साहित्यिक महाकुम्भ नेपाल तक पहुँचे और जीवन को ऊर्जा प्रदान करे : बसंत चौधरी

मेरठ के आईआईएमटी विवि में २४ से २६ नोभेम्बर तक तीन दिवसीय मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल का आयोजन किया गया | इसमें नेपाल, भूटान और तिब्बत के विख्यात कवियों और साहित्यकारों ने भाग लिया। नेपाल से ५५ साहित्यकारों ने भाग लिया जिसका नेतृत्व वरिष्ट कवि लेखक एवं गजलकार श्री बसन्त कुमार चौधरी ने किया |  कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि नेपाल के कवि, लेखक और समाजसेवी बसंत के चौधरी ने अपने कीनोट वक्तव्य से किया। उन्होंने महाकवि देवकोटा को उदधृत करते हुये कहा कि

नेपाल के महाकवि देवकोटा ने, ‘‘सत् छ सुन्दरै, सुन्दरै छ सत्’’ कह कर सत्य और सौन्दर्य की एकरुपता को वाणी दी है ।

मैं इस विद्धत् लोगों के सामने अपने को ज्यादा बोलने के काविल नहीं मानता, फिर भी महसूस करता हूँ क्रान्तिधरा मेरठ में इस तरह की गोष्ठी आयोजित करके आपने मुझे और मेरे जैसे कई साहित्यकारों, साहित्यानुरागियों को पर्याप्त प्रेरित किया है, इस समारोह की पूर्ण सफलता की हृदय से कामना करता हूँ ।

प्रस्तुत है बसंत के चौधरी द्वारा दिया गया भाषण का पूर्ण विवरण |

उत्तरप्रदेश के राज्यपाल श्री रामनायक जी को श्वग्त करते हये नेपाल के वरिष्ट साहित्यकार श्री बसन्त चौधरी

आज के इस समारोह के अध्यक्ष डा. विजय पंडित जी,

  •  प्रमुख अतिथि उत्तर(प्रदेश के राज्यपाल माननीय राम नाईक जी,
  •  मंच मे आसिन विद्धत गण,
  •  देश, विदेश से आए हुए विशिष्ठ अथिति गण,
  • भद्र महिला एवम् सज्जन वृंद १

सदियों से भारत की गंगा – जमनी तहजीब सारी दुनिया के लिये भाई चारे का शानदार आइना बनी हुई है । इस तहजीब को संवारने और मिसाली बनाने के लिये आयोजित आज के इस वृहत् तथा भावपूर्ण समारोह में मुझे भाग लेने का सुअवसर मिला उस के लिये मैं आप सब का तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ । इस भव्य समारोह में शिरकत कर पाने के लिये मैं अपने को साहित्यिक रुप से भाग्यशाली भी मानता हूँ और गौरवशाली महसूस करता हूँ ।

मेरठ वैसे तो एक शहर है, पर इसकी ऐतिहासिक पौराणिक पृष्ठभूमि इस नगर को अत्यन्त गरिमा और सार्थकता प्रदान करती है । सिन्धुघाटी सभ्यता से लेकर रामायण और महाभारतकालीन साक्ष्यो से भी मेरठ ने साक्षात्कार किया है । ऐसी प्राचीन नगरी में, विभिन्न देशों के साहित्यकारों का संगम स्वयम् एक सन्देश प्रवाहित करता है । यह सन्देश, साहित्य की जीवन्तता का है, हृदय में सतत गुञ्जित गीतों का है, प्रकृति, सौन्दर्य और चेतना का है । यह स्थापित करता है, साहित्य, सौन्दर्य और चेतना की अभिव्यक्ति को चेतना, गति प्रगति, विचार और क्रान्ति उन्मुख होती है, सौन्दर्य बोध मनुष्य को प्रकृति, शाश्वतता और सत्य से जोडता है ।

नेपाल के महाकवि देवकोटा ने, ‘‘सत् छ सुन्दरै, सुन्दरै छ सत्’’ कह कर सत्य और सौन्दर्य की एकरुपता को वाणी दी है ।

मैं इस विद्धत् लोगों के सामने अपने को ज्यादा बोलने के काविल नहीं मानता, फिर भी महसूस करता हूँ क्रान्तिधरा मेरठ में इस तरह की गोष्ठी आयोजित करके आपने मुझे और मेरे जैसे कई साहित्यकारों, साहित्यानुरागियों को पर्याप्त प्रेरित किया है, इस समारोह की पूर्ण सफलता की हृदय से कामना करता हूँ ।

