहंकार का रूप ले ले तो समाज और देश के बुरे दिन निश्चित है ।
आसपास के कुछ अनुभवों को देखकर ऐसा लगता है कि साम्यवाद और जातिवाद का बहुत देर तक हमसफर होना नामुमकिन है । एक की प्रगति के लिए दुसरे का कमजोर होना आवश्यक है । साम्यवाद की दुनियां में अब बुरे दिन चलरहे हैं फिर भी नेपाल में साम्यवादियों के प्रति जनता का जबरदस्त र्समर्थन है जिसे देखकर बाहर के लोग भी आर्श्चर्य में पडÞते है । परन्तु गुट औेेेेेर फूट के कारण उनकी प्रभावकारीता महत्वपर्ूण्ा घडÞी पर बारबार कमजोर  दिखता है । उनकी नीतियों में खामियों का पुख्ता सबूत है यह ।  इसके बाबजुद नेपाल में उनकी अब तक बढÞती लोकप्रियता का सबसे बडÞा कारण यही है कि नेपाल में एकीकरण के बाद विभिन्न कारणेंा से जातिवाद कमजोर पडÞता गया था । सन् ज्ञढद्धढ में स्थापित नेपाल की साम्यवादी पार्टर्ीीो इसका प्रत्यक्ष लाभ मिला । अगर उस समय जातिवादी प्रभाव होता तब साम्यवादियों का यह विकास असम्भव था ।
जातीय अहंकारवाद का सबसे भयानक रुप रुवान्डा में हुतु और तुत्सी जातियों के बीच के द्वन्द में देखा जा चुका है । साम्यवादी पर्ूव यूगोस्लाविया के विखण्डन के बाद र्सव और क्रोट्स के बीच की खुनी वैमनस्यता जगजाहेर है । पडÞोसी देश भारत भी साम्प्रदायिक अहंकार की समस्याओं से जुझता आ रहा है । हिन्दू मुस्लिम दंगे -जिसे भारत पाकिस्तान विभाजन की विरासत भी माना जा सकता है) और जातीय टकराव की कई घटनाएं सुनने को मिलती है । भारत के कश्मीर में धार्मिक साम्प्रदायिकता जोरों पर है इसलिए वहां भारतीय साम्यवादियों का कभी भी फैलाव सम्भव नही हुआ । माओ के जमाने में पूर्वोत्तर भारत के नागा और मणिपूरी व्रि्रोहियों को साम्यवादी हथियारबन्द आन्दोलन के रूप में आगे बढाने का प्रयास बेइजिङ ने किया था परन्तु वहां के लोगों की प्रबल जातीय संवेदना के कारण यह प्रयास सफल नही हो सका । सन् १९७१ में असम और मेघालय में बंगला भाषियों के खिलाफ बडेÞ दंगे हुये । यह सिलसिला रह रहकर अब भी चल रहा है । वहां भी कभी साम्यवादी अपनी पहचान नही बना पाये  । पंजाब स्वधीनता के बादवाले दिनों से ही साम्यवादी प्रभाव के लिए जाना जाता था परन्तु राष्ट्रवाद के रूप में उठे जातिवादी खालिस्तानी आन्दोलन ने साम्यवादियो का सूपडÞा साफ कर दिया । बिहार का साम्यवादी आन्दोलन भी अक्सर वर्गवाद के बदले उच्चवर्ण्र्ााहन्दुओं के खिलाफ भडÞकाव का शिकार बनता रहा हैै । मध्यपर्ूर्वी कुछ राज्यों में माओवादी आदिवासियों के बीच में सक्रिय हैं परन्तु उनलोगों ने जनता को गोला बारुद तो दिया है, आम लोगों को शान्ति और विकास सोच से ही वंचित रखा । महाराष्ट्र में उत्तर भारत के हिन्दी भाषियों के खिलाफ फैलता जहर और उसी कीचडÞ में खेलतीं कुछ राजनीतिक पार्टियों का खेल शर्मसार कर देनेवाला है । क्या नेपाल की साम्यवादी शक्तियां इस ओर समय रहते ध्यान दे पायेंगी – भारत जैसे जातीय विविधतावाले देश में भाषिक अर्थात् जातीय रूप से राज्यों के निर्माण हुये पचास साल पुरे होने से पहले ही अन्य जातियों ने भी राज्य की मांग की । अकेले पूर्वोत्तर भारत का असम राज्य को तोडÞकर अन्य छह राज्य बनाए गए । बादवाले दिनों में बने उत्तराखण्ड, झारखण्ड, तेलंगना जाति वा भाषा के नाम पर नही रखे गये हैं । शायद यह राज्यों के नाम को लेकर दिल्ली के बदलते सोच का परिणाम है ।
बढते जातीय,धार्मिक सचेतनता, और साम्यवादी पार्र्टियों की इस मसले पर गैरजिम्मेवारना रवैये के कारण मैदान में जातिवाद और साम्यवादी वर्गवाद को शायद भविष्य में जीवनमरण का संर्घष्ा करना पडेगा । यह एक यथार्थ से कहीं अधिक संवेदना से संबन्धित बात है जिसे इतने हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए कि आनेवाली पीढी को देने के लिए हर नेपाली के पास कम-से-कम शान्ति और विकास की संभावना भी न बचेे ।
दबदगचamउयगमथबघिछद्दgmबष्।अिom

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