साहित्य-सेवा ही मेरा अध्यात्म

० साहित्य की ओर आपकी रुझान कैसे हर्ुइ –

पारिवारिक परिवेश- व्यक्तिविशेष अथवा और कोई कारण – -मेरे दादाजी राममणि आदी की लगभग सौ किताबें मदन पुस् तकालय में उपलब्ध हैं। मेरे माता-पिता, चाचा-तकरीवन पूरा परिवार ही साहित्य सेवा में समर्पित रहता था। मुमकिन है, उन्ही बर्ुर्जुगों के आशर्ीवाद मुझे वंशानुगत रूप में प्राप्त हुए हों। मेरी रचनाधार्मिता का श्रीगणेश २००० साल में बनारस से प्रकाशित ‘उदय’ नामक प्रसिद्ध नेपाली मासिक पत्रिका से हुआ। मेरे मित्र विष्णुप्रसाद धिताल ने मेरे लिखने के जज्बे को हवा दीर्।र् इमानदारी के साथ मुझे यह स्वीकार तो करना ही होगा।

० आपने साहित्य की किस-किस विधा को धन्य किया –

और आज तक अपने जितनी रचनाएं की, उनमें किस रचना को आप सबसे ज्यादा तरजीह देंगे – -शुरुवाती चार-पाँच वर्षो में मैं कविता में खोया रहा। फिर धीरे- धीरे कविता का जुनून धीमा पडÞता गया। साहित्यकारों की जिन्दगी में एक आम बात दिखाई देती है, जैसे हर नयाँ रंगरूट कविता से अपनी सफर का आगाज करता है। मेरे साथ भी ठीक वही वाकया हुआ। धीरे- धीरे कविता का जोश ठंडा पडÞता गया। फिर एक मुद्दत के बाद यानी २०१३ साल में मदन पुस्तकालय की स्थापना हर्ुइ। यहाँ से मेरे लेखन का ‘र्टर्निङ प्वाइन्ट’ शुरू होता है। पुस्तकालय की किताबों को मैं गहरी रुचि के साथ पढÞने लगा। फिर जो-जो अजूबे मेरी नजर से टकराए उनको मैंने ‘यस्तो पनि रहेछ !’ शर्ीष्ाक के तहत तत्कालीन ‘शारदा’, ‘धर्ती’ जैसी अब्बल पत्रिकाओं में देते गया। साल भर में १२ निबंध बन ही जाते थे। इन को ही मैंने किताब की शकल दी। और देखते-देखते मैं निबन्धकार बन गया। मेरी जमा पूँजी यही निबन्ध विधा है। इसके अलावा और मैं कुछ नहीं लिखता। और जहां तक अपनी प्यारी रचनाका सवाल है, मातापिता के लिए उनकी सभी सन्तान एकसी प्रिय होती हैं। फिर भी कहना ही पडÞे तो मैं ‘यस्तो पनि’ को ही पसन्दीदा मानूंगा। फिर पढÞने वाले का नजरिया भी अलग-अलग होता है। मसलन, आप को ‘खर्ुपाको बींड’ निबन्ध संग्रह पसंद आया, जबकि बहुतों को यह उतना अच्छा नहीं लगा।

