सावधान ! मधेश के लुटेरे !!

कैलास दास:संविधानसभा का निर्वाचन होगा या नहीं अभी भी अनिश्चित है। परन्तु मधेशी जनता की जो आवाज हमारे कानो तक पडÞी है वह किसी को भी झकझोर देनेवाली बात है। जनकपुर के जनक चौक पर जमा हुए कुछ लोग बोल रहे थे- ‘अब जनता की बारी है। इसका मतलव पूछने पर उन लोगों ने बताया कि पिछले चुनाव में जनता ने बडÞी आशा और विश्वास के साथ जो उम्मीद रखकर मतदान किया था, उसका फल उलटा मिला। मधेशी नेताओं ने ‘राजतन्त्र से भी बदतर बना दिया है मधेश को। गणतन्त्र स्थापना के करीब सात वर्षके दरमियान में एक समय नेपाल का ही सबसे बडÞे कारखाना के रूप में सञ्चालित जनकपुर चुरोट कारखाना बन्द हो गया। उद्योग के क्षेत्र में यह काला दिन माना जाएगा। नेपाल का एक मात्र ‘नेपाल रेल्वे’ का भी वैसा ही हाल है। मधेश के कल-कारखाने धराशायी होते गए और मधेश की ठेकेदारी का दावा करने वाले दल चूं तक नहीं बोल सके।

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सावधान ! मधेश के लुटेरे !!

