साहित्यकार के नाम से परिचित होना चाहता हूं-निर्मलकुमार रिमाल

Nirmal Kumar (1)

कवि निर्मलकुमार रिमाल

कभी–कभी किसी एक व्यक्ति में ही कई सारी खूबियां शामिल हो जाती हैं । इस हालत में उसे कोई एक विधा से जानना या परिचित कराना असम्भव सा लगता है । एक ऐसी ही शख्सियत से हिमालिनी आपको रु–ब–रु कराने जा रही है । निर्मलकुमार रिमाल ! इन्हें कलाकार कहा जाय, साहित्यकार कहा जाय, कवि कहा जाय या फिर समाजसेवी कहा जाय ? वैसे इन सारी खूबियों से सराबोर रिमाल खुद को कवि कहलाना ही अधिक पसन्द करते हैं । नेपाली भाषा और अंग्रेजी भाषा में आप लिखते हैं और कई कृतियां प्रकाशित भी हो चुकी हैं । शुरुआती दौर से ही हिन्दी में भी आपकी अनुभूतियां शब्दों का आकार लेती रहीं, जिसे बहुत जल्द एक साथ संग्रहित कर प्रकाशित करने की योजना है । पेश है कवि निर्मलकुमार रिमाल से हिमालिनी के सह संपादक विनोदकुमार विश्वकर्मा से हुई विशेष बातचीत का संपादित अंश–
० आप एक कलाकार के साथ ही एक अच्छे साहित्यकार भी हैं । आपको हम कैसे पहचानें– कलाकार के रूप में या साहित्यकार के रूप में ?
– देखिए, कलाकार बनने की ख्वाहिश से मैं बम्बई गया था । दो–चार फिल्मों के लिए शुटिग भी की । लेकिन शारीरिक अस्वस्थता के कारण मुझे वहां से काठमांडू वापस लौटना पड़ा । वैसे तो मुझे पहले से ही हिन्दी साहित्य में रुचि थी । क्योंकि हिन्दी सिनेमा में प्रवेश करते वक्त एक ऐसा माहौल था कि हिन्दी व उर्दू अधययन किए बगैर हिन्दी सिनेमा में प्रवेश पाना मुमकिन ही नहीं, नामुकिन था । इसलिए भी हिन्दी अध्ययन करना मेरे लिए जरुरी हो गया । तत्कालीन समय में कुशवाहाकांत द्वारा लिखित उपन्यासों का मैन्ने अध्ययन किया । हिन्दी साहित्य के अध्ययन के क्रम में मिर्जा गालिब, डॉ. हरिवंश राय बच्चन जैसे विख्यात कवियों से ज्यादा प्रभावित हुआ । उसी समय से मैन्ने हिन्दी में कविता लिखने की शुरुआत की ।
अभी मैं पूरी तरह साहित्य में डूब गया हूं । साहित्य ही मेरे लिए सब कुछ है । साहित्य के बिना मैं एक पल भी जी नहीं सकता । सुबह हो या शाम, जब मैं लिखने के लिए बैठता हूं, तो हिन्दी व नेपाली में दो–चार पंक्तियां अवश्य लिख लेता हूं । इसलिए मैं कलाकार के बजाय साहित्यकार के नाम से परिचित होना चाहता हूं ।
० आपके विचार में पहले की कलाकारी और आज की कलाकारी में क्या अंतर है ?
– पहले की कलाकारी में जीवंतता थी । जीवन में जो भोगा जाता है, उसे अच्छी तरह से उजागर करने का प्रयत्न किया जाता है । जीवन से संबंधित, इतिहास से संबंधित, समाज से संबंधित कथा व कहानियों पर आधारित फिल्में बनती थी । गीत उसी तरह बनाये जाते थे, संगीत भी उसी तरह दिया जाता, गायक भी गीतों के अनुसार ही चयन किया जाता है । अभिनेता व अभिनेत्री भी फिल्म की कहानी के अनुसार ही चयन किये जाते थे । जैसे दिलीप कुमार, अशोक कुमार, राजकुमार आदि अभिनेताओं की जितनी फिल्में हैं, वे सभी समाज व जीवन से संबंधित हैं । उस स्तर का पिक्चर अभी नहीं बन पा रहा है । जो जीवंतता पहले की फिल्मों में थी, वह जीवंतता अभी देखने को नहीं मिलती है । हां, अभी तकनीकी के दृष्टिकोण से हिन्दी कलाकारी में बहुत विकास हो चुका है और विकसित हो भी रहा है, पर पहले जैसी बात नहीं है ।
० साहित्य में आपकी सबसे अधिक रुचि गद्य साहित्य में है या पद्य साहित्य में ?