० किसी साहित्यिक मंच मंे अपना परिचय देना पडे Þ तो आप कैसे खुद को पेश करेंगे – -ऐसी नौवत तो नहीं आती कि मुझे खुद अपनी तारीफ करनी पडÞे। आयोजक मित्र ही मेरे नाम के आगे अनेकों विशेषण लगा देते हैं। कभी मदन पुरस्कार गुठी के सचिव के रूप में, फिर गुठी के अध्यक्ष के रूप में, कभी मदन पुस्तकालय संचालक के रूप में, तो कभी नेपाली भाषा- साहित्य के अन्वेषक के रूप में और कभी मुझे सम्पादक के रूप में भी साहित्यक समारोहों में पेश किया जाता है। मैं क्या हूँ मुझे खुद पता नहीं। मैं तो इन सभी विशेषणों को अतिरंजित ही मानता हूँ। कहने का लब्बोलुआव तो यह है कि मैं सिर्फएक ‘लाइब्रेरियन’ हूँ। मेरे पासपार्ट में भी मेरा पेशा ‘लाइब्रेरियन’ ही लिखा हुआ है। औपचारिक ढंग से कहना पडÞे तो मैं महज एक ऐसा इंसान हूँ, जो किताबों को सहेज कर रखता है और जरूरतमन्दों के सामने पेश करता है। शायद इसीलिए ‘लाइब्रेरियन’ को हम ढÞेर सारे विशेषणों से नवाजा करते हैं, जिससे कि वह किताबों की दुनियां में मगजमारी करता रहे। जैसे बच्चों को ललिपँप देकर पुचकारा जाता है। खैर, कोई बात नहीं- गिरिधर मुरलीधर कहे कछु दुख मानता नाहीं। बस मैं तो इतना जानता हूँ कि नेपाली भाषा-साहित्य की थोडÞी सी सेवा कर रहा हूँ। और कोई खास बात नहीं है। लोग प्यार से अनेकों विशेषण लाद देते हैं।

मदन पुरस्कार के लम्बे इतिहास में क्या कभी ऐसा वाकया भी पेश आया, जब किसी पुरस्कार पाने वाले ने पुरस्कार लेने से मना कर दिया हो – जार याद कीजिए। -जहां तक मुझे याद है, ऐसा तो कभी नहीं हुआ। किसी ने भी इसे लेने से इन्कार नहीं किया। हाँ एक बार सिक्किम के मुख्यमन्त्री नरबहादुर भण्डारी ने, सम्भवतः अपनी कार्यव्यस्तता के चलते, तीन-चार महीने कमलमणि दीक्षित, जो आजकल कुछ सिकुड कर ँकमल दीक्षित’ हो गए हैं, उनकी अन्तरवार्ता मैं हिमालिनी में देना चाहता था। बहुत दिनों से मेर ी ऐसी अभिलाषा थी। दीक्षित जी नेपाली वाङ्मय के सिद्धहस्त साधक हैं। वे अपने निबंधों के जरि ए भाषा-साहित्य की सेवा तो कर ही रहे हैं और लगे हाथ आनेवाली पीढÞी को नेपाल के इतिहास और संस्कृति के प्रति सजग व सुसूचित भी कर ते जा रहे हैं। यहाँ मुझसे एक बडी गुस्ताखी होर् गई। अनजाने में मैं सूरज को दीया दिखा रहा था। आईए मिलते हैं, नेपाली भाषा साहित्य के अनवरत साधक कमल दीक्षित से- साहित्य-सेवा ही मेरा अध्यात्म अन्तरवार्ता द्दड हिमालिनी l जनवरी/२०१४ जब आप यह महसूस करते हैं कि आप को बहुत सहन करना पडÞ रहा है तो इसका अर्थ है कि आप अभी भी सहन करने का प्रयास कर रहे हैं। वाद में पुरस्कार ग्रहण किया था। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आजतक पुरस्कार के मामले में कोई नागवार घटना नहीं घटी है। ० क्या कभी आप को ऐसा महसूस, हुआ कि पुरस्कृत व्यक्ति पुरस्कृत होने लायक न था – -ना .. ऐसा कभी नहीं हुआ। जितने लोग पुरस्कृत हुए हैं, सभी को मैं सौ फीसदी उसके लायक और हकदार समझता हूँ। फिर भी एक बात यहां बता देना मैं जरूरी समझता हूँ कि मैं मदन पुरस्कार का हर्ताकर्ता नहीं हूँ। मुश्किल तो ये है कि लोग मुझे ही इसका र्सर्वेर्सवा मान बैठते हैं। खैर …. एक और बात है। किसी भी शख्स की शख्सियत को देखने का अपना-अपना नजरिया होता है। ऐसे पुरस्कार का निर्ण्र्ााकोई एक व्यक्ति थोडेÞ न करता है। इसके लिए समिति होती है।

