सावन का महीना, धरम करे जोर … !

हिमालिनी डेस्क
सावन के साथ भगवान शिव का नाम आदिकाल से जुडÞा हुआ है। इसीलिए श्रावण मास शिव के उपासकों के लिए भक्ति का पर्याय बन गया है।
सोमवार व्रत की महिमा
सावन के सोमवार का व्रत संपर्ूण्ा उत्तर भारत में अत्यंत लोकप्रिय है। स्त्री-पुरुष बडÞी श्रद्धा के साथ इस महीने में हर सोमवार को व्रत रखते हैं। जो भक्त ऐसा नहीं कर पाते वे महीने के पहले और अंतिम सोमवार को व्रत रखकर भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति भावना प्रकट करते हैं। इस व्रत में गौरी-शंकर का पूजन, रुद्राभिषेक तथा सायं प्रदोषकाल में अर्चना करने के बाद भोजन ग्रहण करने का विधान है। इस व्रत के करने से भक्तों की मनोकामना पर्ूण्ा होती है, ऐसा जनविश्वास है।
देश के कोने-कोने से श्रद्धालु बाबा पशुपतिनाथ के दरबार में तथा देश में अन्य जहाँ जहाँ शिव मन्दिर है, वहां पवित्र जल लेकर श्रद्धाभक्तिपर्ूवक पावं पैदल चलते हुए महादेव की पूजाअर्चना करते हैं। काठमांडू में सुन्दरी जल से पवित्र जल लेकर पशुपतिनाथ को चढÞाया जाता है। इसके अलावा देश के विभिन्न भागों से श्रद्धालुजन भारत के वैद्यनाथ धाम में कांवर लेकर लगभग हरेक वर्षपूजाअर्चना के लिए जाते है। बहुत पहले से इसकी तैयारी होती है। वैद्यनाथधाम में पूरे महिने उत्सवका वातावरण रहता है। लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज से कांवड में गंगाजल भर कर ११३ किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हुए देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ का पवित्र अभिषेक करते हैं।
शक्ति का पूजन

bol bam nepal

सावन का महीना, धरम करे जोर … !

