साहित्यिक र्सर्वे !
मुकुन्द आचार्य

सरकार को जब कभी तथ्यांकों की जरुरत आन पडती है, वह आँख मूँदकर र्सर्वे करती/कराती है। वर्षों से मेरे मन के आकाश में र्सर्वे करने की बात बादलों की तरह उमड घुमड रही थी। मैंने भी सरकारी काम की तरह बिना सोचे बिचारे र्सर्वे करने का फैसला कर लिया। और मेरा जाना पहचाना छोटा-मोटा क्षेत्र एक ही है- साहित्य ! इसीलिए साहित्यिक र्सर्वे करने का मेरा असफल नाटक शुरु हुआ।
साहित्यिक मित्रों को अपने मन की कचहरी में लाकर खडा किया। और उनसे पूछकर साहित्यिक र्सर्वे पूरा किया। र्सर्वे कुछ इस प्रकार का बनाः –
एक साहित्यकार मित्र हैं। साहित्य के लिए जान छिडकते हैं, मगर जब उन्हें एक अच्छी नौकरी मिल गई, उन्होंने साहित्य को अपने जीवन से दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर किया। लक्ष्मी के पावों में सरस्वती की बली चढा दी। फिर गम गलत करने के लिए, वे हमेशा एक खयाल पालते हैं कि उन के समान साहित्यकार ना तो पहले कभी हुआ और ना बाद में कभी पैदा होगा। ऐसे त्रिकालदर्शी साहित्यकार बहुत कम मिलते हैं। उनके चरणों में बैठकर मैं भी कुछ सीखना चाहता हूँ।
एक दूसरे मित्र को पकडा। वे खानदानी व्यापारी हैं। इसीलिए उन्होंने साहित्य को व्यवसाय बना दिया। वे साहित्य का सफल बिजनेस करते हैं। किस बनिया साहित्यकार को कैसे खुश करना है, उससे कौनसा लाभ कैसे वसूल करना है, इस विद्या में वे बहुत कुशल हैं। कभी कभी तो पता हीं नहीं चलता कि वे साहित्यकार हैं या द्रव्यकार। द्रव्यकार के बदले आप उन्हें प्रेम से द्रव्य पिशाच भी कह सकते हैं। आप की मर्जी !
एक तीसरे मित्र को याद किया। वे सशरीर उपस्थित हुए। बडी अच्छी-अच्छी कविताएँ उनके खाते में दर्ज हैं। वे लगभग आशुकवि हैं। एक बीडी फूँकते हैं, साथ में एक कविता थूकते हैं। कविता देवी के मुँह में उन्होंने बीडी का धूँवा इतना मारा कि अब तो कविता देवी रुठकर उनके बदबूदार मुँह को हमेशा के लिए त्यागकर चल दीं। मैंने उनसे पूछा, आजकल कविता नहीं रचते – उन्होंने तपाक से कहा, मूड की बात है ! आप जैसे मूढइस बात को नहीं समझ पाएँगे। मेरी तो बोलती बन्द हो गई। मैं लगा बगलें झाँकने !
एक साहित्यकार मित्र की याद आती है। वे दिनरात साहित्य में ही खोए रहते थे। न खाने की चिन्ता, न सोने की फिक्र। साल में एक दो बार स्नान जरुर कर लेते थे। भगवान गौतम बुद्ध की अहिंसा को उन्होंने बहुत जोरों से पकडा था, इसीलिए शरीर कपडे और बालों को जूँओं के लिए अभयारण्य बनाकर छोडÞ दिया था। उनकी धर्मपत्नी कभी कभार उस अभयारण्य में शिकार करना चाहती तो उन्हें पतिदेव की डाँट खानी पडती।
एक मेरे अभिन्न मित्र हैं। वे कभी अच्छे साहित्यकार रह चुके थे। आजकल एक बिगडे पत्रकार के रुप में अच्छी सी कोठी बनाकर सभ्य समाज में सिक्का जमाए हुए हैं। मैंने पूछा, आपने साहित्य को क्यों छोडÞ दिया – वे बोले, साहित्य बंजर भूमि है और पत्रकारिता हमेशा हरी भरी रहती है। बिन बादल के भी बरसात हो जाती है। साहित्यकार बनकर दर्ुर्भीक्ष में क्यों मरना –
एक मित्र हैं, जो हमेशा आवश्यकता से ज्यादा व्यस्त रहते हैं। उनको देखते हीं मुझे आवारा कुत्ते की याद आ जाती है। जिसे कोई काम भी नहीं होता और कभी फर्ुसत भी नहीं होती। ये मित्र साल दो साल में नियमित रुप से एक कविता लिखते हैं । और उसी कविता को अपनी नवीनतम रचना बताते हुए साल दो साल मजे में खींच लेते हैं। उनकी सहनशीला सुशीला धर्मपत्नी ने असहृय होने पर मजबूरी में तलाक ले ली, ऐसा सुनने में आया था। भगवान जानें कहाँ तक यह बात सच है। उनसे पूछने की हिम्मत मैं नहीं जुटा पाया।
एक साहित्यकार बन्धु पहले सरकारी नौकरी में महाभ्रष्ट, कर्मचारी के रुप में ख्याति अर्जित कर चुके थे। घूस में प्राप्त रकम से धडÞाधडÞ साहित्य सेवा करते थे, यानी अपनी पुस्तकें खुद छपवालेते थे। और देखते-देखते अच्छे साहित्यकारों में उनका नाम गिना जाने लगा। गल्ती से वे खुद भी अपने को साहित्यकार समझने लगे।
एक युवा साहित्यकार श्रृंगार रस में इतनी अच्छी रचना करता था कि मत पूछिए। एक कवयित्री से उसका टांका भिडÞ गया। दोनों पहले पति-पत्नी बन गए, बाद में माता-मिता भी बन गए। उस साहित्यकार दम्पत्ति ने अपने बेटे का नाम ‘कवि’ और बेटी का नाम ‘कविता’ रख लिया। इस तरह साहित्य की खूब सेवा की।
एक अच्छे साहित्यकार ने आत्महत्या कर ली। वे हम लोगों के नजदीकी मित्र थे। ‘सुसाइड नोट’ में उन्होंने लिखा था- ‘मैने सारी उम्र साहित्य की सेवा करके अपना जीवन बर्बाद किया। अब बाँकी जीवन बर्बाद न हो, ऐसा सोच कर मैं आत्महत्या कर रहा हूँ। इसके लिए मैं स्वयं जिम्मेवार हूँ।’ उनके इस नोट में एक दूसरे साहित्यकार ने टिप्पणी की- ‘जीवन भर उन्होंने साहित्य को बरवाद किया। खैर, अन्त समय में उनको होस आ गया। सब कुछ गँवाके होस में आये तो क्या हुआ -‘
मेरा साहित्यिक र्सर्वे अभी पूरा नही हुआ है। पाठकगण सब्र करे। फिर कभी आप को बोर करुँगा। ±±±

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