– मेरी सबसे अधिक रुचि पद्य साहित्य में है । क्योंकि जो रस मुझे पद्य में मिलता है, वह गद्य में नहीं मिलता है । जो शक्ति कविता में है, वह शक्ति अन्य विद्याओं में नहीं है, ऐसा मुझे लगता है । क्योंकि पद्य में भाव, कल्पना की आनन्दमय अभिव्यक्ति रहती है । पद्य में संगीत कला की छाया अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली दिख पड़ती है, कल्पना का अधिक अनिवार्य रूप होता है और उसकी रसमयता भी अधिक बलवती होती है । इसमें काल्पनिक अवधान की क्रिया का निश्चित संस्पर्श पाया जाता है ।
इसलिए मुझे पद्य साहित्य में ज्यादा रुचि है । फलतः जब मैं लिखने के लिए बैठता हूं, तो मेरी कलम कविता लिखने की ओर चली जाती है । हालांकि मैं उपन्यास, कथा व कहानी लिख सकता हूं, लेकिन कविता में अधिक रुचि होने की वजह से गद्य साहित्य गौण हो जाता है ।
० कविता को आप किस प्रकार से परिभाषित करते हैं ?
– देखिये, कविता को परिभाषित करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है । पर मैं इतना कह सकता हूं कि कविता में आदर्श है, कविता में मनोविज्ञान भी रहता है । कविता आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है, जिसका सम्बन्ध विश्लेषण विकल्प या विज्ञान से नहीं है । वह एक श्रेयमयी प्रेय रचनात्मक ज्ञान धारा है, वह सत्यम् शिवम्, सुन्दरम् सार्वजनीतता, चिरन्तनता, अनुभूति और आदर्श की समष्टि है ।
० आपकी कौन–कौन सी रचनाएं प्रकाशित व प्रकाशोन्मुख हैं ?
हिन्दी में निर्मल–निर्झर नामक कविता संग्रह प्रकाशोन्मुख अवस्था में है । नेपाली में ‘नेपालको प्रस्फुटन’, ‘जीवन का अन्त्यहीन मोडहरु’, संवेदनशीलतामा उनिएका रहरहरु’ ‘उदात जीवन उदात्त दृष्टिकोण’, भाव मंजरी, सपनीका तरेलीहरु, काव्यांजली, आदि नेपाली कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है । इसी प्रकार ‘ज्ञान विज्ञान’, नेपाली लेख संग्रहः ‘ह्युमन होप्स रिमाइन्ड’, ‘पिरामिड ऑफ पोयम्स’, अंग्रेजी कविता संग्रह, ‘एवरेस्ट रिव्यु’ आदि प्रकाशित हो चुकी है । इसी प्रकार नेपाली गद्य÷पद्य संग्रह प्रकाशोन्मुख अवस्था में हैं । सामाजिक, सास्कृतिक एवं राजनीतिक उपन्यास भी प्रकाशोन्मुख हैं । इसी प्रकार हाइकु संग्रह (नेपाली में) भी प्रकाशोन्मुख है ।
० आप हिन्दी व नेपाली के कौन–कौन से साहित्यकार से प्रभावित हुए हैं ?
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब एवं डॉ. हरिवंश राय बच्चन से ज्यादा प्रभावित हुए हैं, वैसे तो छायावाद के पंत, प्रसाद, निराला व वर्मा से ही प्रभावित हुए हैं । इनकी सभी रचनाएं पूरी तरह अध्ययन नहीं कर सका हूं, लेकिन अब अध्ययन कर रहा हूं ।
इसी प्रकार नेपाल के महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा से तो मैं बचपन से ही प्रभावित रहा हूं । जब वे मृत्युशैया पर थे, उस वक्त मैन्ने उनकी सेवा भी की थी । बालकृष्ण सम, लेखनाथ पौड्याल, भवानी भिक्षु, गोपालप्रसाद रिमाल, भूपि शेरचन, कालिप्रसाद रिजाल, किरण खरेल, यादव खरेल, अभि सुवेदी जैसे साहित्यकारों से भी अधिक प्रभावित रहा हूं ।
० नेपाली साहित्य पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य की क्या देन रही है ?