साहित्यकार रामभरोस कापडÞी के शब्दो में कहा जाए तो ‘जनकपुर चुरोट कारखाना एक इतिहास है, जिस समय नेपाल के कुछ ही शहरों में विजली थी, उसी समय से विजली पर चलने वाला यह कारखाना जनकपुर में सञ्चालित हुआ। पिपरा निवासी तत्कालीन उद्योग मन्त्री स्व रामनारायण मिश्र के संर्घष्ा के बलबूते से यह कारखाना वि.स.२०२१ में जनकपुर में स्थापित हुआ था। अगर जनकपुर चुरोट कारखाना जनकपुर में सञ्चालित न होता तो आज जनकपुर औद्योगिक शहर के रूप में परिणत नहीं हुआ होता। यहाँ के व्यक्तियों को शिक्षित, जमीन की कीमत में वृद्धि, पत्रपत्रिका प्रकाशन तथा सबसे ज्यादा कहा जाय तो लोगो में नोकरी के प्रति आकर्षा बढÞना इस कारखाना की ही देन है। उस समय कारखाना को देखने के लिए ग्रामीण क्षेत्र के लोग ही नहीं, विदेशी भी आया करते थे, खास करके भारत से। कारखाना का ‘साइरन’ र्-हर्न) का अपना ही महत्त्व था। सुबह ६ः३० और दिन दिन के ३ः०० बजे बजनेवाला साइरन आज हमेसा के लिए गूंगा हो गया है। सबों को जगाने वाला जनकपुर चुरोट कारखाना खुद हमेसा के लिए सो गया है। परन्तु इसकी चिन्ता न तो यहाँ के स्थानीयवासियों को है और न ही कारखाना के नाम पर राजनीति करने वाले राजनेताओं को।
जब कारखाना प्रारम्भ हुआ तो इसमें ३९५० कर्मचारी कार्यरत थे। कारखाना इतना नाफा में जा रहा था कि नेपाल राष्ट्र बैंक भी रूपैया जमा करने से कतराता था। कर्मचारियों को भी पर्याप्त सुविधा दी जाती थी। परन्तु २०४६ साल में जब बहुदल आया तो कारखाना में राजनीतिकरण होने लगा। प्रजातन्त्रवादी नेताओं ने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण इसे बरबादी की ओर धकेला। इसीका परिणाम है कि विराटनगर में सञ्चालित जूट मिल और जनकपुर का सर्ुर्ती -खैनी) कारखाना बन्द हो गया। लेकिन शाही शासनकाल में स्थापित जनकपुर चुरोट कारखाना ने प्रजातन्त्र का सामना तो किया लेकिन गणतन्त्र में अपना दम तोडÞ दिया और इसकी चिन्ता किसी ने नहीं जतायी।
मुझे अफसोस है वैसी राजनीति करनेवालों पर जिन्होंने विकास के नाम पर सफेद झूठ बोलकर भी जनता के बीच में चर्चा पाई, उन्हे समझना चहिए कि राजनीति करने के लिए विकास की आवश्यकता होती है। परन्तु विकास का अड्डा ही समाप्त हो जाए तो वहाँ की राजनीति स्वयं समाप्त हो जाएगी। मुझे लगता है इस बात को मधेशी नेता ठीक से नहीं समझ सके हैं। जनकपुर का धरोहर समाप्त हो गया है, जिसे इतिहास कभी नहीं भूलेगा। आनेवाली पीढÞी सवाल करेगी- ऐसा कौन सा ‘साइरन’ था जो अभी नहीं है। लालटेन की जगह बिजली देनेवाला कौन कारखाना था जो अभी नहीं है। कल के दिन में भले ही यह एक पन्ने में सीमित हो जाए।
जनता में गणतन्त्र की अनुभूति- अधिकांश कलकारखाना बन्द, बिजली बत्ती की जगह लोडÞसेडिÞङ्ग, महँगी शिक्षा-दीक्षा, बढÞती हत्या हिंसा, वैदेशिक रोजगारी पर निर्भरता, कलम की जगह हाथ हथियार, झूठे भाषण, विकास के नाम पर भ्रष्टाचार, स्वच्छ, सुन्दर सहर की जगह गन्दगी, बच्चों के ऊपर बढÞते नकारात्मक असर से हो तो ऐसा गणतन्त्र के प्रति नेपाली जनता में शीघ्र ही घृणा बढÞने लगेगी।
मधेश आन्दोलन का लक्ष्य था- वषर्ाें से शोषित अधिकार को सुनिश्चित करना। किन्तु मधेश आन्दोलन से जन्मे नेताओं ने इस आन्दोलन को ‘स्वायत्त मधेश एक प्रदेश’ का नारा देकर मधेश की भूमि को मरुभूमि कर दिया। सात वषर्ाें में ऐसा कोई विकास नहीं हुआ है, जिससे मधेशी जनता गणतन्त्र की अनुभूति कर सके। मधेशी जनअधिकार फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव मधेश आन्दोलन से मसीहा कहलाने लगे। परन्तु जब उन्हे भी कर्ुर्सर्ीीमली तो मधेश का मुद्दा ही नहीं मधेश को ही भूल गए। वैसे भी हमारे समाज में कहावत है- खानदानी गुण-दोष का प्रभाव सब पर पडÞता ही है। फोरम नेपाल से फोरम लोकतान्त्रिक निकला, जिसके अध्यक्ष विजय कुमार गच्छेदार हुए। फूटने क्रम में इसीतरह फोरम मधेश के अध्यक्ष भाग्यनाथ गुप्ता, तर्राई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टर्ीीेपाल के अध्यक्ष महेन्द्र यादव, मधेश समाजवादी पार्टर्ीीे अध्यक्ष शरदसिंह भण्डारी हैं। फोरम मधेश फिलहाल मझधार में है। लेकिन उपेन्द्र यादव परराष्ट्र मन्त्री, विजय कुमार गच्छेदार गृहमन्त्री, महेन्द्र यादव उद्योग मन्त्री बने, शरद सिंह भण्डÞारी वे भी मन्त्री बन चुके हैं। इतने बडÞे बडÞे पद पाने के बाद भी मधेश विकास के लिए वे कुछ नहीं कर सके।
मधेश आन्दोलन से भी पहले गठित नेपाल सदभावना पार्टर्ीीी चर्चा की जाए तो उसका भी वही हाल है। फिलहाल वह भी चार खण्डÞो में विभाजित है। सद्भावना पार्टर्ीीें राजेन्द्र महतो समूह संगठित और शक्तिशाली माना जाता है। होना भी स्वाभाविक है। राजेन्द्र महतो लगातार पाँच बार मन्त्री बन चुके, परन्तु वे भी मधेश के लिए सफेद झूठ के सिवाय कुछ नहीं दे सके। मधेश के हित में जितनी भी पाटियाँ खुली, ‘चोर चोर मौसेरे भाई’ बन कर उन्होंने काम किया है। अगर सही मायने में मधेशी जनता मूल्यांकन करे तो उन लोगों का जो नारा था- २४० वषार्ंे से मधेशी जनता शोषित पीडिÞत रही है। अब लगता है इन सात वषर्ाें कों भी उसी २४० वर्षों में जोडÞना होगा। मानता हूँ कि प्रजातन्त्र में मधेश का विकास नहीं हुआ है। लेकिन दर्ुभाग्य यह है कि विकास न होने का क्रम अभी भी जारी है।
काँग्रेस टे्रड यूनियन के अध्यक्ष रामदेव पंजियार, जो जनकपुर चुरोट कारखाना में कार्यरत हैं उनके अनुसार चुरोट कारखाना को धराशायी करने में सरकार मुख्य जिम्मेवार है। कर्मचारी और यूनियन को दोष देकर जिम्मेवारी टारने की बात होती है। अगर नेपाल सरकार कानून ऐन अनुसार कारखाना को चलाना चाहती तो यूनियन और कर्मचारी कोई विरोध नहीं करते। लेकिन पंजियार की बात भी सच नहीं है। कारखाना को धाराशायी बनाने में कर्मचारी भी उतने ही दोषी हैं। कारखाना बन्द कर  आन्दोलन करना, दिनरात भ्रष्टाचार में लिप्त रहना, करखाना की सम्पत्ति तक बिक्री करने के षडÞयन्त्र में लगे रहना, इसके लिए कर्मचारी ही दोषी हैं।
नेपाल की बडÞी पार्टर्ीीे अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ने भी एक कार्यक्रम में कहा कि मुझे मधेश से प्रेम हो गया है। सवाल उठता है- कैसा प्रेम – चुनाव नजदीक है, भोट लेने का प्रेम वा मधेश को धराशायी करने का प्रेम – अगर भोट की राजनीति मात्र मधेश से कोई भी पार्टर्ीीरना चाहती है तो यह दिवास्वप्न नहीं देखने से भी होगा। मधेशी जनता विकास की राजनीति देखना चाहती है। झूठ और फरेबी की राजनीति करनेवालों की पहचान हो चुकी है और आनेवाले संविधानसभा निर्वाचन से ऐसा चेहरा और भी स्पष्ट हो जाएगा।

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