सावित्री

चन्द्रकला नेवार:अस्तगामी र्सर्ूय की अन्तिम किरणें ब्रहृमपुत्र के तरंगों के ऊपर नृत्य कर रही थीं । सन्ध्या का आगमन होने को था, शायद ये किरणें उनका स्वागत कर रही थीं । कुछ क्षण पश्चात् ही सन्ध्या अपने पूरे सौर्न्दर्य के साथ दिखने वाली थी । किन्तु सन्ध्या कितनी भी खूबसूरत क्यों न हो आखिर है तो वह अँधेरा ही न जिसमें अन्धकार का ही साम्राज्य होता है, वह जितनी सुन्दर होती है उतनी ही भयानक भी, क्योंकि उसकी सन्तुष्टि अन्धकार में ही होती है ।
अन्धेरा होने को था पर आज सावित्री को डÞर नहीं लग रहा था । उसके डÞर को ग्लानि और क्षोभ की तेज हवा ने कहीं दूर भगा दिया था । वो अकेली नदी के किनारे-किनारे चली जा रही थी । अपने-आप में पागलों की तरह बडÞबडÞाती और रोती, आज तो शायद वह ब्रहृमपुत्र जितना ही रोई होगी, पर आँसू थे कि कम ही नहीं हो रहे थे ।
रात काफी हो गई थी, पर सन्ध्या का मन अभी नहीं भरा था । किन्तु सावित्री….- आज प्रकृति भी उससे असन्तुष्ट थी । उसे नदी के कल-कल में हजारों विषाद और व्यथा का अनुमान हो रहा था । उसका हताश मन व्यथित हो रहा था । नदी की ठंडी हवा उसके हृदय को तार-तार कर रही थी । अचानक उसे लगा कि वो काफी दूर निकल आई है, उसने पीछे मुडÞकर देखा । दूर बहुत दूर उसे थोडÞा उजाला दिख रहा था । नदी के किनारे उस उजाले को देख उसे सहसा ‘राँके भूत’ -अगिया बैताल) की याद हो आई ।
कुछ ही क्षण में उसे टिन-टिन घंटी की आवाज सुनाई पडÞी, उसने फिर पीछे मुडÞकर देखा । एक बैल गाडÞी आ रही थी । गाडÞी उसी की ओर आ रही थी । पता नहीं क्यों अब सावित्री को चलने का मन नहीं कर रहा था । वह वहीं खडÞी रही । गाडÞी वाला एक वृद्ध था । वह वृद्ध सावित्री को देख उसके पास आया । उसे गौर से देख कर कहा- “कोई औरत हो । इतनी रात में यहाँ क्या कर रही हो -” सावित्री के मुख से कुछ नहीं निकला । अचानक सावित्री की गोद में पडÞा बच्चा रो उठा । बच्चे की आवाज से वृद्ध एक बार तो डर ही गया । फिर उसने हिम्मत कर के उसकी ओर ध्यान से देखा । उसने देखा कि उसकी आँखों से आँसू की अविरल धारा बह रही थी । गोद में बच्चे को लिए, मैले कपडÞे, हाथ में एक झोला जिसमें शायद बच्चे के खाने का सामान था । उसकी इस दयनीय अवस्था को देख कर वृद्ध की आँखें भर आईं ।
“तुमको क्या हुआ बेटी – तुम इतनी रात में रोती हर्ुइ कहाँ जा रही हो -” सहानुभूति के साथ वृद्ध ने पूछा । सावित्री शायद अपना दुख बताना नहीं चाह रही थी इसलिए वह चुपचाप रोती रही । हृदय की अव्यक्त पीडÞा को कृत्रिमता के पर्दे से छुपाने की कला औरत शायद प्रकृति से सीखकर ही आती है । कुछ देर के बाद सावित्री बोली- “मैं मायके जा रही हूँ । मेरा मायका बोगिबिल है । मुझे अगर आप मायके तक पहुँचा देंगे तो मैं जिन्दगी भर आपका अहसान मानूँगी ।”
“ठीक है मैं पहुँचा दूँगा, मैं भी बोगिबिल ही जा रहा हूँ ।” वृद्ध ने कहा ।
बैल के गले में बँधी घंटी की टिन-टिन की आवाज के अलावा चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था । कुछ क्षण पश्चात् सन्नाटे को भंग करते हुए वृद्ध ने पूछा, “बेटी ! तुम्हारे घर में और कौन-कौन हैं -” थके और कुण्ठित स्वर में सावित्री ने कहा, “मैं अनाथ हूँ बाबा ! मेरा कोई नहीं है । सच कहती हूँ मेरा इस संसार में जिन्दा रहना ही र्व्यर्थ है ।”