– आज से ६० वर्ष पूर्व नेपाली साहित्य में कुछ भी नहीं थी । थोड़ी बहुत साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित होती थीं । नेपाली साहित्य में विधाओं का विकास नहीं हो पाया था । नेपाली साहित्य ने हिन्दी साहित्य से बहुत कुछ लिया है, सीखा है और अनुशरण भी किया है ।
नेपाल के साहित्यकार भी हिन्दी के साहित्यकार से प्रभावित हुए हैं । इस प्रकार धीरे–धीरे नेपाली साहित्य में विकास होने लगा । अभी समृद्ध साहित्य बन गया है । यह भी एक कारण है, हिन्दी साहित्य की ओर मेरी रुचि बढ़ी और बढ़ रही है । समग्रतः मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि नेपाली साहित्य के उन्नयन में हिन्दी साहित्यकारों की बड़ी देन रही है ।
० वर्तमान में आप साहित्य को किस प्रकार से परिभाषित करते हैं ?
– मेरे ख्याल से आदमी के अंदर छुपा हुआ उतार–चढ़ाव ही साहित्य है । उस उतार–चढ़ाव को शब्दों में अलंकृत करना साहित्य का काम है । साहित्य एक जीवित शक्ति है । यह जनता के सुषुप्त भावों को जाग्रत करता है । यह समाज को एक नवीन प्रेरणा प्रदान करता है और मस्तिष्क को भी बल प्रदान करता है ।
साहित्य में सिफं सुंदरता ही नहीं होती है, उसमें कुरूपता भी होती है । कुरूप इसलिए कि अगर हम सिर्फ सुंदरता या अच्छाइयों को ही मानव जीवन में उजागर करते हैं, तो वह साहित्य अधूरा ही रह जाता है । हमें समाज की कुरूपता या बुराइयों को भी उजागर करना चाहिए । क्योंकि सुंदरता और कुरूपता दोनों के सम्मिश्रण से मानव जीवन बना है । इसलिए साहित्य का काम है, दोनों को उजागर करना । इससे हमें प्रेरणा मिलती है, उत्साह मिलता है, हममें चेतना आती है । वैसे तो आज के भौतिकवादी युग में लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं । इस कारण सभी सुख सुविधाओं के बावजूद भी मानसिक अशांति में ही जीते हैं । या तृप्ति उन्हें नहीं मिलती है । यही कारण है कि मानसिक शान्ति के युग में साहित्य की आवश्यकता है और इसे किसी भी हालत में नकारा नहीं जा सकता है ।
० आप नवीन कला मन्दिर के संस्थापक एवं वर्तमान अध्यक्ष हैं, फिलहाल आप नेपाल में सांस्कृतिक जागरण अभियान की शुरुआत भी की है । क्या है यह सांस्कृतिक जागरण अभियान ?
– सांस्कृतिक अभियान का अर्थ व्यापक है । जीवन को व्यवस्थित करने के लिए ही सांस्कृतिक अभियान की जरुरत है । क्योंकि आज के संसारः पूरी तरह स्वार्थ में डूबे हुए है । अगर हम इस अभियान में नहीं जुटे तो मानव सभ्यता का अंत होना लाजमी हो गया है । मानव सभ्यता को बचाने के लिए सांस्कृतिक जागरण की आवश्यकता है । इसी प्रकार नेपाल में मैं अपने ही जीवनकाल में, अपने ही नेतृत्व में सांस्कृतिक जागरण अभियान की शुरुआत की है । ‘सार्थक जीवन जिये’, यह इस अभियान का मूल नारा रहा है ।
० अंत में आप हिमालिनी के जरिये कुछ सन्देश देना चाहते हैं ?
–हिमालिनी नेपाल में सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली स्थापित पत्रिका है । हर अंक में नवीन सामग्रियां पढ़ने को मिलती है । हिन्दुस्तान और नेपाल के सम्बन्धों को और प्रगाढ़ बनाने में सेतु का काम करे, यही मंगलकामना करता हूं ।

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