मान्यवरों और मित्रों,

नेपाल और भारत का सम्बन्ध चिरकाल से बहुमखी और आत्मीय रहा है । सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक गहराई इन दो देशों के सम्बन्धों में जिस तरह से दिखाई पडती है, वह कहीं और कम ही दिखती है । नेपाल में हिन्दी साहित्य प्रर्याप्त लोकप्रिय है । यहाँ तक कि कई हिन्दी साहित्यिक आन्दोलनों से नेपाल भी उद्धेलित होता रहा है । सन् १९५० के बाद हिन्दी कविता और कहानियों की एक नई धारा का सूत्रपात हुआ, जिसे हम नई कविता और नई कहानियों के नाम से जानते हैं । तार सप्तक, दूसरा और तीसरा सप्तक के नाम से प्रकाशित हिन्दी प्रतिनिधि कविताओं को प्रयोगवादी भी कहा गया । नेपाली साहित्य ने भी सन् ५० के आसपास ही करवटे बदलना शुरु किया था । यह समय नेपाली का क्रान्तिकाल था । बाद के वर्षों में अर्थात् सन् ६० के बाद के हिन्दी लेखकों खासकर आख्यानकारों को, साठोत्तरी लेखक के नाम से भी जाना गया तो नेपाली में भी सन् साठ के बाद लेखन की एक विद्रोही प्रयोगशील धारा का विकास हुआ, जिस में नेपाल की राजनीतिक परिस्थितियों का भी हाथ रहा । आज उत्तर आधुनिक और गैर उत्तरआधुनिक धारा हिन्दी और नेपाली साहित्य दोनों में चर्चा-परिचर्चा का विषय बनी हुयी है ।

नेपाली में गजल का विकास भी पर्याप्त रुप में हुआ है, और एक सदी पार कर चुका है । यह कहने मे मुझे तनिक भी झिझक नहीं कि नेपाली में गजलकारों की पहली पीढी हिन्दी, ऊर्दू गजलों से पे्ररित थी । नेपाल में भी नेपाली के साथसाथ हिन्दी ऊर्दू गजलें भी लिखी जाती रही हैं । नेपाली गजल प्रवर्तक मोतिराम भट्ट काफि स्वएम् भी हिन्दी के महान कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के सम्पर्क में रहे और काव्य रचनाएँ की । इतना ही नहीं नेपाल के शायर हिन्दी उर्दू शायरी के सभी आयामों से परिचित हैं । उदाहरण के लिये दुष्यन्तकुमार जी की गजलों का संग्रह ‘‘साये में धूप’’ के प्रकाशन के बाद जो बदलाव हिन्दी गजल में आया, नेपाली गजल में भी वह बदलाव दिखलाई पडता है ।

सारांश यह कि सम्बन्ध ही प्रभाव का कारण होता है । विशेष सम्बन्ध विशेष प्रभाव बनाते हैं । इस लिये हिन्दी साहित्य में आये कई परिवर्तनों से हमारा साहित्य आछूता नहीं रहा है । कई प्रभाव हिन्दी और नेपाली में साथसाथ पश्चिम से भी आए हैं जैसे उत्तरआधुनिकता (Post Modernism) । यह अवश्य है कि परिवर्तन अपने अपने आयतन के हिसाब से अपना पैमाना निश्चित करता रहा है ।

हमारी सम्बन्धों की बिशिष्टता और निरन्तरता में हिन्दी और नेपाली साहित्यकारों के नेपाल और भारत भ्रमण भी सहायक रहे हैं । कुछ समय पहले अपनी नेपाल यात्रा के दौरान भारत के प्रधानमन्त्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी ने खास तवर पर व्यक्त किया था– नेपाल भारत सम्बन्ध रोटी बेटी का है । यह अभिव्यक्ति हमारे सम्बन्ध को विशेष गहराई के साथ दर्शाता है ।