० कुछ लोग आप को एक अहंवादी व्यक्ति के रूप में पहचानते हैं। आप का क्या कहना है – -हो सकता है कुछ लोगों की नजर में में वैसा हूँ। इस बारे में मैं क्या टिप्पणी कर सकता हूँ। आपके साथ भी तो मेरी अन्तरवार्ता हर्ुइ है। क्या आप को भी मैं एक अहंकारी व्यक्ति लगता हूँ – यदि लगता हूँ तो मुझे मानना ही पडÞेगा। मैं खुद अपना मूल्यांकन कैसे कर सकता हूँ – डैनियल डिफोर ने कहा है- भ्खभचथ mबल ष्क ष्ललयअभलत ष्ल जष्क भथभक। अर्थात् अपनी नजर में तो सब बेकसूर निर्दाेष ही होते हैं। एक और बात, हो सकता है मेरा स्वाभिमान लोगों को मेरा अभिमान लगता हो। क्योंकि स्वाभिमान और अभिमान दोनों को हम दूध और पानी की तर ह मिलाकर एक कर देते हैं। ० नेपाली साहित्य में क्या-क्या कमी आपको नजर आती है – -प्रज्ञा-प्रतिष्ठान और दूसरे सरकारी प्रकाशनों को इस बारे में सोचना चाहिए। इस, बारे में मुझे ज्यादा सोचने की जरूरत शायद नहीं होनी चाहिए। हां, एक बात मैं जरूर मानता हूँ, शरच्चन्द भट्टर्राई और घटराज भट्टर्राई को अवसान के बाद नेपाली भाषा और साहित्य में अनुसन्धान शोध, खोज करने वाले की कमी खलती है। ऐसा मैं महसूस कर रहा हूँ। मैं सही हूँ या गलत, नहीं कह सकता।

० आपका आध्यात्मिक दृष्टिकोण – जीवन को कैसे देखते है – -नेपाली भाषा और साहित्य की सेवा ही, मेरा अध्यात्म है। यही मेर ी पूजा है। और जहाँ तक जिन्दगी को देखने की बात है, खुद को अपनेर् कर्तव्य और अच्छे कामों में व्यस्त रखना और दूसरे की बुर्राई से दूर र हना मेरे जीवन का फलसफा यही है। परंपरागत रुढÞीवादी अध्यात्म को मैं खास महइभ्व नहीं देता। ीष्खभ बलम भित ष्खिभ। खुद भी जीओ औरों को भी जीने दो। आज का आदमी इतनी सी बात जान ले, मान ले तो बात बन जाएगी।

० देश की वर्तमान राजनीति को देख कर क्या कहना चाहेंगे – -देखिए राजनीति मेरा क्षत्रे नही ं ह।ै म ंै राजनीतिक विश्लष्े ाक भी नही ं ह।ँू एक सजग नागरिक क े नात े दशे की दरु ावस्था दखे कर दःु खी हाने ा स् वाभाविक है। कभी कभार आक्रोशित हो जाना भी स्वाभाविक है। फिर भी किसी खास पार्टर्ी, सरकार अथवा नते ा क े बार े म ंे म ंै कछु नही ं कहना चाहता। समझ ल ंे यह मरे े लिए ‘निषे िधत क्षत्रे ‘ ह।ै ना े कमन्े ट। ० नए साहित्यकारों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे – -हालांकि मैं दूसरों को राह दिखाने वाला कौन होता हूँ। मुझ में इतनी काबिलियत नहीं। फिर भी उमर के थपेडÞों ने मुझे जो सीख दी है, उसके आधार पर सिर्फइतना कहूंगा- थोडÞा सा कुछ लिखने पर ही अपने को कालिदास, शेक्सपियर न समझें। पहली सबसे जरूरी बात है- स्वाध्याय। आज स्वाध्याय की बडÞी कमी है। जिस विषय में आप लिखना

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