शक्ति के पूजन के बिना शिव की अर्चना कभी भी पर्ूण्ा नहीं होती। शक्ति प्रकृति तथा शिव परमपुरुष हैं। इसीलिए सावन के मंगलवार को मंगला गौरी की पूजा करके विवाहिता स्त्रियां व्रत रखती हैं। आमतौर पर नवविवाहिताओं के लिए पांच वषर्ाे तक यह व्रत रखने की परंपरा है। विवाह के बाद पहले सावन में स्त्रियां मायके में अपना पहला व्रत रखती हैं। बाद के चार वषर्ाे में वे ससुराल में रहकर सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी के पूजन के साथ यह व्रत रखती हैं। इस व्रत के प्रताप से स्त्री के जीवन में सदा आनंद-मंगल रहता है। जिस कुआंरी कन्या की जन्म कुंडली में मंगल दोष है, उसके लिए भी मंगला गौरी का व्रत शुभ फलदायी साबित होता है। मंगला गौरी का वर्ण्र्ााब्रहृमवर्ैवर्त और देवीभागवत पुराण में मंगल चंडिका के नाम से मिलता है। वाराणसी के पंचगंगा घाट के ऊपर मंगला गौरी का सुप्रसिद्ध मंदिर है। पुराणों में तो यहां तक लिखा है कि मंगला गौरी की परिक्रमा से संपर्ूण्ा पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने का पुण्यफल प्राप्त होता है।
सावन मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को तीज का पर्व मनाया जाता है। यह वहां का प्रसिद्ध लोकोत्सव है। विवाहित बेटियों को इस अवसर पर मायके में आमंत्रित किया जाता है। इस दिन वे बडे चाव से हाथ-पैरों में मेहंदी लगाती हैं। नए वस्त्र-आभूषण धारण कर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए नाचगान करती हैं।
सावन के रंग बूंदों के संग
तेज गर्मी से तपती झुलसती धरती पर जब पहली बारिश की बूंदें गिरती है तो लगता है महीनों से प्यासी धरती को मानो अमृत मिल गया हो। अमृत की इन बूंदों को आत्मसात कर धरती अपनी सोंधी महक से चारों ओर के वातावरण को सुगंधित कर मानो उन बादलों को धन्यवाद देती है जिन्होंने इसे प्यास से मुक्त कर दिया है। पहली बारिश में नहाए पत्तों के जिस्मों में जैसे नयी जान आ जाती है और वे और भी हरे होकर खिल जाते है। और फिर सिलसिला शुरू होता है लगातार आसमान में उमडÞते-घुमडÞते काले बादलों की गडÞगडÞाहट का और झम-झम गिरते पानी का।
पपीहे की पिउ-पिउ और आमों के पेडÞ पर कूकती कोयल की मीठी आवाज सुनकर समस्त प्राणी जगत में स्फर्ूर्ति और आनंद का संचार होता है। लू के थपेडÞों और झुलसाने वाली गर्मी के कारण अपने-अपने घरों में बंद सभी लोग बारिश की बूंदों का भरपूर आनंद उठाने बाहर निकल आते हंै। यह सावन का स्वागत नहीं तो क्या है –
वषर्ा ऋतु को कवियों ने प्रेमियों का मौसम बताया और संयोग और वियोग पर असंख्य कविताएं लिख डालीं। मौसम की हरियाली का जश्न मानने के लिए यह ऋतु आती है। तीज के त्योहार में घर की विवाहित स्त्रियां खासकर गांव में, हाथों में हरी व लाल चूडिÞयां पहने और मेहंदी रचाकर, चुनरी ओढÞ कर प्रेम व प्रेमी के इंतजार से जुडÞे गीत मिलकर गाती हैं तो एक खुशनुमा शमां बंध जाता है। अविवाहित लडÞकियां भी इस त्योहार में शामिल हो पेडÞ, घर व आंगन में लटके झूलों में पींगें लेती हर्ुइ सावन में तीज के गीत गाती हैं।
तीज के मौके पर भोजन भी खास होता है। जो विशेष पकवान वर्षभर प्रायः नहीं खाए जाते वे इसी मौसम में ये बनाए जाते हैं। सास-बहू, मां-बेटी के बीच प्रेम व मान सम्मान बना रहे, तीज त्योहार इसलिए भी है। इस त्योहार पर मां अपनी बेटी के घर या ससुराल में बहुत से उपहार व मिर्ठाई भेजती है और बहू अपनी सास को बायना देती है जिस में फल, मिर्ठाई, कपडÞे व रूपये दिए जाते हैं। विवाह से जुडÞे दो परिवारों के बीच मधुर संबंध बना रहे, यह त्योहार इस भावना को मजबूती प्रदान करता है। पूडÞी कचौडÞी व अंदर से की रोली चढÞाकर गौरा माता या पार्वती देवी की पूजा की जाती है और माता का आशर्ीवाद सुहागनों द्वारा पति की लंबी आयु के लिए लिया जाता है।
बारिश की मस्त फुहार जहां दो प्रेमियों के लिए वरदान साबित होती है, वहां फलों के शौकीन लोग भी फलों के राजा आम की तमाम लाजवाब किस्मों का मजा इस मौसम में भरपूर उठा सकते हैं।
बारिश का मौसम मस्ती व रोमांस का मौसम है। इसलिए जब आसमान से टुपुर-टुपुर गिरती बूंदें आपके तन को छुएं तो आप भी सब कुछ भूलकर बस इन बूंदों का मजा तब तक लीजिए जब तक बादल इन्हे अलविदा न कह दें।