पर यहाँ मैं विशेष रुप से साहित्यिक यात्राओं का उल्लेख करना चाहूँगा । इधर आकर इस प्रकार के साहित्यिक आदान प्रदान में आशातीत वृद्धि हुई है । विगत वर्षों से लेकर आज तक भारत की कई साहित्यिक गोष्ठीयाँ, पुस्तक मेले और भ्रमणों में नेपाली साहित्यकारों ने बडे उत्साह के साथ भाग लिया है । आज की यह साहित्यिक महाकुम्भ भी उसी साहित्यिक आदान प्रदान का परिणाम है, जिसे मैं अत्यन्त आशावादी नजरों से देखता हूँ, क्योंकि इस महाकुम्भ में डुबकी लगाने के लिये नेपाल के कई भागों से ५० से भी उपर साहित्यकार आज यहाँ उपस्थित हैं ।

नेपाल में भी प्राचीन काल से ही धार्मिक सांस्कृतिक यात्री आते रहे हैं । कवि जैसे, हरिवंशराय बच्चन, शिवमंगल सिंह सुमन, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, भारतभूषण अग्रवाल, फणिश्वरनाथ रेणु, और गोपालसिंह नेपाली आदि हिन्दी के प्रख्यात साहित्यिक व्यक्तित्व समय समय पर आते रहे हैं और नेपाली साहित्य की सेवा भी संलग्न रहें है । अपने प्रवचन, अपनी रचनाओं से हमें लाभान्वित करते रहे हैं, रसास्वादन कराते रहे हैं । हिन्दी और नेपाली साहित्य के गहन सम्बन्धों की वृध्दि और समृध्दि को व्यक्त करने वाले कई प्रसंग और उदाहरण हैं, जिन्हे विस्तार से प्रस्तुत करना यहाँ समय के हिसाव से उचित नहीं लगता । इसलिये आज के सहभागी साहित्यकारों का अभिनन्दन करते हुए मैं पुलकित हृदय से किसी शायर की अभिव्यक्ति को आज के उत्साहपूर्ण वातावरण के साथ जोडना चाहता हूँ,

पुराने खत मिले हैं आज घर में
दीये से जल उठे हैं खण्डहर में ।
(यह खण्डहर दिन चर्या की एकरसता (निरस) भी है)

आज हमारे बीच उत्तरप्रदेश के राज्यपाल मान्यवर श्री राम नाईक जी विराजमान हैं । आप जसै एक पर्वताकार व्यक्तित्व के साथ मंच पर बैठने का मुझे जो अवसर मिला है, यह मेरे जीवन का एक यादगार लम्हा है जो सदा मेरे मानस पटल पर रहेगा । मै विशेष रुप से राज्यपाल महोदय को आभार व्यक्त करते हुएँ हार्दिक नमन करता हूँ ।

आज के भागमभाग वाले व्यस्त और त्रस्त जन जीवन में किसके पास इतना समय है कि इतने विशाल स्तर पर देश, विदेश के साहित्य के मोतियों को चुन चुनकर एक माला की शक्ल में पिरोने का भगीरथ प्रयत्न करे । लेकिन डा. विजय पंडित जी के दृढ संकल्प और परिश्रम का ही ये नतीजा है कि इस बार हम सब एक साथ एक मेरठ की इस भूमी पर इकठ्ठा हो पाये हैं । मैं डा. विजय पंडित जी को इस कार्य के लिए बधाई देता हूँ और उनको और उनके समस्त सहकर्मी मित्रों का अभिनन्दन करता हूँ ।

मेरी हार्दिक इच्छा है कि यह सिलसिला अनवरत चलता रहे । साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियाँ और तेज हों । साहित्यिक महाकुम्भ की यह अनुपम धारा बहती हुई नेपाल भूमि तक पहुँचे और हमारी संस्था ‘‘बसंत चौधरी फाउन्डेशन’’ की सहकार्य करने का मौका मिले ।

ऐसे समारोहों से साहित्य ही नहीं जीवन को भी ऊर्जा मिलती है । बस यही कामना करता हूँ, ऐसा समारोह होता रहे, साहित्य रचने वाले और साहित्य का रसास्वादन करने वाले बढते रहें अर्थात,

बने रहें ये पीने वाले
बनी रहे यह मधुशाला ।

अन्त्य में आज के मुख्य अतिथि मान्यवर राज्यपाल महोदयको पूनः हार्दिक आभार एवं नमन करते हुये उपस्थित सभी साहित्य जनों को प्रणाम करता हूँ और विश्राम लेता हूँ । धन्यवाद | (वितरित भाषण से)

 

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