“ऐसा नहीं कहते बेटी । मैं समझ रहा हूँ कि तुम्हें बहुत दुख मिला है । राजा से रंक तक सभी दुख भोगते हैं र्।र् इश्वर ने मुझे सब दिया है, पर सन्तान नहीं दिया, कितना तर्ीथ व्रत किया, किन्तु सब बेकार । खैर, तुम्हारे पति का घर कहाँ है -” अपनी पीडÞा को छुपाते हुए वृद्ध ने पूछा ।
पतिगृह के बारे में वृद्ध के प्रश्न ने उसके हृदय में हाहाकार मचा दिया । फिर भी उसने साहस बटोरते हुए कहा, “बाबा, मैंने पहले ही कहा न कि मेरा अपना कोई नहीं है । इस संसार में मैं अकेली हूँ ।” वह फिर हिचक-हिचक कर रोने लगी । उसके बाद फिर कुछ पूछने की हिम्मत वृद्ध नहीं जुटा पाया । कुछ क्षण के बाद पता नहीं क्यों सावित्री अपनी दुख-भरी कहानी सुनाने लगी, “बाबा सुनिए मेरी कहानी । मेरा पति पढÞा-लिखा विद्वान हंै । मैं अनपढÞ गँवार थी, फिर भी मैं उनकी प्यारी पत्नी थी । मेरे पति, सास ससूर को भी उस समय पढÞी-लिखी औरत पसन्द नहीं थी । घर का सारा काम मैं किया करती थी । सारा दिन मशीन की तरह काम करते हुए भी मैं अपने आपको धन्य मानती थी । पति डिगबोइ की तेल कम्पनी में काम करते थे । पता नहीं क्यों कम्पनी ने एक साल के लिए उन्हे असम से बाहर भेजा । उनके जाने के बाद तो मुझे और भी काम करना पडÞता था । सास ससूर मुझ पर अत्याचार करने लगे । मैं अपने आप से पूछती थी कि ऐसा क्यों है – फिर मुझे पता चला कि इसका कारण मेरा माँ बनना है, यही मेरा सबसे बडÞा दोष था ।” इतना कहकर वह एक क्षण के लिए चुप हो गई, फिर आँसू पोछते हुए बोली, “पति के जाने के बाद लगभग दसवें महीने में मैंने बेटे को जन्म दिया । बेटे के जन्म लेने से पहले से ही सास ससूर मुझे शक की निगाह से देखने लगे थे । मुझसे घृणा करते थे, मेरा तिरस्कार करते थे । केवल घर से निकलने के लिए उन्होंने नहीं कहा था । लेकिन बेटे के जन्म के साथ ही ‘घर से निकल जा’ कहने लगे । पर मैं नहीं निकली । मेरा मन कहता था कि जिस दिन मेरे पति आएँगे मेरे प्रति सब का व्यवहार बदल जाएगा । एक दिन डाकिए ने पत्र दिया, जिसमें लिखा था कि वो आने वाले हैं । उसके दूसरे ही दिन वो आ गए । उनके साथ एक शिक्षित औरत भी थी । उसी रात मेरे सास ससुर ने मेरे चरित्र को लेकर उनके कान भर दिए । दूसरी पत्नी को लेकर आने वाला मर्द और क्या चाहता उसने उसी समय मुझे घर से निकल जाने को कहा ।”
इतना कहकर सावित्री चुप हो गई । उसके हृदय में हाहाकार मचा हुआ था । वह रोने लगी । उसे सांत्वना देते हुए वृद्ध ने कहा, “हो गया अब कुछ मत कहो । मैं तुम्हारा दुख और नहीं बढÞाना चाहता हूँ ।” सावित्री के मन में आँधी चल रही थी । वह आँधी उसे न जाने कहाँ-कहाँ पहुँचा रही थी । अचानक उसने अपने बच्चे को जोर से चिपटा लिया और बहुत देर तक उसका मुख पागलों की तरह चूमती रही ।
गाडÞी अपनी गति में आगे बढÞ रही थी । चारों ओर निस्तब्धता र्छाई हर्ुइ थी । सावित्री और वृद्ध दोनों चुप थे । न जाने क्यों बच्चा अचानक रोने लगा । “बच्चा क्यों इस तरह रो रहा है -” कहते हुए वृद्ध ने पीछे मुडÞकर देखा, पर वहाँ सावित्री नहीं थी । वृद्ध डÞर गया । जल्दी से उसने जल रहे लालटेन को हाथ में लिया और इधर-उधर सावित्री को खोजने लगा पर सावित्री तो अन्धकार में विलीन हो चुकी थी । अन्त में हताश होकर वृद्ध ने उस मातृविहीन बच्चे को अपने सीने से लगाया और अपने गंतव्य की ओर बढÞ चला ।
सावित्री छोडÞ चुकी थी अपने बच्चे को सदा के लिए । उसके बाद उसे किसी ने कभी नहीं देखा ।
-साभारः ‘ममता’ -२०२२) नेपाली कथा संग्रह ।)

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