प्रकृति का उल्लास है सावन

 
सावन का नाम सुनते ही मन वषर्ा ऋतु के आनंद में डूब जाता है। त्योहारों की रौनक घर-गृहस्थी की नीरसता दूर कर देती है। परम पुरुष -शिव) और प्रकृति -भवानी) का प्रणय ही सावन की आध्यात्मिक आदर््रता है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसलिए सावन सदा से ही शिव-शक्ति की अर्चना का पर्व काल रहा है।
सावन में शिव का पूजन
हिंदू पंचांग के बारह मासों में सावन भगवान भोलेनाथ को र्सवाधिक प्रिय है। इसीलिए यदि संभव हो तो शिव-भक्तों को सावन के सोमवार का व्रत अवश्य रखना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के बाद गाय के दूध, दही, घी, शहद अथवा स्वच्छ जल से शिवलिंग का अभिषेक करें, बेलपत्र चढÞाएं और चंदन लगाएं। आक के फूल, धतूरा, धूप-दीप आदि अर्पित करके किसी शिव स्तोत्र का पाठ एवं ‘ç नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। दिनभर उपवास रखें, सर्ूयास्त के बाद प्रदोषकाल में पुनः शिव जी की अर्चना करने के बाद सात्त्विक भोजन ग्रहण करें। र्
र्सप भगवान शंकर के आभूषण हैं। अतः नागपंचमी का पर्व भी इसी मास की शुक्लपक्ष पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन रुद्रावतार श्रीहनुमान के ध्वजारोहण और कुश्ती-दंगल की भी परंपरा है, जो इसे आध्यात्मिक स्वास्थ्य दिवस बना देती है।
क्या शिवलिंग के पूजन का अधिकार स्त्रियों को नहीं है –
एक ऐसी भ्रामक धारणा है कि स्त्रियों को शिवलिंग का र्स्पर्श नहीं करना चाहिए। लेकिन शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग की पूजा का अधिकार सभी को समान रूप से है। वस्तुतः शिवलिंग भगवान शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है। शिवलिंग के जिस स्थान से जल निकलता है, परिक्रमा करते समय उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। सामान्यतया शिवलिंग पर चढÞाए गए प्रसाद को निर्माल्य कहा जाता है और उसे ग्रहण नहीं किया जाता। ऐसी मान्यता है कि शिव जी पर चढÞाए गए प्रसाद पर उनके गणों का अधिकार होता है। लेकिन इस नियम के अपवाद स्वरूप द्वादश ज्योर्तिलिंगों और सिद्ध ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित शिव लिंगों पर चढÞाया गया प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है।
शिवजी को प्रसन्न करें
भगवान शिव की भक्ति का प्रमुख माह सावन आज से शुरू हो गया है। पूरे माह भोलेनाथ की पूजार्-अर्चना की जाएगी। सभी शिव मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं। हर तरफ बम-बम भोले और ओम नमः शिवाय की गूंज सुनाई देने लगी है। शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। सावन में शिव-पार्वती का पूजन बहुत फलदायी होता है। इसलिए सावन मास का बहुत महत्त्व है।
सावन की विशेषताः
हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार, सावन को देवों के देव महादेव भगवान शंकर का महीना माना जाता है। इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।
अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमालय और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।
सावन में शिवशंकर की पूजाः
सावन में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरुआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, आँक, मदार, कनेर, र्राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भांग और श्रीफल महादेव को चढÞाया जाता है।
महादेव का अभिषेकः
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वे मर्ूर्छित हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।
बेलपत्र और समीपत्रः
भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढÞाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब ८८ हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रहृमा से पूछा तो ब्रहृमदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढÞाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढÞाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढÞाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्त्व होता है।
बेलपत्र ने दिलाया वरदानः
बेलपत्र महादेव को प्रसन्न करने का सुलभ माध्यम है। बेलपत्र के महत्त्व में एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक भील डाकू परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटा करता था। सावन में एक दिन डाकू जंगल में राहगीरों को लूटने के इरादे से गया। एक पूरा दिन-रात बीत जाने के बाद भी कोई शिकार नहीं मिलने से डाकू काफी परेशान हो गया।
इस दौरान डाकू जिस पेडÞ पर छुपकर बैठा था, वह बेल का पेडÞ था और परेशान डाकू पेडÞ से पत्तों को तोडÞकर नीचे फेंक रहा था। डाकू के सामने अचानक महादेव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। अचानक हर्ुइ शिव कृपा जानने पर डाकू को पता चला कि जहां वह बेलपत्र फेंक रहा था, उसके नीचे शिवलिंग स्थापित है। इसके बाद से बेलपत्र का महत्त्व और बढÞ गया।
विशेष सजावटः
सावन में शिव मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। शिवभक्त अनेक धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। साथ ही, महादेव को प्रसन्न करने के लिए किसी ने नंगे पांव चलने की ठानी, तो कोई पूरे सावन भर अपने केश नहीं कटाएगा। वहीं, कई लोग मांस और मदिरा का त्याग कर देते हैं।
कांवडिÞये चले शिव के धामः
सावन का महीना शिवभक्तों के लिए खास होता है। शिवभक्त कांवडिÞयों में जल लेकर शिवधाम की ओर निकल पडÞते हैं। शिवालयों में जल चढÞाने के लिए लोग ‘बोल बम’ के नारे लगाते घरों से निकलते हैं। भक्त भगवा वस्त्र धारण कर शिवालयों की ओर कूच करते हैं।
सावन में ४ सोमवार, ५ मंगल व ५ बुधवार
मंगल ग्रह के इस माह कर्क राशि में प्रवेश करने से प्राकृतिक आपदा का भी योग बनता है। भक्त सब कुछ झेलकर कांवडÞ से भोले बाबा को गंगाजल अर्पित कर रहे हैं। घर परिवार व प्रदेश की खुशहाली के लिए मन्नतें मांगेंगे।
सावन के फुहारों से हरियाली की छटा निखरती है। हिंदू पंचांग के मुताबिक २३ जुलाई से सावन मास शुरू हुआ है। भगवान शिव को यह मास अत्यधिक प्रिय है। सावन मास के सोमवार को भगवान शिव के पूजन की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। शिवालयों में जलाभिषेक के दौरान ओम नमः शिवाय मंत्र गूंजेगा। भक्त गंगाजल, दूध व दही से अभिषेक कर शिव परिवार की विधि विधान से पूजा अर्चना करेंगे। सावन मास में इस बार चार सोमवार पडÞेगा। पहला सोमवार २९ जुलाई को, दूसरा ५ अगस्त को, तीसरा १२ को तथा चौथा १९ अगस्त को होगा। शिवरात्रि का व्रत छ अगस्त को होगा।
मंगल ग्रह कर्क राशि मेंः
सावन मास में इस बार ५ मंगलवार व ५ बुधवार पडÞते है। शिवरात्रि के एक दिन बाद ६ अगस्त को भौमवासरी अमावस्या है। गंगाधाम मंदिर के पंडित व ज्योतिषाचार्य निरंजन पराशर के मुताबिक १८ अगस्त को मंगल ग्रह अपनी नीच कर्क राशि में प्रवेश करेगा। मंगल ग्रह की यह स्थिति निर्मित होने से अतिवृष्टि व प्राकृतिक आपदा का योग निर्मित होगा। सावन में मंगलवार को मंगला गौरी का व्रत पूजन करने से कन्याओं का विवाह, स्त्रियों को सुख, सौभाग्य व संतान की प्राप्ति होती है। ओम नमः शिवाय -पंचाक्षर) का जाप शुभ माना जाता है।
पूजन सामग्री-
भोले बाबा का दूध, दही, घी, शहद, जनेऊ, रोली, बेलपत्र, भांग, धतूरा, ओक व प्रसाद से पूजन किया जाता है। पूजन के बाद धूप, दीप व कर्पूर से आरती उतारें। शिवभक्त शिव कथा जरूर सुनें। सावन में शिवलिंग पूजन के साथ नाम जप व शिव पुराण की कथा सुनने व पढÞने की महिमा है।
औषधीय गुण का प्रवाह-
वनस्पतिशास्त्रियों का कहना है कि इन दिनों हजारों वनस्पतियां सुसुप्तावस्था त्याग जीवंत हो उठती हैं। ऐसे में बारिश का पानी उनके पत्तों से लगायत जडÞों से छनते हुए मिट्टी का रास्ता पकडÞ नदी की ओर बढÞता है। पहाडÞी नदियों में बाढÞ आने से कटान होती है। इस कटान में औषधीय वनस्पतियों से रचे-बसे मिट्टी-पत्थरों का क्षरण होकर उसके तमाम खनिज पानी संग प्रवाहित होने लगते हैं।

Loading...
Tagged with

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: